महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1383, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। अनेनैव विधानेन सायुज्यं तत् प्रकल्प्यते । सायुज्यं देवसात् कृत्वा प्रयुञ्जीतात्मभक्तितः ।। अनन्यमनसा देवि नित्यं तद्गतचेतसा । सायुज्यं प्राप्यते देवैर्यत्नेन महता चिरात् ।। हविर्भिरर्चनैर्होमैः प्रणामैर्नित्यचिन्तया । अर्चयित्वा यथाशक्ति स्वकं देवं विशन्ति ते ।।
दुःखोंका नाश करनेवाला यह योग उसी पुरुषका सिद्ध होता है, जो यथायोग्य आहार-विहार करनेवाला है, कर्मोंमें उपयुक्त चेष्टा करता है तथा उचित मात्रामें सोता और जागता है। इसी विधानसे देवसायुज्य प्राप्त होता है। अपनी भक्तिसे देवताओंका सायुज्य प्राप्त करके योगसाधनामें तत्पर रहे। देवि! प्रतिदिन एकाग्र और अनन्य चित्त हो चिरकालतक महान् यत्न करनेसे देवताओंके साथ सायुज्य प्राप्त होता है। योगीजन हविष्य, पूजा, हवन, प्रणाम तथा नित्य चिन्तनके द्वारा यथाशक्ति आराधना करके अपने इष्टदेवके स्वरूपमें प्रवेश कर जाते हैं ।।
सायुज्यानां विशिष्टं च मामकं वैष्णवं तथा । मां प्राप्य न निवर्तन्ते विष्णुं वा शुभलोचने । इति ते कथितो देवि योगधर्मः सनातनः । न शक्यं प्रष्टुमन्यैर्योगधर्मस्त्वया विना ।।
शुभलोचने! सायुज्योंमें मेरा तथा श्रीविष्णुका सायुज्य श्रेष्ठ हैं। मुझे या भगवान् विष्णुको प्राप्त करके मनुष्य पुनः संसारमें नहीं लौटते हैं। देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे सनातन योग-धर्मका वर्णन किया है। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इस योगधर्मके विषयमें प्रश्न नहीं कर सकता था ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)