महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]
उमोवाच
देवदेव नमस्तेऽस्तु कालसूदन शंकर ।
लोकेषु विविधा धर्मास्त्वत्प्रसादान्मया श्रुताः ॥
विशिष्टं सर्वधर्मेभ्यः शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ।
**उमाने कहा—**देवदेव! कालसूदन शंकर! आपको नमस्कार है। आपकी कृपासे मैंने अनेक प्रकारके धर्म सुने। अब यह बताइये कि सम्पूर्ण धर्मोंसे श्रेष्ठ, सनातन, अटल और अविनाशी धर्म क्या है? ।।
नारद उवाच
एवं पृष्टस्तया देव्या महादेवः पिनाकधृक् ।
प्रोवाच मधुरं वाक्यं सूक्ष्ममध्यात्मसंश्रितम् ॥
**नारदजीने कहा—**देवी पार्वतीके इस प्रकार पूछनेपर पिनाकधारी महादेवजीने सूक्ष्म अध्यात्मभावसे युक्त मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामासि निश्चयम् ।
एतदेव विशिष्टं ते यत् त्वं पृच्छसि मां प्रिये ॥
**श्रीमहेश्वर बोले—**महाभागे! तुमने न्यायतः सुननेकी निश्चित इच्छा प्रकट की है, प्रिये! तुम मुझसे जो पूछती हो, यही तुम्हारा विशिष्ट गुण है ।।
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्गलोकफलाश्रितः ।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ॥
सर्वत्र स्वर्गलोकरूपी फलके आश्रयभूत धर्मका विधान किया गया है। धर्मके बहुत-से द्वार हैं और उसकी कोई क्रिया यहाँ निष्फल नहीं होती ।।
यस्मिन् यस्मिंश्च विषये यो यो याति विनिश्चयम् ।
तं तमेवाभिजानाति नान्यं धर्मं शुचिस्मिते ॥
शुचिस्मिते! जो-जो जिस-जिस विषयमें निश्चयको प्राप्त होता है, वह-वह उसी-उसीको धर्म समझता है, दूसरेको नहीं ।।
शृणु देवि समासेन मोक्षद्वारमनुत्तमम् ।
एतद्धि सर्वधर्माणां विशिष्टं शुभमव्ययम् ॥
देवि! अब तुम संक्षेपसे परम उत्तम मोक्ष-द्वारका वर्णन सुनो। यही सब धर्मोंमें उत्तम, शुभ और अविनाशी है ।।