महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1367, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्रवन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितामिव । आयुरादाय मर्त्यानामहोरात्रेषु संततम् ॥ देवता, दानव, गन्धर्व, किन्नर, नाग तथा राक्षसोंको भी काल अपने वशमें कर लेता है। कोई भी कालकी पहुँचसे परे नहीं है। गये हुए दिन, मास और रात्रियाँ फिर नहीं लौटती हैं। यह जीवात्मा उस निरन्तर चालू रहनेवाले अटल और अविनाशी मार्गको ग्रहण करता है। सरिताओंके स्रोतकी भाँति बीतती हुई आयुके दिन वापस नहीं लौटते हैं। दिन और रातोंमें व्याप्त हुई मनुष्योंकी आयु लेकर काल यहाँसे चल देता है ॥
जीवितं सर्वभूतानामक्षयः क्षपयन्नसौ । आदित्यो ह्यस्तमभ्येति पुनः पुनरुदेति च ॥ अक्षय सूर्य सम्पूर्ण प्राणियोंके जीवनको क्षीण करता हुआ अस्त होता और पुनः उदय होता रहता है ॥
रात्र्यां रात्र्यां व्यतीतायामायुरल्पतरं भवेत् । गाधोदके मत्स्य इव किं नु तस्य कुमारता ॥ एक-एक रात बीतनेपर आयु बहुत थोड़ी होती चली जाती है। जैसे थाह जलमें रहनेवाला मत्स्य सुखी नहीं रहता, उसी प्रकार जिसकी आयु क्षीण होती जा रही है, उस परिमित आयुवाले पुरुषको कुमारावस्थाका क्या सुख है? ॥
मरणं हि शरीरस्य नियतं ध्रुवमेव च । तिष्ठन्नपि क्षणं सर्वः कालस्यैति वशं पुनः ॥ शरीरकी मृत्यु निश्चित और अटल है। सब लोग यहाँ क्षणभर ठहरकर पुनः कालके अधीन हो जाते हैं ॥
न म्रियेरन् न जीर्येरन् यदि स्युः सर्वदेहिनः । न चानिष्टं प्रवर्तेत शोको वा प्राणिनां क्वचित् ॥ यदि समस्त देहधारी प्राणी न मरें और न बूढ़े हों तो न उन्हें अनिष्टकी प्राप्ति हो और न शोककी ही ॥
अप्रमत्तः प्रमत्तेषु कालो भूतेषु तिष्ठति । अप्रमत्तस्य कालस्य क्षयं प्राप्तो न मुच्यते ॥ श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्निकम् । कोऽपि तद् वेद यत्रासौ मृत्युना नाभिवीक्षितः ॥ समस्त प्राणियोंके असावधान रहनेपर भी काल सदा सावधान रहता है। उस सावधान कालके आश्रयमें आया हुआ कोई भी प्राणी बच नहीं सकता। कलका कार्य आज ही कर डाले, जिसे अपराह्नमें करना हो उसे पूर्वाह्नमें ही पूरा कर डाले। कौन उस स्थानको जानता है, जहाँ उसपर मृत्युकी दृष्टि नहीं पड़ी होगी ॥
वर्षास्विदं करिष्यामि इदं ग्रीष्मवसन्तयोः ।