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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1397, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1397

स्वर्गको नहीं चाहती ।। ५६ ।।

यद्यकार्यमधर्मं वा यदि वा प्राणनाशनम् ।

पतिर्ब्रूयाद् दरिद्रो वा व्याधितो वा कथंचन ।। ५७ ।।

आपन्नो रिपुसंस्थो वा ब्रह्मशापार्दितोऽपि वा ।

आपद्धर्माननुप्रेक्ष्य तत्कार्यमविशङ्कया ।। ५८ ।।

पति दरिद्र हो जाय, किसी रोगसे घिर जाय, आपत्तिमें फँस जाय, शत्रुओंके बीचमें पड़

जाय अथवा ब्राह्मणके शापसे कष्ट पा रहा हो, उस अवस्थामें वह न करनेयोग्य कार्य, अधर्म

अथवा प्राणत्यागकी भी आज्ञा दे दे, तो उसे आपत्तिकालका धर्म समझकर निःशंकभावसे

तुरंत पूरा करना चाहिये ।। ५७-५८ ।।

एष देव मया प्रोक्तः स्त्रीधर्मो वचनात् तव ।

या त्वेवंभाविनी नारी सा पतिव्रतभागिनी ।। ५९ ।।

देव! आपकी आज्ञासे मैंने यह स्त्रीधर्मका वर्णन किया है। जो नारी ऊपर बताये

अनुसार अपना जीवन बनाती है, वह पातिव्रत-धर्मके फलकी भागिनी होती है ।। ५९ ।।

भीष्म उवाच

इत्युक्तः स तु देवेशः प्रतिपूज्य गिरेः सुताम् ।

लोकान् विसर्जयामास सर्वैरनुचरैर्वृतान् ।। ६० ।।

ततो ययुर्भूतगणाः सरितश्च यथागतम् ।

गन्धर्वाप्सरसश्चैव प्रणम्य शिरसा भवम् ।। ६१ ।।

भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! पार्वतीजीके द्वारा इस प्रकार नारीधर्मका वर्णन सुनकर

देवाधिदेव महादेवजीने गिरिराजकुमारीका बड़ा आदर किया और वहाँ समस्त अनुचरोंके

साथ आये हुए लोगोंको जानेकी आज्ञा दी। तब समस्त भूतगण, सरिताएँ गन्धर्व और

अप्सराएँ भगवान् शंकरको सिरसे प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चली

गयीं ।। ६०-६१ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे स्त्रीधर्मकथने

षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमा-महेश्वरसंवादके

प्रसङ्गमें स्त्रीधर्मका वर्णनविषयक एक सौ छियालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४६ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६४ श्लोक हैं)