महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1382, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै। उस समय अविनाशी पुरुष परमात्मा धूमरहित प्रकाशित अग्नि, अंशुमाली सूर्य और आकाशमें चमकने-वाली बिजलीके समान दिखायी देता है ।। दृष्ट्वा तदा मनो ज्योतिरैश्वर्याष्टगुणैर्युतः । प्राप्नोति परमं स्थानं स्पृहणीयं सुरैरपि ।। उस अवस्थामें मनके द्वारा ज्योतिर्मय परमेश्वरका दर्शन करके योगी अणिमा आदि आठ ऐश्वर्योंसे युक्त हो देवताओंके लिये भी स्पृहणीय परमपदको प्राप्त कर लेता है ।। इमान् योगस्य दोषांश्च दशैव परिचक्षते । दोषैर्विघ्नो वरारोहे योगिनां कविभिः स्मृतः ।। वरारोहे! विद्वानोंने दोषोंसे योगियोंके मार्गमें विघ्नकी प्राप्ति बतायी है। वे योगके निम्नांकित दस ही दोष बताते हैं ।। कामः क्रोधो भयं स्वप्नः स्नेहमत्यशनं तथा । वैचित्त्यं व्याधिरालस्यं लोभश्च दशमः स्मृतः ।। काम, क्रोध, भय, स्वप्न, स्नेह, अधिक भोजन, वैचित्त्य (मानसिक विकलता), व्याधि, आलस्य और लोभ—ये ही उन दोषोंके नाम हैं। इनमें लोभ दसवाँ दोष है ।। एतैस्तेषां भवेद् विघ्नो दशभिर्देवकारितैः । तस्मादेतानपास्यादौ युञ्जीत च परं मनः ।। इमानपि गुणानष्टौ योगस्य परिचक्षते । गुणैस्तैरष्टभिर्दिव्यमैश्वर्यमधिगम्यते ।। देवताओंद्वारा पैदा किये गये इन दस दोषोंसे योगियोंको विघ्न होता है; अतः पहले इन दस दोषोंको हटाकर मनको परमात्मामें लगावे। योगके निम्नांकित आठ गुण बताये जाते हैं, जिनसे युक्त दिव्य ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है ।। अणिमा महिमा चैव प्राप्तिः प्राकाम्यमेव हि । ईशित्वं च वशित्वं च यत्र कामावसायिता ।। एतानष्टौ गुणान् प्राप्य कथंचिद् योगिनां वराः । ईशाः सर्वस्य लोकस्य देवानप्यतिशेरते ।। योगोऽस्ति नैवात्यशिनो न चैकान्तमनश्नतः । न चातिस्वप्नशीलस्य नातिजागरतस्तथा ।। अणिमा, महिमा और गरिमा, लघिमा तथा प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व, जिसमें इच्छाओंकी पूर्ति होती है। योगियोंमें श्रेष्ठ पुरुष किसी तरह इन आठ गुणोंको पाकर सम्पूर्ण जगत्पर शासन करनेमें समर्थ हो देवताओंसे भी बढ़ जाते हैं। जो अधिक खानेवाला अथवा सर्वथा न खानेवाला है, अधिक सोनेवाला अथवा सर्वथा जागनेवाला है, उसका योग सिद्ध नहीं होता ।। युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।