भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1358, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1358

वहाँ संसार-चक्रका ज्ञानके द्वारा मोक्ष देखा जाता है। अध्यात्मतत्त्वको अच्छी तरह समझ लेना ही ज्ञान कहलाता है। प्रिये! उस ज्ञानको ग्रहण करनेका जो उपाय है तथा ज्ञानीका जो आचार है, उसका मैं यथावत् रूपसे वर्णन करूँगा। तुम एकचित्त होकर इसे सुनो।।

ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि भूत्वा पूर्वं गृहे स्थितः । आनृण्यं सर्वतः प्राप्य ततस्तान् संत्यजेद् गृहान् ।। ततः संत्यज्य गार्हस्थ्यं निश्चितो वनमाश्रयेत् ।। वने गुरुं समाज्ञाय दीक्षितो विधिपूर्वकम् । दीक्षां प्राप्य यथान्यायं स्ववृत्तं परिपालयेत् ।। गृह्णीयादप्युपाध्यायान्मोक्षज्ञानमनिन्दितः । द्विविधं च पुनर्मोक्षं सांख्यं योगमिति स्मृतिः ।।

ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय पहले घरमें स्थित रहकर सब प्रकारके ऋणोंसे उऋण हो अन्तमें उन घरोंका परित्याग कर दे। इस तरह गार्हस्थ्य-आश्रमको त्यागकर वह निश्चितरूपसे वनका आश्रय ले। वनमें गुरुकी आज्ञा ले विधिपूर्वक दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षा पाकर यथोचित रीतिसे अपने सदाचारका पालन करे। तदनन्तर गुरुसे मोक्षज्ञानको ग्रहण करे और अनिन्द्य आचरणसे रहे। मोक्ष भी दो प्रकारका है—एक सांख्य-साध्य और दूसरा योग-साध्य। ऐसा शास्त्रका कथन है ।।

पञ्चविंशतिविज्ञानं सांख्यमित्यभिधीयते । ऐश्वर्यं देवसारूप्यं योगशास्त्रस्य निर्णयः ।। तयोरन्यतरं ज्ञानं शृणुयाच्छिष्यतां गतः । नाकालो नाप्यकाषायी नाप्यसंवत्सरोषितः । नासांख्ययोगो नाश्रद्धं गुरुणा स्नेहपूर्वकम् ।।

पचीस तत्त्वोंका ज्ञान सांख्य कहलाता है। अणिमा आदि ऐश्वर्य और देवताओंके समान रूप—यह योग-शास्त्रका निर्णय है। इन दोनोंमेंसे किसी एक ज्ञानका शिष्यभावसे श्रवण करे। न तो असमयमें, न गेरुआ वस्त्र धारण किये बिना, न एक वर्षतक गुरुकी सेवामें रहे बिना, न सांख्य या योगमेंसे किसीको अपनाये बिना और न श्रद्धाके बिना ही गुरुका स्नेहपूर्वक उपदेश ग्रहण करे ।।

समः शीतोष्णहर्षादीन् विषहेत स वै मुनिः ।। अमृष्यः क्षुत्पिपासाभ्यामुचितेभ्यो निवर्तयेत् । त्यजेत् संकल्पजान् ग्रन्थीन् सदा ध्यानपरो भवेत् ।। कुण्डिकां चमसं शिक्यं छत्रं यष्टिमुपानहौ । चैलमित्येव नैतेषु स्थापयेत् स्वाम्यमात्मनः ।। गुरोः पूर्वं समुत्तिष्ठेज्जघन्यं तस्य संविशेत् ।