महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1363, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोऽपि पृथिवीं कृत्स्नामेकच्छत्रां प्रशास्ति च । एकस्मिन्नेव राष्ट्रे तु स चापि निवसेन्नृपः ॥ तस्मिन् राष्ट्रेऽपि नगरमेकमेवाधितिष्ठति । नगरेऽपि गृहं चैकं भवेत् तस्य निवेशनम् ॥ जो राजा अकेला ही समूची पृथिवीका एकच्छत्र शासन करता है। वह भी किसी एक ही राष्ट्रमें निवास करता है। उस राष्ट्रमें भी किसी एक ही नगरमें रहता है। उस नगरमें भी किसी एक ही घरमें उसका निवास होता है ।।
एक एव प्रदिष्टः स्यादावासस्तद्गृहेऽपि च । आवासे शयनं चैकं निशि यत्र प्रलीयते ॥ उस घरमें भी उसके लिये एक ही कमरा नियत होता है। उस कमरेमें भी उसके लिये एक ही शय्या होती है, जिसपर वह रातमें सोता है ।।
शयनस्यार्धमेवास्य स्त्रियाश्चार्धं विधीयते । तदनेन प्रसङ्गेन स्वल्पेनैवेह युज्यते ॥ सर्वं ममेति सम्मूढो बलं पश्यति बालिशः । एवं सर्वोपयोगेषु स्वल्पमस्य प्रयोजनम् ॥ तण्डुलप्रस्थमात्रेण यात्रा स्यात् सर्वदेहिनाम् । ततो भूयस्तरो भोगो दुःखाय तपनाय च ॥ उस शय्याका भी आधा ही भाग उसके पल्ले पड़ता है। उसका आधा भाग उसकी रानीके काम आता है। इस प्रसंगसे वह अपने लिये थोड़ेसे ही भागका उपयोग कर पाता है। तो भी वह मूर्ख गवाँर सारे भूमण्डलको अपना ही समझता है और सर्वत्र अपना ही बल देखता है। इस प्रकार सभी वस्तुओंके उपयोगोंमें उसका थोड़ा-सा ही प्रयोजन होता है। प्रतिदिन सेरभर चावलसे ही समस्त देहधारियोंकी प्राणयात्राका निर्वाह होता है। उससे अधिक भोग दुःख और संतापका कारण होता है ।।
नास्ति तृष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् । सर्वान् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ तृष्णाके समान कोई दुःख नहीं है, त्यागके समान कोई सुख नहीं है। समस्त कामनाओंका परित्याग करके मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।।
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः । योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥ खोटी बुद्धिवाले मनुष्योंके लिये जिसका त्याग करना अत्यन्त कठिन है; जो मनुष्यके बूढ़े हो जानेपर स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जिसे प्राणनाशक रोग कहा गया है, उस तृष्णाका त्याग करनेवालेको ही सुख मिलता है ।।
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।