महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1396, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुष्टपुष्टजना नित्यं नारी धर्मेण युज्यते ॥ ५० ॥ जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठनेमें रुचि रखती है, घरोंके काम-काजमें योग देती है, घरको झाड़-बुहारकर साफ रखती है और गोबरसे लीप-पोतकर पवित्र बनाये रखती है, जो पतिके साथ रहकर प्रतिदिन अग्निहोत्र करती है, देवताओंको पुष्प और बलि अर्पण करती है तथा देवता, अतिथि और पोष्यवर्गको भोजनसे तृप्त करके न्याय और विधिके अनुसार शेष अन्नका स्वयं भोजन करती है तथा घरके लोगोंको हृष्ट-पुष्ट एवं संतुष्ट रखती है, ऐसी ही नारी सती-धर्मके फलसे युक्त होती है ॥ ४८–५० ॥
श्वश्रूश्वशुरयोः पादौ जोषयन्ती गुणान्विता । मातापितृपरा नित्यं या नारी सा तपोधना ॥ ५१ ॥ ब्राह्मणान् दुर्बलानाथान् दीनान्धकृपणांस्तथा । बिभर्त्यन्नेन या नारी सा पतिव्रतभागिनी ॥ ५२ ॥ जो उत्तम गुणोंसे युक्त होकर सदा सास-ससुरके चरणोंकी सेवामें संलग्न रहती है तथा माता-पिताके प्रति भी सदा उत्तम भक्तिभाव रखती है, वह स्त्री तपस्यारूपी धनसे सम्पन्न मानी गयी है। जो नारी ब्राह्मणों, दुर्बलों, अनाथों, दीनों, अन्धों और कृपणों (कंगालों) का अन्नके द्वारा भरण-पोषण करती है, वह पातिव्रतधर्मके पालनका फल पाती है ॥ ५१-५२ ॥
व्रतं चरति या नित्यं दुष्करं लघुसत्त्वया । पतिचित्ता पतिहिता सा पतिव्रतभागिनी ॥ ५३ ॥ जो प्रतिदिन शीघ्रतापूर्वक मर्यादाका बोध करानेवाली बुद्धिके द्वारा दुष्कर व्रतका आचरण करती है, पतिमें ही मन लगाती है और निरन्तर पतिके हित-साधनमें लगी रहती है, उसे पतिव्रत- धर्मके पालनका सुख प्राप्त होता है ॥
पुण्यमेतत् तपश्चैतत् स्वर्गश्चैष सनातनः । या नारी भर्तृपरमा भवेद् भर्तृव्रता सती ॥ ५४ ॥ जो साध्वी नारी पतिव्रत-धर्मका पालन करती हुई पतिकी सेवामें लगी रहती है, उसका यह कार्य महान् पुण्य, बड़ी भारी तपस्या और सनातन स्वर्गका साधन है ॥ ५४ ॥
पतिर्हि देवो नारीणां पतिर्बन्धुः पतिर्गतिः । पत्या समा गतिर्नास्ति दैवतं वा यथा पतिः ॥ ५५ ॥ पति ही नारियोंका देवता, पति ही बन्धु-बान्धव और पति ही उनकी गति है। नारीके लिये पतिके समान न दूसरा कोई सहारा है और न दूसरा कोई देवता ॥ ५५ ॥
पतिप्रसादः स्वर्गो वा तुल्यो नार्या न वा भवेत् । अहं स्वर्गं न हीच्छेयं त्वय्यप्रीते महेश्वरे ॥ ५६ ॥ एक ओर पतिकी प्रसन्नता और दूसरी ओर स्वर्ग—ये दोनों नारीकी दृष्टिमें समान हो सकते हैं या नहीं, इसमें संदेह है। मेरे प्राणनाथ महेश्वर! मैं तो आपको अप्रसन्न रखकर