महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1357, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनास्ति मोक्षात् परं देवि नास्ति मोक्षात् परा गतिः ।
सुखमात्यन्तिकं श्रेष्ठमनिवृत्तं च तद् विदुः ॥
देवि! मोक्षसे उत्तम कोई तत्त्व नहीं है और मोक्षसे श्रेष्ठ कोई गति नहीं है। ज्ञानी पुरुष मोक्षको कभी निवृत्त न होनेवाला, श्रेष्ठ एवं आत्यन्तिक सुख मानते हैं॥
नात्र देवि जरा मृत्युः शोको वा दुःखमेव वा ।
अनुत्तममचिन्त्यं च तद् देवि परमं सुखम् ॥
देवि! इसमें जरा, मृत्यु, शोक अथवा दुःख नहीं है। वह सर्वोत्तम अचिन्त्य परम सुख है॥
ज्ञानानामुत्तमं ज्ञानं मोक्षज्ञानं विदुर्बुधाः ।
ऋषिभिर्देवसङ्घैश्च प्रोच्यते परमं पदम् ॥
विद्वान् पुरुष मोक्षज्ञानको सब ज्ञानोंमें उत्तम मानते हैं। ऋषि और देवसमुदाय उसे परमपद कहते हैं॥
नित्यमक्षरमक्षोभ्यमजेयं शाश्वतं शिवम् ।
विशन्ति तत् पदं प्राज्ञाः स्पृहणीयं सुरासुरैः ॥
नित्य, अविनाशी, अक्षोभ्य, अजेय, शाश्वत और शिवस्वरूप वह मोक्षपद देवताओं और असुरोंके लिये भी स्पृहणीय है। ज्ञानी पुरुष उसमें प्रवेश करते हैं॥
दुःखादिश्च दुरन्तश्च संसारोऽयं प्रकीर्तितः ।
शोकव्याधिजरादोषैर्मरणेन च संयुतः ॥
यह संसार आदि और अन्तमें दुःखमय कहा गया है। यह शोक, व्याधि, जरा और मृत्युके दोषोंसे युक्त है॥
यथा ज्योतिर्गणा व्योम्नि निवर्तन्ते पुनः पुनः ।
एवं जीवा अमी लोके निवर्तन्ते पुनः पुनः ॥
तस्य मोक्षस्य मार्गोऽयं श्रूयतां शुभलक्षणे ॥
ब्रह्मादिस्थावरान्तश्च संसारो यः प्रकीर्तितः ।
संसारे प्राणिनः सर्वे निवर्तन्ते यथा पुनः ॥
जैसे आकाशमें नक्षत्रगण बारंबार आते और निवृत्त हो जाते हैं, उसी प्रकार ये जीव लोकमें बारंबार लौटते रहते हैं। शुभलक्षणे! उसके मोक्षका यह मार्ग सुनो। ब्रह्माजीसे लेकर स्थावर वृक्षोंतक जो संसार बताया गया है, इसमें सभी प्राणी बारंबार लौटते हैं॥
तत्र संसारचक्रस्य मोक्षो ज्ञानेन दृश्यते ।
अध्यात्मतत्त्वविज्ञानं ज्ञानमित्यभिधीयते ॥
ज्ञानस्य ग्रहणोपायमाचारं ज्ञानिनस्तथा ।
यथावत् सम्प्रवक्ष्यामि तत् त्वमेकमनाः शृणु ॥