महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
मद्द्वेषिणश्च ये मर्त्या मद्भक्तद्वेषिणोऽपि वा ।
यान्ति ते नरकं घोरमिष्ट्वा क्रतुशतैरपि ॥
मेरे भक्त कभी नष्ट नहीं होते। उनके सारे पाप दूर हो जाते हैं तथा मेरे भक्त तीनों लोकोंमें विशेषरूपसे पूजनीय हैं। जो मनुष्य मुझसे या मेरे भक्तोंसे द्वेष करते हैं, वे सौ यज्ञोंका अनुष्ठान कर लें तो भी घोर नरकमें पड़ते हैं ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं योगं पाशुपतं महत् ।
मद्भक्तैर्मनुजैर्देवि श्राव्यमेतद् दिने दिने ॥
शृणुयाद् यः पठेद् वापि ममेदं धर्मनिश्चयम् ।
स्वर्गं कीर्तिं धनं धान्यं लभते स नरोत्तमः ॥
देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् पाशुपत योगकी व्याख्या की है। मुझमें भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको प्रतिदिन इसका श्रवण करना चाहिये। जो श्रेष्ठ मानव मेरे इस धर्मनिश्चयका श्रवण अथवा पाठ करता है, वह इस लोकमें धनधान्य और कीर्ति तथा परलोकमें स्वर्ग पाता है ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे
पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२०९ श्लोक मिलाकर कुल १२७३ श्लोक हैं)
पार्वतीजीके द्वारा स्त्री-धर्मका वर्णन
षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
पार्वतीजीके द्वारा स्त्री-धर्मका वर्णन
नारद उवाच
एवमुक्त्वा महादेवः श्रोतुकामः स्वयं प्रभुः ।
अनुकूलां प्रियां भार्या पार्श्वस्थां समभाषत ।। १ ।।
**नारदजी कहते हैं—**ऐसा कहकर महादेवजी स्वयं भी पार्वतीजीके मुँहसे कुछ सुननेकी इच्छा करने लगे। अतएव स्वयं भगवान् शिवने पास ही बैठी हुई अपनी प्रिय एवं अनुकूल भार्या पार्वतीसे कहा ।। १ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
परावरज्ञे धर्मज्ञे तपोवननिवासिनि ।
साध्वि सुभ्रु सुकेशान्ते हिमवत्पर्वतात्मजे ।। २ ।।
दक्षे शमदमोपेते निर्ममे धर्मचारिणि ।
पृच्छामि त्वां वरारोहे पृष्टा वद ममेप्सितम् ।। ३ ।।
**श्रीमहेश्वर बोले—**तपोवनमें निवास करनेवाली देवि! तुम भूत और भविष्यको जाननेवाली, धर्मके तत्त्वको समझनेवाली और स्वयं भी धर्मका आचरण करनेवाली हो। सुन्दर केशों और भौंहोंवाली सती-साध्वी हिमवान्-कुमारी! तुम कार्यकुशल हो, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रहसे भी सम्पन्न हो। तुममें अहंता और ममताका सर्वथा अभाव है; अतः वरारोहे! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ। मेरे पूछनेपर तुम मुझे मेरे अभीष्ट विषयको बताओ ।।
सावित्री ब्रह्मणःसाध्वी कौशिकस्य शची सती ।
(लक्ष्मीर्विष्णोः प्रिया भार्या धृतिर्भार्या यमस्य तु)
मार्कण्डेयस्य धूमोर्णा ऋद्धिवैश्रवणस्य च ।। ४ ।।
वरुणस्य तथा गौरी सूर्यस्य च सुवर्चला ।
रोहिणी शशिनः साध्वी स्वाहा चैव विभावसोः ।। ५ ।।
अदितिः कश्यपस्याथ सर्वास्ताः पतिदेवताः ।
पृष्टाश्चोपासिताश्चैव तास्त्वया देवि नित्यशः ।। ६ ।।
ब्रह्माजीकी पत्नी सावित्री साध्वी हैं। इन्द्रपत्नी शची भी सती हैं। विष्णुकी प्यारी पत्नी लक्ष्मी पतिव्रता हैं। इसी प्रकार यमकी भार्या धृति, मार्कण्डेयकी पत्नी धूमोर्णा, कुबेरकी स्त्री ऋद्धि, वरुणकी भार्या गौरी, सूर्यकी पत्नी सुवर्चला, चन्द्रमाकी साध्वी स्त्री रोहिणी,
अग्निकी भार्या स्वाहा और कश्यपकी पत्नी अदिति—ये सब-की-सब पतिव्रता देवियाँ हैं। देवि! तुमने इन सबका सदा संग किया है और इन सबसे धर्मकी बात पूछी है ॥ ४—६ ॥ तेन त्वां परिपृच्छामि धर्मज्ञे धर्मवादिनि । स्त्रीधर्मं श्रोतुमिच्छामि त्वयोदाहृतमादितः ॥ ७ ॥ अतः धर्मवादिनि धर्मज्ञे! मैं तुमसे स्त्रीधर्मके विषयमें प्रश्न करता हूँ और तुम्हारे मुखसे वर्णित नारीधर्म आद्योपान्त सुनना चाहता हूँ ॥ ७ ॥ सधर्मचारिणी मे त्वं समशीला समव्रता । समानसारवीर्या च तपस्तीव्रं कृतं च ते ॥ ८ ॥ तुम मेरी सहधर्मिणी हो। तुम्हारा शील-स्वभाव तथा व्रत मेरे समान ही है। तुम्हारी सारभूत शक्ति भी मुझसे कम नहीं है। तुमने तीव्र तपस्या भी की है ॥ ८ ॥ त्वया ह्युक्तो विशेषेण गुणवान् स भविष्यति । लोके चैव त्वया देवि प्रमाणत्वमुपैष्यति ॥ ९ ॥ अतः देवि! तुम्हारे द्वारा कहा गया स्त्रीधर्म विशेष गुणवान् होगा और लोकमें प्रमाणभूत माना जायगा ॥ ९ ॥ स्त्रियश्चैव विशेषेण स्त्रीजनस्य गतिः परा । गौर्यां गच्छति सुश्रोणि लोकेष्वेषा गतिः सदा ॥ १० ॥ विशेषतः स्त्रियाँ ही स्त्रियोंकी परम गति हैं। सुश्रोणि! संसारमें भूतलपर यह बात सदासे प्रचलित है ॥ मम चार्धं शरीरस्य तव चार्धेन निर्मितम् । सुरकार्यकरी च त्वं लोकसंतानकारिणी ॥ ११ ॥ मेरा आधा शरीर तुम्हारे आधे शरीरसे निर्मित हुआ है। तुम देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली तथा लोक-संततिका विस्तार करनेवाली हो ॥ ११ ॥ (प्रमदोक्तं तु यत् किंचित् तत् स्त्रीषु बहु मन्यते । न तथा मन्यते स्त्रीषु पुरुषोक्तमनिन्दिते ॥) अनिन्दिते! नारीकी कही हुई जो बात होती है, उसे ही स्त्रियोंमें अधिक महत्त्व दिया जाता है। पुरुषोंकी कही हुई बातको स्त्रियोंमें वैसा महत्त्व नहीं दिया जाता ॥ तव सर्वः सुविदितः स्त्रीधर्मः शाश्वतः शुभे । तस्मादशेषतो ब्रूहि स्वधर्मं विस्तरेण मे ॥ १२ ॥ शुभे! तुम्हें सम्पूर्ण सनातन स्त्रीधर्मका भलीभाँति ज्ञान है; अतः अपने धर्मका पूर्णरूपसे विस्तारपूर्वक मेरे आगे वर्णन करो ॥ १२ ॥
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश भूतभव्यभवोत्तम ।
त्वत्प्रभावादियं देव वाक् चैव प्रतिभाति मे ॥ १३ ॥
इमास्तु नद्यो देवेश सर्वतीर्थोदकैर्युताः ।
उपस्पर्शनहेतोस्त्वामुपयान्ति समीपतः ॥ १४ ॥
एताभिः सह सम्मन्त्र्य प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।
प्रभवन् योऽनहंवादी स वै पुरुष उच्यते ॥ १५ ॥
**उमाने कहा—**भगवन्! सर्वभूतेश्वर! भूत, भविष्य और वर्तमानकालस्वरूप सर्वश्रेष्ठ महादेव! आपके प्रभावसे मेरी यह वाणी प्रतिभासम्पन्न हो रही है—अब मैं स्त्री-धर्मका वर्णन कर सकती हूँ। किंतु देवेश्वर! ये नदियाँ सम्पूर्ण तीर्थोंके जलसे सम्पन्न हो आपके स्नान और आचमन आदिके लिये अथवा आपके चरणोंका स्पर्श करनेके लिये यहाँ आपके निकट आ रही हैं। मैं इन सबके साथ सलाह करके क्रमशः स्त्रीधर्मका वर्णन करूँगी। जो व्यक्ति समर्थ होकर भी अहंकारशून्य हो, वही पुरुष कहलाता है ॥
स्त्री च भूतेश सततं स्त्रियमेवानुधावति ।
मया सम्मानिताश्चैव भविष्यन्ति सरिद्वराः ॥ १६ ॥
भूतनाथ! स्त्री सदा स्त्रीका ही अनुसरण करती है। मेरे ऐसा करनेसे ये श्रेष्ठ सरिताएँ मेरे द्वारा सम्मानित होंगी ॥
एषा सरस्वती पुण्या नदीनामुत्तमा नदी ।
प्रथमा सर्वसरितां नदी सागरगामिनी ॥ १७ ॥
विपाशा च वितस्ता च चन्द्रभागा इरावती ।
शतद्रुर्देविका सिन्धुः कौशिकी गौतमी तथा ॥ १८ ॥
(यमुना नर्मदां चैव कावेरीमथ निम्नगाम्)
ये नदियोंमें उत्तम पुण्यसलिला सरस्वती विराजमान हैं, जो समुद्रमें मिली हुई हैं। ये समस्त सरिताओंमें प्रथम (प्रधान) मानी जाती हैं। इनके सिवा विपाशा (व्यास), वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा (चनाव), इरावती (रावी), शतद्रू (शटलज), देविका, सिन्धु, कौशिकी (कोसी), गौतमी (गोदावरी), यमुना, नर्मदा तथा कावेरी नदी भी यहाँ विद्यमान हैं ॥ १७-१८ ॥
तथा देवनदी चेयं सर्वतीर्थाभिसम्भृता ।
गगनाद् गां गता देवी गङ्गा सर्वसरिद्वरा ॥ १९ ॥
ये समस्त तीर्थोंसे सेवित तथा सम्पूर्ण सरिताओंमें श्रेष्ठ देवनदी गंगादेवी भी, जो आकाशसे पृथ्वीपर उतरी हैं, यहाँ विराजमान हैं ॥ १९ ॥
इत्युक्त्वा देवदेवस्य पत्नी धर्मभृतां वरा ।
स्मितपूर्वमथाभाष्य सर्वास्ताः सरितस्तथा ॥ २० ॥
अपृच्छद् देवमहिषी स्त्रीधर्मं धर्मवत्सला ।
स्त्रीधर्मकुशलास्ता वै गङ्गाद्याः सरितां वराः ॥ २१ ॥
ऐसा कहकर देवाधिदेव महादेवजीकी पत्नी, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, धर्मवत्सला, देवमहिषी उमाने स्त्री-धर्मके ज्ञानमें निपुण गंगा आदि उन समस्त श्रेष्ठ सरिताओंको मन्द मुसकानके साथ सम्बोधित करके उनसे स्त्रीधर्मके विषयमें प्रश्न किया ।। २०-२१ ।।
उमोवाच
(हे पुण्याः सरितः श्रेष्ठाः सर्वपापविनाशिकाः ।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः शृणुध्वं वचनं मम ।।)
अयं भगवता प्रोक्ताः प्रश्नः स्त्रीधर्मसंश्रितः ।
तं तु सम्मन्त्र्य युष्माभिर्वक्तुमिच्छामि शंकरम् ।। २२ ।।
**उमा बोलीं—**हे समस्त पापोंका विनाश करनेवाली, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न पुण्यसलिला श्रेष्ठ नदियो! मेरी बात सुनो। भगवान् शिवने यह स्त्रीधर्मसम्बन्धी प्रश्न उपस्थित किया है। उसके विषयमें मैं तुमलोगोंसे सलाह लेकर ही भगवान् शंकरसे कुछ कहना चाहती हूँ ।। २२ ।।
न चैकसाध्यं पश्यामि विज्ञानं भुवि कस्यचित् ।
दिवि वा सागरगामास्तेन वो मानयाम्यहम् ।। २३ ।।
समुद्रगामिनी सरिताओ! पृथ्वीपर या स्वर्गमें मैं किसीका भी ऐसा कोई विज्ञान नहीं देखती, जिसे उसने अकेले ही—दूसरोंका सहयोग लिये बिना ही सिद्ध कर लिया हो, इसीलिये मैं आपलोगोंसे सादर सलाह लेती हूँ ।।
एवं सर्वाः सरिच्छ्रेष्ठाः पृष्टाः पुण्यतमाः शिवाः ।
ततो देवनदी गङ्गा नियुक्ता प्रतिपूज्य च ।। २४ ।।
इस प्रकार उमाने जब समस्त कल्याणस्वरूपा परम पुण्यमयी श्रेष्ठ सरिताओंके समक्ष यह प्रश्न उपस्थित किया, तब उन्होंने इसका उत्तर देनेके लिये देवनदी गंगाको सम्मानपूर्वक नियुक्त किया ।। २४ ।।
बह्वीभिर्बुद्धिभिः स्फीता स्त्रीधर्मज्ञा शुचिस्मिता ।
शैलराजसुतां देवीं पुण्या पापभयापहा ।। २५ ।।
बुद्ध्या विनयसम्पन्ना सर्वधर्मविशारदा ।
सस्मितं बहुबुद्ध्याढ्या गङ्गा वचनमब्रवीत् ।। २६ ।।
पवित्र मुसकानवाली गंगाजी अनेक बुद्धियोंसे बढ़ी-चढ़ी, स्त्री-धर्मको जाननेवाली, पाप-भयको दूर करनेवाली, पुण्यमयी, बुद्धि और विनयसे सम्पन्न, सर्वधर्मविशारद तथा प्रचुर बुद्धिसे संयुक्त थीं। उन्होंने गिरिराजकुमारी उमादेवीसे मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा ।। २५-२६ ।।
गङ्गोवाच
धन्यास्म्यनुगृहीतास्मि देवि धर्मपरायणे ।
या त्वं सर्वजगन्मान्या नदीं मानयसेऽनघे ॥ २७ ॥ **गंगाजीने कहा—**देवि! धर्मपरायणे! अनघे! मैं धन्य हूँ। मुझपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह है; क्योंकि आप सम्पूर्ण जगत्की सम्माननीया होनेपर भी एक तुच्छ नदीको मान्यता प्रदान कर रही हैं ॥ २७ ॥
प्रभवन् पृच्छते यो हि सम्मानयति वा पुनः । नूनं जनमदुष्टात्मा पण्डिताख्यां स गच्छति ॥ २८ ॥ जो सब प्रकारसे समर्थ होकर भी दूसरोंसे पूछता तथा उन्हें सम्मान देता है और जिसके मनमें कभी दुष्टता नहीं आती, वह मनुष्य निस्संदेह पण्डित कहलाता है ॥
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नानूहापोहविशारदान् । प्रवक्तॄन् पृच्छते योऽन्यान् स वै नापदमृच्छति ॥ २९ ॥ अन्यथा बहुबुद्ध्याढ्यो वाक्यं वदति संसदि । अन्यथैव ह्यहंवादी दुर्बलं वदते वचः ॥ ३० ॥ जो मनुष्य ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न और ऊहापोहमें कुशल दूसरे-दूसरे वक्ताओंसे अपना संदेह पूछता है, वह आपत्तिमें नहीं पड़ता है। विशेष बुद्धिमान् पुरुष सभामें और तरहकी बात करता है और अहंकारी मनुष्य और ही तरहकी दुर्बलतायुक्त बातें करता है ॥ २९-३० ॥
दिव्यज्ञाने दिवि श्रेष्ठे दिव्यपुण्यैः सहोत्थिते । त्वमेवार्हसि नो देवि स्त्रीधर्माननुभाषितुम् ॥ ३१ ॥ देवि! तुम दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न और देवलोकमें सर्वश्रेष्ठ हो। दिव्य पुण्योंके साथ तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है। तुम्हीं हम सब लोगोंको स्त्री-धर्मका उपदेश देनेके योग्य हो ॥
ततः साऽऽराधिता देवी गङ्गया बहुभिर्गुणैः । प्राह सर्वमशेषेण स्त्रीधर्मं सुरसुन्दरी ॥ ३२ ॥ तदनन्तर गंगाजीके द्वारा अनेक गुणोंका बखान करके पूजित होनेपर देवसुन्दरी देवी उमाने सम्पूर्ण स्त्री-धर्मका पूर्णतः वर्णन किया ॥ ३२ ॥
उमोवाच
स्त्रीधर्मो मां प्रति यथा प्रतिभाति यथाविधि । तमहं कीर्तयिष्यामि तथैव प्रश्रिता भव ॥ ३३ ॥ **उमा बोलीं—**स्त्री-धर्मका स्वरूप मेरी बुद्धिमें जैसा प्रतीत होता है, उसे मैं विधिपूर्वक बताऊँगी। तुम विनय और उत्सुकतासे युक्त होकर इसे सुनो ॥ ३३ ॥
स्त्रीधर्मः पूर्व एवायं विवाहे बन्धुभिः कृतः । सहधर्मचरी भर्तुर्भवत्यग्निसमीपतः ॥ ३४ ॥
विवाहके समय कन्याके भाई-बन्धु पहले ही उसे स्त्री-धर्मका उपदेश कर देते हैं। जब कि वह अग्निके समीप अपने पतिकी सहधर्मिणी बनती है ॥ ३४ ॥
सुस्वभावा सुवचना सुवृत्ता सुखदर्शना ।
अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तुः सा धर्मचारिणी ॥ ३५ ॥
सा भवेद् धर्मपरमा सा भवेद् धर्मभागिनी ।
देववत् सततं साध्वी या भर्तारं प्रपश्यति ॥ ३६ ॥
जिसके स्वभाव, बात-चीत और आचरण उत्तम हों, जिसको देखनेसे पतिको सुख मिलता हो, जो अपने पतिके सिवा दूसरे किसी पुरुषमें मन नहीं लगाती हो और स्वामीके समक्ष सदा प्रसन्नमुखी रहती हो, वह स्त्री धर्माचरण करनेवाली मानी गयी है। जो साध्वी स्त्री अपने स्वामीको सदा देवतुल्य समझती है, वही धर्मपरायणा और वही धर्मके फलकी भागिनी होती है ॥ ३५-३६ ॥
शुश्रूषां परिचारं च देववद् या करोति च ।
नान्यभावा ह्यविमनाः सुव्रता सुखदर्शना ॥ ३७ ॥
पुत्रवक्त्रमिवाभीक्ष्णं भर्तुर्वदनमीक्षते ।
या साध्वी नियताहारा सा भवेद् धर्मचारिणी ॥ ३८ ॥
जो पतिकी देवताके समान सेवा और परिचर्या करती हैं, पतिके सिवा दूसरे किसीसे हार्दिक प्रेम नहीं करती, कभी नाराज नहीं होती तथा उत्तम व्रतका पालन करती है, जिसका दर्शन पतिको सुखद जान पड़ता है, जो पुत्रके मुखकी भाँति स्वामीके मुखकी ओर सदा निहारती रहती है तथा जो साध्वी एवं नियमित आहारका सेवन करनेवाली है, वह स्त्री धर्मचारिणी कही गयी है ॥
श्रुत्वा दम्पतिधर्मं वै सहधर्मं कृतं शुभम् ।
या भवेद् धर्मपरमा नारी भर्तृसमव्रता ॥ ३९ ॥
'पति और पत्नीको एक साथ रहकर धर्माचरण करना चाहिये।' इस मंगलमय दाम्पत्य धर्मको सुनकर जो स्त्री धर्मपरायण हो जाती है, वह पतिके समान व्रतका पालन करनेवाली (पतिव्रता) है ॥ ३९ ॥
देववत् सततं साध्वी भर्तारमनुपश्यति ।
दम्पत्योरेश वै धर्मः सहधर्मकृतः शुभः ॥ ४० ॥
साध्वी स्त्री सदा अपने पतिको देवताके समान समझती है। पति और पत्नीका यह सहधर्म (साथ-साथ रहकर धर्माचरण करना) रूप धर्म परम मंगलमय है ॥
शुश्रूषां परिचारं च देवतुल्यं प्रकुर्वती ।
वश्या भावेन सुमनाः सुव्रता सुखदर्शना ।
अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तुः सा धर्मचारिणी ॥ ४१ ॥
परुषाण्यपि चोक्ता या दृष्टा दृष्टेन चक्षुषा ।
सुप्रसन्नमुखी भर्तुर्या नारी सा पतिव्रता ॥ ४२ ॥
जो अपने हृदयके अनुरागके कारण स्वामीके अधीन रहती है, अपने चित्तको प्रसन्न
रखती है, देवताके समान पतिकी सेवा और परिचर्या करती है, उत्तम व्रतका आश्रय लेती है
और पतिके लिये सुखदायक सुन्दर वेष धारण किये रहती है, जिसका चित्त पतिके सिवा
और किसीकी ओर नहीं जाता, पतिके समक्ष प्रसन्नवदन रहनेवाली वह स्त्री धर्मचारिणी
मानी गयी है। जो स्वामीके कठोर वचन कहने या दोषपूर्ण दृष्टिसे देखनेपर भी प्रसन्नतासे
मुसकराती रहती है, वही स्त्री पतिव्रता है ।। ४१-४२ ।।
न चन्द्रसूर्यौ न तरुं पुंनाम्ना या निरीक्षते ।
भर्तृवर्जं वरारोहा सा भवेद् धर्मचारिणी ॥ ४३ ॥
दरिद्रं व्याधितं दीनमध्वना परिकर्शितम् ।
पतिं पुत्रमिवोपास्ते सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४४ ॥
जो सुन्दरी नारी पतिके सिवा पुरुष नामधारी चन्द्रमा, सूर्य और किसी वृक्षकी ओर भी
दृष्टि नहीं डालती, वही पातिव्रतधर्मका पालन करनेवाली है। जो नारी अपने दरिद्र, रोगी,
दीन अथवा रास्तेकी थकावटसे खिन्न हुए पतिकी पुत्रके समान सेवा करती है, वह
धर्मफलकी भागिनी होती है ।।
या नारी प्रयता दक्षा या नारी पुत्रिणी भवेत् ।
पतिप्रिया पतिप्राणा सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४५ ॥
शुश्रूषां परिचर्यां च करोत्यविमनाः सदा ।
सुप्रीता विनीता च सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४६ ॥
जो स्त्री अपने हृदयको शुद्ध रखती, गृहकार्य करनेमें कुशल और पुत्रवती होती, पतिसे
प्रेम करती और पतिको ही अपने प्राण समझती है, वही धर्मफल पानेकी अधिकारिणी
होती है। जो सदा प्रसन्नचित्तसे पतिकी सेवा-शुश्रूषामें लगी रहती है, पतिके ऊपर पूर्ण
विश्वास रखती और उसके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करती है, वही नारी धर्मके श्रेष्ठ फलकी
भागिनी होती है ।। ४५-४६ ।।
न कामेषु न भोगेषु नैश्वर्ये न सुखे तथा ।
स्पृहा यस्या यथा पत्यौ सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४७ ॥
जिसके हृदयमें पतिके लिये जैसी चाह होती है, वैसी काम, भोग और सुखके लिये भी
नहीं होती। वह स्त्री पातिव्रतधर्मकी भागिनी होती है ।। ४७ ।।
कल्योत्थानरतिर्नित्यं गहशुश्रूषणे रता ।
सुसम्मूष्टक्षया चैव गोशकृत्कृतलेपना ।। ४८ ।।
अग्निकार्यपरा नित्यं सदा पुष्पबलिप्रदा ।
देवतातिथिभृत्यानां निर्वाप्य पतिना सह ।। ४९ ।।
शेषान्नमुपभुञ्जाना यथान्यायं यथाविधि ।
तुष्टपुष्टजना नित्यं नारी धर्मेण युज्यते ॥ ५० ॥ जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठनेमें रुचि रखती है, घरोंके काम-काजमें योग देती है, घरको झाड़-बुहारकर साफ रखती है और गोबरसे लीप-पोतकर पवित्र बनाये रखती है, जो पतिके साथ रहकर प्रतिदिन अग्निहोत्र करती है, देवताओंको पुष्प और बलि अर्पण करती है तथा देवता, अतिथि और पोष्यवर्गको भोजनसे तृप्त करके न्याय और विधिके अनुसार शेष अन्नका स्वयं भोजन करती है तथा घरके लोगोंको हृष्ट-पुष्ट एवं संतुष्ट रखती है, ऐसी ही नारी सती-धर्मके फलसे युक्त होती है ॥ ४८–५० ॥
श्वश्रूश्वशुरयोः पादौ जोषयन्ती गुणान्विता । मातापितृपरा नित्यं या नारी सा तपोधना ॥ ५१ ॥ ब्राह्मणान् दुर्बलानाथान् दीनान्धकृपणांस्तथा । बिभर्त्यन्नेन या नारी सा पतिव्रतभागिनी ॥ ५२ ॥ जो उत्तम गुणोंसे युक्त होकर सदा सास-ससुरके चरणोंकी सेवामें संलग्न रहती है तथा माता-पिताके प्रति भी सदा उत्तम भक्तिभाव रखती है, वह स्त्री तपस्यारूपी धनसे सम्पन्न मानी गयी है। जो नारी ब्राह्मणों, दुर्बलों, अनाथों, दीनों, अन्धों और कृपणों (कंगालों) का अन्नके द्वारा भरण-पोषण करती है, वह पातिव्रतधर्मके पालनका फल पाती है ॥ ५१-५२ ॥
व्रतं चरति या नित्यं दुष्करं लघुसत्त्वया । पतिचित्ता पतिहिता सा पतिव्रतभागिनी ॥ ५३ ॥ जो प्रतिदिन शीघ्रतापूर्वक मर्यादाका बोध करानेवाली बुद्धिके द्वारा दुष्कर व्रतका आचरण करती है, पतिमें ही मन लगाती है और निरन्तर पतिके हित-साधनमें लगी रहती है, उसे पतिव्रत- धर्मके पालनका सुख प्राप्त होता है ॥
पुण्यमेतत् तपश्चैतत् स्वर्गश्चैष सनातनः । या नारी भर्तृपरमा भवेद् भर्तृव्रता सती ॥ ५४ ॥ जो साध्वी नारी पतिव्रत-धर्मका पालन करती हुई पतिकी सेवामें लगी रहती है, उसका यह कार्य महान् पुण्य, बड़ी भारी तपस्या और सनातन स्वर्गका साधन है ॥ ५४ ॥
पतिर्हि देवो नारीणां पतिर्बन्धुः पतिर्गतिः । पत्या समा गतिर्नास्ति दैवतं वा यथा पतिः ॥ ५५ ॥ पति ही नारियोंका देवता, पति ही बन्धु-बान्धव और पति ही उनकी गति है। नारीके लिये पतिके समान न दूसरा कोई सहारा है और न दूसरा कोई देवता ॥ ५५ ॥
पतिप्रसादः स्वर्गो वा तुल्यो नार्या न वा भवेत् । अहं स्वर्गं न हीच्छेयं त्वय्यप्रीते महेश्वरे ॥ ५६ ॥ एक ओर पतिकी प्रसन्नता और दूसरी ओर स्वर्ग—ये दोनों नारीकी दृष्टिमें समान हो सकते हैं या नहीं, इसमें संदेह है। मेरे प्राणनाथ महेश्वर! मैं तो आपको अप्रसन्न रखकर
स्वर्गको नहीं चाहती ।। ५६ ।।
यद्यकार्यमधर्मं वा यदि वा प्राणनाशनम् ।
पतिर्ब्रूयाद् दरिद्रो वा व्याधितो वा कथंचन ।। ५७ ।।
आपन्नो रिपुसंस्थो वा ब्रह्मशापार्दितोऽपि वा ।
आपद्धर्माननुप्रेक्ष्य तत्कार्यमविशङ्कया ।। ५८ ।।
पति दरिद्र हो जाय, किसी रोगसे घिर जाय, आपत्तिमें फँस जाय, शत्रुओंके बीचमें पड़
जाय अथवा ब्राह्मणके शापसे कष्ट पा रहा हो, उस अवस्थामें वह न करनेयोग्य कार्य, अधर्म
अथवा प्राणत्यागकी भी आज्ञा दे दे, तो उसे आपत्तिकालका धर्म समझकर निःशंकभावसे
तुरंत पूरा करना चाहिये ।। ५७-५८ ।।
एष देव मया प्रोक्तः स्त्रीधर्मो वचनात् तव ।
या त्वेवंभाविनी नारी सा पतिव्रतभागिनी ।। ५९ ।।
देव! आपकी आज्ञासे मैंने यह स्त्रीधर्मका वर्णन किया है। जो नारी ऊपर बताये
अनुसार अपना जीवन बनाती है, वह पातिव्रत-धर्मके फलकी भागिनी होती है ।। ५९ ।।
भीष्म उवाच
इत्युक्तः स तु देवेशः प्रतिपूज्य गिरेः सुताम् ।
लोकान् विसर्जयामास सर्वैरनुचरैर्वृतान् ।। ६० ।।
ततो ययुर्भूतगणाः सरितश्च यथागतम् ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव प्रणम्य शिरसा भवम् ।। ६१ ।।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! पार्वतीजीके द्वारा इस प्रकार नारीधर्मका वर्णन सुनकर
देवाधिदेव महादेवजीने गिरिराजकुमारीका बड़ा आदर किया और वहाँ समस्त अनुचरोंके
साथ आये हुए लोगोंको जानेकी आज्ञा दी। तब समस्त भूतगण, सरिताएँ गन्धर्व और
अप्सराएँ भगवान् शंकरको सिरसे प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चली
गयीं ।। ६०-६१ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे स्त्रीधर्मकथने
षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमा-महेश्वरसंवादके
प्रसङ्गमें स्त्रीधर्मका वर्णनविषयक एक सौ छियालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४६ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६४ श्लोक हैं)
वंशपरम्पराका कथन और भगवान् श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन
सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
वंशपरम्पराका कथन और भगवान् श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन
ऋषय ऊचुः
पिनाकिन् भगनेत्रघ्न सर्वलोकनमस्कृत ।
माहात्म्यं वासुदेवस्य श्रोतुमिच्छामि शङ्कर ॥ १ ॥
ऋषियोंने कहा— भगदेवताके नेत्रोंका विनाश करनेवाले पिनाकधारी विश्ववन्दित भगवान् शंकर! अब हम वासुदेव (श्रीकृष्ण)-का माहात्म्य सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥
ईश्वर उवाच
पितामहादपि वरः शाश्वतः पुरुषो हरिः ।
कृष्णो जाम्बूनदाभासो व्यभ्रे सूर्य इवोदितः ॥ २ ॥
महेश्वरने कहा— मुनिवरो! भगवान् सनातन पुरुष श्रीकृष्ण ब्रह्माजीसे भी श्रेष्ठ हैं। वे श्रीहरि जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान श्याम कान्तिसे युक्त हैं। बिना बादलके आकाशमें उदित सूर्यके समान तेजस्वी हैं ॥ २ ॥
दशबाहुर्महातेजा देवतारिनिषूदनः ।
श्रीवत्साङ्को हृषीकेशः सर्वदैवतपूजितः ॥ ३ ॥
उनकी भुजाएँ दस हैं, वे महान् तेजस्वी हैं, देवद्रोहियोंका नाश करनेवाले श्रीवत्सभूषित भगवान् हृषीकेश सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित होते हैं ॥ ३ ॥
ब्रह्मा तस्योदरभवस्तस्याहं च शिरोभवः ।
शिरोरुहेभ्यो ज्योतींषि रोमभ्यश्च सुरसुराः ॥ ४ ॥
ब्रह्माजी उनके उदरसे और मैं उनके मस्तकसे प्रकट हुआ हूँ। उनके सिरके केशोंसे नक्षत्रों और ताराओंका प्रादुर्भाव हुआ है। रोमावलियोंसे देवता और असुर प्रकट हुए हैं ॥ ४ ॥
ऋषयो देहसम्भूतास्तस्य लोकाश्च शाश्वताः ।
पितामहगृहं साक्षात् सर्वदेवगृहं च सः ॥ ५ ॥
समस्त ऋषि और सनातन लोक उनके श्रीविग्रहसे उत्पन्न हुए हैं। वे श्रीहरि स्वयं ही सम्पूर्ण देवताओंके गृह और ब्रह्माजीके भी निवासस्थान हैं ॥ ५ ॥
सोऽस्याः पृथिव्याः कृत्स्नायाः स्रष्टा त्रिभुवनेश्वरः ।
संहर्ता चैव भूतानां स्थावरस्य चरस्य च ॥ ६ ॥
इस सम्पूर्ण पृथ्वीके स्रष्टा और तीनों लोकोंके स्वामी भी वे ही हैं। वे ही चराचर प्राणियोंका संहार भी करते हैं ॥ ६ ॥ स हि देववरः साक्षाद् देवनाथः परंतपः । सर्वज्ञः सर्वसंश्लिष्टः सर्वगः सर्वतोमुखः ॥ ७ ॥ वे देवताओंमें श्रेष्ठ, देवताओंके रक्षक, शत्रुओंको संताप देनेवाले, सर्वज्ञ, सबमें ओतप्रोत, सर्वव्यापक तथा सब ओर मुखवाले हैं ॥ ७ ॥ परमात्मा हृषीकेशः सर्वव्यापी महेश्वरः । न तस्मात् परमं भूतं त्रिषु लोकेषु किंचन ॥ ८ ॥ वे ही परमात्मा, इन्द्रियोंके प्रेरक और सर्वव्यापी महेश्वर हैं। तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ॥ ८ ॥ सनातनो वै मधुहा गोविन्द इति विश्रुतः । स सर्वान् पार्थिवान् संख्ये घातयिष्यति मानदः ॥ ९ ॥ वे ही सनातन, मधुसूदन और गोविन्द आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं। सज्जनोंको आदर देनेवाले वे भगवान् श्रीकृष्ण महाभारत-युद्धमें समस्त राजाओंका संहार करायेंगे ॥ ९ ॥ सुरकार्यार्थमुत्पन्नो मानुषं वपुरास्थितः । न हि देवगणाः सक्तास्त्रिविक्रमविनाकृताः ॥ १० ॥ वे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये पृथ्वीपर मानव-शरीर धारण करके प्रकट हुए हैं। उन भगवान् त्रिविक्रमकी शक्ति और सहायताके बिना सम्पूर्ण देवता भी कोई कार्य नहीं कर सकते ॥ १० ॥ भुवने देवकार्याणि कर्तुं नायकवर्जिताः । नायकः सर्वभूतानां सर्वदेवनमस्कृतः ॥ ११ ॥ संसारमें नेताके बिना देवता अपना कोई भी कार्य करनमें असमर्थ हैं और ये भगवान् श्रीकृष्ण सब प्राणियोंके नेता हैं। इसलिये समस्त देवता उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं ॥ ११ ॥ एतस्य देवनाथस्य देवकार्यपरस्य च । ब्रह्मभूतस्य सततं ब्रह्मर्षिशरणस्य च ॥ १२ ॥ ब्रह्मा वसति गर्भस्थः शरीरे सुखसंस्थितः । शर्वः सुखं संश्रितश्च शरीरे सुखसंस्थितः ॥ १३ ॥ देवताओंकी रक्षा और उनके कार्यसाधनमें संलग्न रहनेवाले वे भगवान् वासुदेव ब्रह्मस्वरूप हैं। वे ही ब्रह्मर्षियोंको सदा शरण देते हैं। ब्रह्माजी उनके शरीरके भीतर अर्थात् उनके गर्भमें बड़े सुखके साथ रहते हैं। सदा सुखी रहनेवाला मैं शिव भी उनके श्रीविग्रहके भीतर सुखपूर्वक निवास करता हूँ ॥ १२-१३ ॥ सर्वाः सुखं संश्रिताश्च शरीरे तस्य देवताः ।
स देवः पुण्डरीकाक्षः श्रीगर्भः श्रीसहोषितः ॥ १४ ॥
भगवान् शंकर श्रीकृष्णका माहात्म्य कह रहे हैं
भगवान् शंकर श्रीकृष्णका माहात्म्य कह रहे हैं
सम्पूर्ण देवता उनके श्रीविग्रहमें सुखपूर्वक निवास करते हैं। वे कमलनयन श्रीहरि अपने गर्भ (वक्षःस्थल)-में लक्ष्मीको निवास देते हैं। लक्ष्मीके साथ ही वे रहते हैं ॥ १४ ॥
शार्ङ्गचक्रायुधः खड्गी सर्वनागरिपुध्वजः । उत्तमेन स शीलेन दमेन च शमेन च ॥ १५ ॥ पराक्रमेण वीर्येण वपुषा दर्शनेन च । आरोहेण प्रमाणेन धैर्येणार्जवसम्पदा ॥ १६ ॥ आनृशंस्येन रूपेण बलेन च समन्वितः । अस्त्रैः समुदितः सर्वैर्दिव्यैरद्भुतदर्शनैः ॥ १७ ॥
शार्ङ्गधनुष, सुदर्शनचक्र और नन्दक नामक खड्ग—उनके आयुध हैं। उनकी ध्वजामें सम्पूर्ण नागोंके शत्रु गरुड़का चिह्न सुशोभित है। वे उत्तम शील, शम, दम, पराक्रम, वीर्य, सुन्दर शरीर, उत्तम दर्शन, सुडौल आकृति, धैर्य, सरलता, कोमलता, रूप और बल आदि सद्गुणोंसे सम्पन्न हैं। सब प्रकारके दिव्य और अद्भुत अस्त्र-शस्त्र उनके पास सदा मौजूद रहते हैं ॥ १५—१७ ॥
योगमायः सहस्राक्षो निरपायो महामनाः । वीरो मित्रजनश्लाघी ज्ञातिबन्धुजनप्रियः ॥ १८ ॥ क्षमावांश्चानहंवादी ब्रह्मण्यो ब्रह्मनायकः । भयहर्ता भयार्तानां मित्राणां नन्दिवर्धनः ॥ १९ ॥
वे योगमायासे सम्पन्न और हजारों नेत्रोंवाले हैं। उनका हृदय विशाल है। वे अविनाशी, वीर, मित्रजनोंके प्रशंसक, ज्ञाति एवं बन्धु-बान्धवोंके प्रिय, क्षमाशील, अहंकाररहित, ब्राह्मणभक्त, वेदोंका उद्धार करनेवाले, भयातुर पुरुषोंका भय दूर करनेवाले और मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाले हैं ॥ १८-१९ ॥
शरण्यः सर्वभूतानां दीनानां पालने रतः । श्रुतवानर्थसम्पन्नः सर्वभूतनमस्कृतः ॥ २० ॥ समाश्रितानां वरदः शत्रूणामपि धर्मवित् । नीतिज्ञो नीतिसम्पन्नो ब्रह्मवादी जितेन्द्रियः ॥ २१ ॥
वे समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले, दीन-दुखियोंके पालनमें तत्पर, शास्त्रज्ञानसम्पन्न, धनवान्, सर्वभूतवन्दित, शरणमें आये हुए शत्रुओंको भी वर देनेवाले, धर्मज्ञ, नीतिज्ञ, नीतिमान्, ब्रह्मवादी और जितेन्द्रिय हैं ॥ २०-२१ ॥
भवार्थमिह देवानां बुद्ध्या परमया युतः । प्राजापत्ये शुभे मार्गे मानवे धर्मसंस्कृते ॥ २२ ॥ समुत्पत्स्यति गोविन्दो मनोर्वंशे महात्मनः । अङ्गो नाम मनोः पुत्रो अन्तर्धामा ततः परः ॥ २३ ॥
परम बुद्धिसे सम्पन्न भगवान् गोविन्द यहाँ देवताओंकी उन्नतिके लिये प्रजापतिके शुभमार्गपर स्थित हो मनुके धर्म-संस्कृत कुलमें अवतार लेंगे। महात्मा मनुके वंशमें मनुपुत्र अंग नामक राजा होंगे। उनसे अन्तर्धामा नामवाले पुत्रका जन्म होगा ॥ २२-२३ ॥
अन्तर्धाम्नो हविर्धामा प्रजापतिरनिन्दितः ।
प्राचीनबर्हिर्भविता हविर्धाम्नः सुतो महान् ॥ २४ ॥
अन्तर्धामासे अनिन्द्य प्रजापति हविर्धामाकी उत्पत्ति होगी। हविर्धामाके पुत्र महाराज प्राचीनबर्हि होंगे ॥ २४ ॥
तस्य प्रचेतःप्रमुखा भविष्यन्ति दशात्मजाः ।
प्राचेतसस्तथा दक्षो भवितेह प्रजापतिः ॥ २५ ॥
प्राचीनबर्हिके प्रचेता आदि दस पुत्र होंगे। उन दसों प्रचेताओंस इस जगत्में प्रजापति दक्षका प्रादुर्भाव होगा ॥ २५ ॥
दाक्षायण्यास्तथाऽऽदित्यो मनुरादित्यतस्तथा ।
मनोश्च वंशज इला सुद्युम्नश्च भविष्यति ॥ २६ ॥
दक्षकन्या अदितिसे आदित्य (सूर्य) उत्पन्न होंगे। सूर्यसे मनु उत्पन्न होंगे। मनुके वंशमें इला नामक कन्या होगी, जो आगे चलकर सुद्युम्न नामक पुत्रके रूपमें परिणत हो जायगी ॥ २६ ॥
बुधात् पुरूरवाश्चापि तस्मादायुर्भविष्यति ।
नहुषो भविता तस्माद् ययातिस्तस्य चात्मजः ॥ २७ ॥
कन्यावस्थामें बुधसे समागम होनेपर उससे पुरूरवाका जन्म होगा। पुरूरवासे आयु नामक पुत्रकी उत्पत्ति होगी। आयुके पुत्र नहुष और नहुषके ययाति होंगे ॥ २७ ॥
यदुस्तस्मान्महासत्त्वः क्रोष्टा तस्माद् भविष्यति ।
क्रोष्टुश्चैव महान् पुत्रो वृजिनीवान् भविष्यति ॥ २८ ॥
ययातिसे महान् बलशाली यदु होंगे। बहुसे क्रोष्टाका जन्म होगा, क्रोष्टासे महान् पुत्र वृजिनीवान् होंगे ॥ २८ ॥
वृजिनीवतश्च भविता उषङ्गुरपराजितः ।
उषङ्गोर्भविता पुत्रः शूरश्चित्ररथस्तथा ॥ २९ ॥
वृजिनीवान्से विजय वीर उषंगुका जन्म होगा। उषंगुका पुत्र शूरवीर चित्ररथ होगा ॥ २९ ॥
तस्य त्ववरजः पुत्रः शूरो नाम भविष्यति ।
तेषां विख्यातवीर्याणां चरित्रगुणशालिनाम् ॥ ३० ॥
यज्वनां सुविशुद्धानां वंशे ब्राह्मणसम्मते ।
स शूरः क्षत्रियश्रेष्ठो महावीर्यो महायशाः ।
स्ववंशविस्तरकरं जनयिष्यति मानदः ॥ ३१ ॥
वसुदेव इति ख्यातं पुत्रमानकदुन्दुभिम् ।
तस्य पुत्रश्चतुर्बाहुर्वासुदेवो भविष्यति ॥ ३२ ॥
उसका छोटा पुत्र शूर नामसे विख्यात होगा। वे सभी यदुवंशी विख्यात पराक्रमी, सदाचार और सद्गुणसे सुशोभित, यज्ञशील और विशुद्ध आचार-विचारवाले होंगे। उनका कुल ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित होगा। उस कुलमें महापराक्रमी, महायशस्वी और दूसरोंको सम्मान देनेवाले क्षत्रिय-शिरोमणि शूर अपने वंशका विस्तार करनेवाले वसुदेव नामक पुत्रको जन्म देंगे, जिसका दूसरा नाम आनकदुन्दुभि होगा। उन्हींके पुत्र चार भुजाधारी भगवान् वासुदेव होंगे ॥ ३०—३२ ॥
दाता ब्राह्मणसत्कर्ता ब्रह्मभूतो द्विजप्रियः ।
राज्ञो मागधसंरुद्धान् मोक्षयिष्यति यादवः ॥ ३३ ॥
भगवान् वासुदेव दानी, ब्राह्मणोंका सत्कार करनेवाले, ब्रह्मभूत और ब्राह्मणप्रिय होंगे। वे यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण मगधराज जरासंधकी कैदमें पड़े हुए राजाओंको बन्धनसे छुड़ायेंगे ॥ ३३ ॥
जरासंधं तु राजानं निर्जित्य गिरिगह्वरे ।
सर्वपार्थिवरत्नाढ्यो भविष्यति स वीर्यवान् ॥ ३४ ॥
वे पराक्रमी श्रीहरि पर्वतकी कन्दरा (राजगृह)-में राजा जरासंधको जीतकर समस्त राजाओंके द्वारा उपहृत रत्नोंसे सम्पन्न होंगे ॥ ३४ ॥
पृथिव्यामप्रतिहतो वीर्येण च भविष्यति ।
विक्रमेण च सम्पन्नः सर्वपार्थिवपार्थिवः ॥ ३५ ॥
वे इस भूमण्डलमें अपने बल-पराक्रमद्वारा अजेय होंगे। विक्रमसे सम्पन्न तथा समस्त राजाओंके भी राजा होंगे ॥ ३५ ॥
शूरसेनेषु भूत्वा स द्वारकायां वसन् प्रभुः ।
पालयिष्यति गां देवीं विजित्य नयवित् सदा ॥ ३६ ॥
नीतिवेत्ता भगवान् श्रीकृष्ण शूरसेन देश (मथुरा-मण्डल)-में अवतीर्ण होकर वहाँसे द्वारकापुरीमें जाकर रहेंगे और समस्त राजाओंको जीतकर सदा इस पृथ्वीदेवीका पालन करेंगे ॥ ३६ ॥
तं भवन्तः समासाद्य वाङ्माल्यैरर्हणैर्वरैः ।
अर्चयन्तु यथान्यायं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ॥ ३७ ॥
आपलोग उन्हीं भगवान्की शरण लेकर अपनी वाङ्मयी मालाओं तथा श्रेष्ठ पूजनोपचारोंसे सनातन ब्रह्माकी भाँति उनका यथोचित पूजन करें ॥ ३७ ॥
यो हि मां द्रष्टुमिच्छेत ब्रह्माणं च पितामहम् ।
द्रष्टव्यस्तेन भगवान् वासुदेवः प्रतापवान् ॥ ३८ ॥
जो मेरा और पितामह ब्रह्माजीका दर्शन करना चाहता हो, उसे प्रतापी भगवान् वासुदेवका दर्शन करना चाहिये ॥ ३८ ॥ दृष्टे तस्मिन्नहं दृष्टो न मेऽत्रास्ति विचारणा । पितामहो वा देवेश इति वित्त तपोधनाः ॥ ३९ ॥ तपोधनो! उनका दर्शन हो जानेपर मेरा ही दर्शन हो गया, अथवा उनके दर्शनसे देवेश्वर ब्रह्माजीका दर्शन हो गया ऐसे समझो, इस विषयमें मुझे कोई विचार नहीं करना है अर्थात् संदेह नहीं है ॥ ३९ ॥ स यस्य पुण्डरीकाक्षः प्रीतियुक्तो भविष्यति । तस्य देवगणः प्रीतो ब्रह्मपूर्वो भविष्यति ॥ ४० ॥ जिसपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न होंगे, उसके ऊपर ब्रह्मा आदि देवताओंका समुदाय प्रसन्न हो जायगा ॥ ४० ॥ यश्च तं मानवे लोके संश्रयिष्यति केशवम् । तस्य कीर्तिर्जयश्चैव स्वर्गश्चैव भविष्यति ॥ ४१ ॥ मानवलोकमें जो भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेगा, उसे कीर्ति, विजय तथा उत्तम स्वर्गकी प्राप्ति होगी ॥ ४१ ॥ धर्माणां देशिकः साक्षात् स भविष्यति धर्मभाक् । धर्मवद्भिः स देवेशो नमस्कार्यः सदोद्यतैः ॥ ४२ ॥ इतना ही नहीं, वह धर्मोंका उपदेश देनेवाला साक्षात् धर्माचार्य एवं धर्मफलका भागी होगा। अतः धर्मात्मा पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा उत्साहित रहकर देवेश्वर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करें ॥ ४२ ॥ धर्म एव परो हि स्यात् तस्मिन्नभ्यर्चिते विभौ । स हि देवो महातेजाः प्रजाहितचिकीर्षया ॥ ४३ ॥ धर्मार्थं पुरुषव्याघ्र ऋषिकोटीः ससर्ज ह । ताः सृष्टास्तेन विभुना पर्वते गन्धमादने ॥ ४४ ॥ सनत्कुमारप्रमुखास्तिष्ठन्ति तपसान्विताः । तस्मात् स वाग्मी धर्मज्ञो नमस्यो द्विजपुङ्गवाः ॥ ४५ ॥ उन सर्वव्यापी परमेश्वरकी पूजा करनेसे परम धर्मकी सिद्धि होगी। वे महान् तेजस्वी देवता हैं। उन पुरुषसिंह श्रीकृष्णने प्रजाका हित करनेकी इच्छासे धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये करोड़ों ऋषियोंकी सृष्टि की है। भगवान्के उत्पन्न किये हुए वे सनत्कुमार आदि ऋषि गन्धमादन पर्वतपर सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं। अतः द्विजवरो! उन प्रवचन-कुशल, धर्मज्ञ वासुदेवको सदा प्रणाम करना चाहिये ॥ ४३—४५ ॥ दिवि श्रेष्ठो हि भगवान् हरिनारायणः प्रभुः । वन्दितो हि स वन्देत मानितो मानयीत च ।
अर्हितश्चार्हयेन्नित्यं पूजितः प्रतिपूजयेत् ॥ ४६ ॥ वे भगवान् नारायण हरि देवलोकमें सबसे श्रेष्ठ हैं। जो उनकी वन्दना करता है, उसकी वे भी वन्दना करते हैं। जो उनका आदर करता है, उसका वे भी आदर करते हैं। इसी प्रकार अर्चित होनेपर वे भी अर्चना करते और पूजित या प्रशंसित होनेपर वे भी पूजा या प्रशंसा करते हैं ॥ ४६ ॥
दृष्टः पश्येदहरहः संश्रितः प्रतिसंश्रयेत् । अर्चितश्चार्चयेन्नित्यं स देवो द्विजसत्तमाः ॥ ४७ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो प्रतिदिन उनका दर्शन करता है, उसकी ओर वे भी कृपादृष्टि करते हैं। जो उनका आश्रय लेता है, उसके हृदयमें वे भी आश्रय लेते हैं तथा जो उनकी पूजा करता है, उसकी वे भी सदा पूजा करते हैं ॥ ४७ ॥
एतत् तस्यानवद्यस्य विष्णोर्वै परमं व्रतम् । आदिदेवस्य महतः सज्जनाचरितं सदा ॥ ४८ ॥ उन प्रशंसनीय आदि देवता भगवान् महाविष्णुका यह उत्तम व्रत है, जिसका साधु पुरुष सदा आचरण करते आये हैं ॥ ४८ ॥
भुवनेऽभ्यर्चितो नित्यं देवैरपि सनातनः । अभयेनानुरूपेण युज्यन्ते तमनुव्रताः ॥ ४९ ॥ वे सनातन देवता हैं, अतः इस त्रिभुवनमें देवता भी सदा उन्हींकी पूजा करते हैं। जो उनके अनन्य भक्त हैं, वे अपने भजनके अनुरूप ही निर्भय पद प्राप्त करते हैं ॥ ४९ ॥
कर्मणा मनसा वाचा स नमस्यो द्विजैः सदा । यत्नवद्भिरुपस्थाय द्रष्टव्यो देवकीसुतः ॥ ५० ॥ द्विजोंको चाहिये कि वे मन, वाणी और कर्मसे सदा उन भगवान्को प्रणाम करें और यत्नपूर्वक उपासना करके उन देवकीनन्दनका दर्शन करें ॥ ५० ॥
एष वोऽभिहितो मार्गो मया वै मुनिसत्तमाः । तं दृष्ट्वा सर्वशो देवं दृष्टाः स्युः सुरसत्तमाः ॥ ५१ ॥ मुनिवरो! यह मैंने आपलोगोंको उत्तम मार्ग बता दिया है। उन भगवान् वासुदेवका सब प्रकारसे दर्शन कर लेनेपर सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवताओंका दर्शन करना हो जायगा ॥ ५१ ॥
महावराहं तं देवं सर्वलोकपितामहम् । अहं चैव नमस्यामि नित्यमेव जगत्पतिम् ॥ ५२ ॥ मैं भी महावराहरूप धारण करनेवाले उन सर्वलोक-पितामह जगदीश्वरको नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ ५२ ॥
तत्र च त्रितयं दृष्टं भविष्यति न संशयः । समस्ता हि वयं देवास्तस्य देहे वसामहे ॥ ५३ ॥
हम सब देवता उनके श्रीविग्रहमें निवास करते हैं। अतः उनका दर्शन करनेसे तीनों देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु और शिव)-का दर्शन हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।। ५३ ।। तस्य चैवाग्रजो भ्राता सिताद्रिनिचयप्रभः । हली बल इति ख्यातो भविष्यति धराधरः ।। ५४ ।। उनके बड़े भाई कैलासकी पर्वतमालाओंके समान श्वेत कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले हलधर और बलरामके नामसे विख्यात होंगे। पृथ्वीको धारण करनेवाले शेषनाग ही बलरामके रूपमें अवतीर्ण होंगे ।। ५४ ।। त्रिशिरास्तस्य दिव्यश्च शातकुम्भमयो द्रुमः । ध्वजस्तृणेन्द्रो देवस्य भविष्यति रथाश्रितः ।। ५५ ।। बलदेवजीके रथपर तीन शिखाओंसे युक्त दिव्य सुवर्णमय तालवृक्ष ध्वजके रूपमें सुशोभित होगा ।। ५५ ।। शिरो नागैर्महाभोगैः परिकीर्णं महात्मभिः । भविष्यति महाबाहोः सर्वलोकेश्वरस्य च ।। ५६ ।। सर्वलोकेश्वर महाबाहु बलरामजीका मस्तक बड़े-बड़े फनवाले विशालकाय सर्पोंसे घिरा हुआ होगा ।। ५६ ।। चिन्तितानि समेष्यन्ति शस्त्राण्यस्त्राणि चैव ह । अनन्तश्च स एवोक्तो भगवान् हरिरव्ययः ।। ५७ ।। उनके चिन्तन करते ही सम्पूर्ण दिव्य अस्त्र-शस्त्र उन्हें प्राप्त हो जायँगे। अविनाशी भगवान् श्रीहरि ही अनन्त शेषनाग कहे गये हैं ।। ५७ ।। समादिष्टश्च विबुधैर्दर्शय त्वमिति प्रभो । सुपर्णो यस्य वीर्येण कश्यपस्यात्मजो बली । अन्तं नैवाशकद् द्रष्टुं देवस्य परमात्मनः ।। ५८ ।। पूर्वकालमें देवताओंने गरुड़जीसे यह अनुरोध किया कि 'आप हमें भगवान् शेषका अन्त दिखा दीजिये।' तब कश्यपके बलवान् पुत्र गरुड़ अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उन परमात्मदेव अनन्तका अन्त न देख सके ।। ५८ ।। स च शेषो विचरते परया वै मुदा युतः । अन्तर्वसति भोगेन परिरभ्य वसुन्धराम् ।। ५९ ।। वे भगवान् शेष बड़े आनन्दके साथ सर्वत्र विचरते हैं और अपने विशाल शरीरसे पृथिवीको आलिंगनपाशमें बाँधकर पाताललोकमें निवास करते हैं ।। ५९ ।। य एव विष्णुः सोऽनन्तो भगवान् वसुधाधरः । यो रामः स हृषीकेशो योऽच्युतः स धराधरः ।। ६० ।। जो भगवान् विष्णु हैं, वे ही इस पृथिवीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त हैं। जो बलराम हैं वे ही श्रीकृष्ण हैं, जो श्रीकृष्ण हैं वे ही भूमिधर बलराम हैं ।। ६० ।।