महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1364, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्धते ।। भोगोंकी तृष्णा कभी भोग भोगनेसे शान्त नहीं होती, अपितु घीसे प्रज्वलित होनेवाली आगके समान अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है ।। अलाभेनैव कामानां शोकं त्यजति पण्डितः । आयासविटपस्तीव्रः कामाग्निः कर्षणारणिः ।। इन्द्रियार्थेन सम्मोह्य दहत्यकुशलं जनम् ।। भोगोंकी प्राप्ति न होनेसे ही विद्वान् पुरुष शोकको त्याग देता है। आयासरूपी वृक्षपर तीव्रवेगसे प्रज्वलित और आकर्षणरूपी अग्निसे प्रकट हुई कामनारूप अग्नि मूर्ख मनुष्यको विषयोंद्वारा मोहित करके जला डालती है ।। यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः । नालमेकस्य पर्याप्तमिति पश्यन् न मुह्यति ।। इस पृथ्वीपर जो धान, जौ, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब मिलकर एक पुरुषके लिये पर्याप्त नहीं हैं। ऐसा देखने और समझनेवाला पुरुष मोहमें नहीं पड़ता है ।। यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ।। लोकमें जो काम-सुख है और परलोकमें जो महान् दिव्य सुख है—ये दोनों मिलकर तृष्णाक्षयजनित सुखकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते ।। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु नैव धीरो नियोजयेत् । मनःषष्ठानि संयम्य नित्यमात्मनि योजयेत् ।। इन्द्रियाणां विसर्गेण दोषमृच्छत्यसंशयम् । संनियम्य नु तान्येव ततः सिद्धिमवाप्नुयात् ।। षण्णामात्मनि युक्तानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति । न च पापैर्न चानर्थैः संयुज्येत विचक्षणः ।। धीर पुरुष अपनी इन्द्रियोंको विषयोंमें न लगावे। मनसहित उनका संयम करके उन्हें सदा परमात्माके ध्यानमें नियुक्त करे। इन्द्रियोंको खुली छोड़ देनेसे निश्चय ही दोषकी प्राप्ति होती है और उन्हींका संयम कर लेनेसे मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो परमात्म-चिन्तनमें लगी हुई मनसहित छहों इन्द्रियोंपर प्रभुत्व स्थापित कर लेता है, वह विद्वान् पापों और अनर्थोंसे संयुक्त नहीं होता है ।। अप्रमत्तः सदा रक्षेदिन्द्रियाणि विचक्षणः । अरक्षितेषु तेष्वाशु नरो नरकमेति हि ।। विद्वान् पुरुष सावधान रहकर सदा अपनी इन्द्रियोंकी रक्षा करे; क्योंकि उनकी रक्षा न होनेपर मनुष्य शीघ्र ही नरकमें गिर जाता है ।। हृदि काममयश्चित्रो मोहसंचयसम्भवः ।