महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1359, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनैवाविज्ञाप्य भर्तारमावश्यकमपि व्रजेत् ॥ द्विरह्नि स्नानशाटेन संध्ययोरभिषेचनम् । एककालाशनं चास्य विहितं यतिभिः पुरा ॥ जो सर्वत्र समान भाव रखते हुए सर्दी-गर्मी और हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वोंको सहन करे, वही मुनि है। भूख-प्यासके वशीभूत न हो, उचित भोगोंसे भी अपने मनको हटा ले, संकल्पजनित ग्रन्थियोंको त्याग दे और सदा ध्यानमें तत्पर रहे। कुंडी, चमस (प्याली), छींका, छाता, लाठी, जूता और वस्त्र—इन वस्तुओंमें भी अपना स्वामित्व स्थापित न करे। गुरुसे पहले उठे और उनसे पीछे सोवे। स्वामी (गुरु) को सूचित किये बिना किसी आवश्यक कार्यके लिये भी न जाय। प्रतिदिन दिनमें दो बार दोनों संध्याओंके समय वस्त्रसहित स्नान करे। उसके लिये चौबीस घंटेमें एक समय भोजनका विधान है। पूर्वकालके यतियोंने ऐसा ही किया है ॥
भैक्षं सर्वत्र गृह्णीयाच्चिन्तयेत् सततं निशि । कारणे चापि सम्प्राप्ते न कुप्येत कदाचन ॥ सर्वत्र भिक्षा ग्रहण करे, रातमें सदा परमात्माका चिन्तन करे, कोपका कारण प्राप्त होनेपर भी कभी कुपित न हो ॥
ब्रह्मचर्यं वने वासः शौचमिन्द्रियसंयमः । दया च सर्वभूतेषु तस्य धर्मः सनातनः ॥ ब्रह्मचर्य, वनवास, पवित्रता, इन्द्रियसंयम और समस्त प्राणियोंपर दया—यह संन्यासीका सनातन धर्म है ॥
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । आत्मयुक्तः परां बुद्धिं लभते पापनाशिनीम् ॥ वह समस्त पापोंसे दूर रहकर हल्का भोजन करे, इन्द्रियोंको संयममें रखे और परमात्मचिन्तनमें लगा रहे। इससे उसे पापनाशिनी श्रेष्ठ बुद्धि प्राप्त होती है ॥
यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ अनिष्ठुरोऽनहङ्कारो निर्द्वन्द्वो वीतमत्सरः । वीतशोकभयाबाधः पदं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी समलोष्टाश्मकाञ्चनः । समः शत्रौ च मित्रे च निर्वाणमधिगच्छति ॥ जब मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीके प्रति पापभाव नहीं करता, तब वह यति ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। निष्ठुरताशून्य, अहंकाररहित, द्वन्द्वातीत और मात्सर्यहीन यति शोक, भय और बाधासे रहित हो सर्वोत्तम ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। जिसकी दृष्टिमें निन्दा