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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1395, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1395

सुप्रसन्नमुखी भर्तुर्या नारी सा पतिव्रता ॥ ४२ ॥

जो अपने हृदयके अनुरागके कारण स्वामीके अधीन रहती है, अपने चित्तको प्रसन्न

रखती है, देवताके समान पतिकी सेवा और परिचर्या करती है, उत्तम व्रतका आश्रय लेती है

और पतिके लिये सुखदायक सुन्दर वेष धारण किये रहती है, जिसका चित्त पतिके सिवा

और किसीकी ओर नहीं जाता, पतिके समक्ष प्रसन्नवदन रहनेवाली वह स्त्री धर्मचारिणी

मानी गयी है। जो स्वामीके कठोर वचन कहने या दोषपूर्ण दृष्टिसे देखनेपर भी प्रसन्नतासे

मुसकराती रहती है, वही स्त्री पतिव्रता है ।। ४१-४२ ।।

न चन्द्रसूर्यौ न तरुं पुंनाम्ना या निरीक्षते ।

भर्तृवर्जं वरारोहा सा भवेद् धर्मचारिणी ॥ ४३ ॥

दरिद्रं व्याधितं दीनमध्वना परिकर्शितम् ।

पतिं पुत्रमिवोपास्ते सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४४ ॥

जो सुन्दरी नारी पतिके सिवा पुरुष नामधारी चन्द्रमा, सूर्य और किसी वृक्षकी ओर भी

दृष्टि नहीं डालती, वही पातिव्रतधर्मका पालन करनेवाली है। जो नारी अपने दरिद्र, रोगी,

दीन अथवा रास्तेकी थकावटसे खिन्न हुए पतिकी पुत्रके समान सेवा करती है, वह

धर्मफलकी भागिनी होती है ।।

या नारी प्रयता दक्षा या नारी पुत्रिणी भवेत् ।

पतिप्रिया पतिप्राणा सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४५ ॥

शुश्रूषां परिचर्यां च करोत्यविमनाः सदा ।

सुप्रीता विनीता च सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४६ ॥

जो स्त्री अपने हृदयको शुद्ध रखती, गृहकार्य करनेमें कुशल और पुत्रवती होती, पतिसे

प्रेम करती और पतिको ही अपने प्राण समझती है, वही धर्मफल पानेकी अधिकारिणी

होती है। जो सदा प्रसन्नचित्तसे पतिकी सेवा-शुश्रूषामें लगी रहती है, पतिके ऊपर पूर्ण

विश्वास रखती और उसके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करती है, वही नारी धर्मके श्रेष्ठ फलकी

भागिनी होती है ।। ४५-४६ ।।

न कामेषु न भोगेषु नैश्वर्ये न सुखे तथा ।

स्पृहा यस्या यथा पत्यौ सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४७ ॥

जिसके हृदयमें पतिके लिये जैसी चाह होती है, वैसी काम, भोग और सुखके लिये भी

नहीं होती। वह स्त्री पातिव्रतधर्मकी भागिनी होती है ।। ४७ ।।

कल्योत्थानरतिर्नित्यं गहशुश्रूषणे रता ।

सुसम्मूष्टक्षया चैव गोशकृत्कृतलेपना ।। ४८ ।।

अग्निकार्यपरा नित्यं सदा पुष्पबलिप्रदा ।

देवतातिथिभृत्यानां निर्वाप्य पतिना सह ।। ४९ ।।

शेषान्नमुपभुञ्जाना यथान्यायं यथाविधि ।