महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकार मौत उसे उठा ले जाती है। जन्म, मृत्यु और जरा-सम्बन्धी दुःखोंसे सदा आक्रान्त होकर संसारमें मनुष्य पकाया जा रहा है, तो भी वह पापसे उद्विग्न नहीं हो रहा है।।
उमोवाच
केनोपायेन मर्त्यानां निवर्तेते जरान्तकौ। यद्यस्ति भगवन् मह्यमेतदाचक्ष्व मा चिरम्।। **उमाने पूछा—**भगवन्! मनुष्योंकी वृद्धावस्था और मृत्यु किस उपायसे निवृत्त होती है? यदि इसका कोई उपाय है तो यह मुझे बताइये, विलम्ब न कीजिये।। तपसा वा सुमहता कर्मणा वा श्रुतेन वा। रसायनप्रयोगैर्वा केनात्येति जरान्तकौ।। महान् तप, कर्म, शास्त्रज्ञान अथवा रासायनिक प्रयोग—किस उपायसे मनुष्य जरा और मृत्युको लाँघ सकता है? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
नैतदस्ति महाभागे जरामृत्युनिवर्तनम्। सर्वलोकेषु जानीहि मोक्षादन्यत्र भामिनि।। **श्रीमहेश्वरने कहा—**महाभागे! ऐसी बात नहीं होती। भामिनि! तुम यह जान लो कि सम्पूर्ण संसारमें मोक्षके सिवा अन्यत्र जरा और मृत्युकी निवृत्ति नहीं होती।। न धनेन न राज्येन नाग्र्येण तपसापि वा। मरणं नातितरते विना मुक्त्या शरीरिणः।। आत्माकी मुक्तिके बिना मनुष्य न तो धनसे, न राज्यसे और न श्रेष्ठ तपस्यासे ही मृत्युको लाँघ सकता है।। अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च। न तरन्ति जरामृत्यू निर्वाणाधिगमाद् विना।। सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ भी मोक्षकी उपलब्धि हुए बिना जरा और मृत्युको नहीं लाँघ सकते।। ऐश्वर्यं धनधान्यं च विद्यालाभस्तपस्तथा। रसायनप्रयोगो वा न तरन्ति जरान्तकौ।। ऐश्वर्य, धन-धान्य, विद्यालाभ, तप और रसायनप्रयोग—ये कोई भी जरा और मृत्युके पार नहीं जा सकते।। देवदानवगन्धर्वकिन्नरोरगराक्षसान्। स्ववशे कुरुते कालो न कालस्यास्त्यगोचरः।। न ह्यहानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः क्षपाः। सोऽयं प्रपद्यतेऽध्वानमजस्रं ध्रुवमव्ययम्।।