महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1365, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअज्ञानरूढमूलस्तु विधित्सापरिवेचनः ।। रोषलोभमहास्कन्धः पुरा दुष्कृतसारवान् । आयासविटपस्तीव्रशोकपुष्पो भयाङ्कुरः ।। नानासंकल्पपत्राढ्यः प्रमादात् परिवर्धितः । महतीभिः पिपासाभिः समन्तात् परिवेष्टितः ।। संरोहत्यकृतप्रज्ञे पादपः कामसम्भवः ।। नैव रोहति तत्त्वज्ञे रूढो वा छिद्यते पुनः ।। कृच्छ्रोपायेष्वनित्येषु निस्सारेषु फलेषु च । दुःखादिषु दुरन्तेषु कामयोगेषु का रतिः ।। एक काममय वृक्ष है, जो मोह-संचयरूपी बीजसे उत्पन्न हुआ है। वह काममय विचित्र वृक्ष हृदयदेशमें ही स्थित है। अज्ञान ही उसकी मजबूत जड़ है। सकाम कर्म करनेकी इच्छा ही उसे सींचना है। रोष और लोभ ही उसका विशाल तना है। पाप ही उसका सार भाग है। आयास-प्रयास ही उसकी शाखाएँ हैं। तीव्रशोक पुष्प है, भय अंकुर है। नाना प्रकारके संकल्प उसके पत्ते हैं। यह प्रमादसे बढ़ा हुआ है। बड़ी भारी पिपासा या तृष्णा ही लता बनकर उस काम-वृक्षमें सब ओर लिपटी हुई है। अज्ञानी मनुष्यमें ही यह काममय वृक्ष उत्पन्न होता और बढ़ता है। तत्त्वज्ञ पुरुषमें यह नहीं अंकुरित होता है। यदि हुआ भी तो पुनः कट जाता है। यह काम कठिन उपायोंसे साध्य है, अनित्य है, उसके फल निःसार हैं, उसका आदि और अन्त भी दुःखमय है, उससे सम्बन्ध जोड़नेमें क्या अनुराग हो सकता है? ।।
इन्द्रियेषु च जीर्यत्सु च्छिद्यमाने तथाऽऽयुषि । पुरस्ताच्च स्थिते मृत्यौ किं सुखं पश्यतः शुभे ।। शुभे! इन्द्रियाँ सदा जीर्ण हो रही हैं, आयु नष्ट होती चली जा रही है और मौत सामने खड़ी है—यह सब देखते हुए किसीको संसारमें क्या सुख प्रतीत होगा? ।।
व्याधिभिः पीड्यमानस्य नित्यं शारीरमानसैः । नरस्याकृतकृत्यस्य किं सुखं मरणे सति ।। मनुष्य सदा शारीरिक और मानसिक व्याधियोंसे पीड़ित होता है और अपनी अधूरी इच्छाएँ लिये ही मर जाता है। अतः यहाँ कौन-सा सुख है? ।।
संचिन्तयानमेवार्थं कामानामतृप्तकम् । व्याघ्रः पशुमिवारण्ये मृत्युरादाय गच्छति ।। जन्ममृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतः । संसारे पच्यमानस्तु पापात्नोद्विजते जनः ।। मानव अपने मनोरथोंकी पूर्तिका उपाय सोचता रहता है और कामनाओंसे अतृप्त ही बना रहता है। तभी जैसे जंगलमें बाघ आकर सहसा किसी पशुको दबोच लेता है, उसी