महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1362, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंउच्छ्रयान् विनिपातांश्च दृष्ट्वा प्रत्यक्षतः स्वयम् ।
अनित्यमसुखं चेति व्यवस्येत् सर्वमेव च ॥
सारे संग्रहोंका अन्त विनाश है, सारी उन्नतियोंका अन्त पतन है, संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है। उत्थान और पतनको स्वयं ही प्रत्यक्ष देखकर यह निश्चय करे कि यहाँका सब कुछ अनित्य और दुःखरूप है ॥
अर्थानामार्जने दुःखमर्जितानां तु रक्षणे ।
नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थं दुःखभाजनम् ॥
धनके उपार्जनमें दुःख होता है, उपार्जित हुए धनकी रक्षामें दुःख होता है, धनके नाश और व्ययमें भी दुःख होता है, इस प्रकार दुःखके भाजन बने हुए धनको धिक्कार है ॥
अर्थवन्तं नरं नित्यं पञ्चाभिघ्नन्ति शत्रवः ।
राजा चोरश्च दायादा भूतानि क्षय एव च ॥
अर्थमेवमनर्थस्य मूलमित्यवधारय ।
न ह्यनर्थाः प्रबाधन्ते नरमर्थविवर्जितम् ॥
धनवान् मनुष्यपर सदा पाँच शत्रु चोट करते रहते हैं—राजा, चोर, उत्तराधिकारी भाई-बन्धु, अन्यान्य प्राणी तथा क्षय। प्रिये! इस प्रकार तुम अर्थको अनर्थका मूल समझो। धनरहित पुरुषको अनर्थ बाधा नहीं देते हैं ॥
अर्थप्राप्तिर्महद् दुःखमाकिंचन्यं परं सुखम् ।
उपद्रवेषु चार्थानां दुःखं हि नियतं भवेत् ॥
धनकी प्राप्ति महान् दुःख है और अकिंचनता (निर्धनता) परम सुख है; क्योंकि जब धनपर उपद्रव आते हैं, तब निश्चय ही बड़ा दुःख होता है ॥
धनलोभेन तृष्णाया न तृप्तिरुपलभ्यते ।
लब्धाश्रयो विवर्धेत समिद्ध इव पावकः ॥
धनके लोभसे तृष्णाकी कभी तृप्ति नहीं होती है। तृष्णा या लोभको आश्रय मिल जाय तो प्रज्वलित अग्निके समान उसकी वृद्धि होने लगती है ॥
जित्वापि पृथिवीं कृत्स्नां चतुःसागरमेखलाम् ।
सागराणां पुनः पारं जेतुमिच्छत्यसंशयम् ॥
चारों समुद्र जिसकी मेखला है, उस सारी पृथिवीको जीतकर भी मनुष्य संतुष्ट नहीं होता। वह फिर समुद्रके पारवाले देशोंको भी जीतनेकी इच्छा करता है, इसमें संशय नहीं है ॥
अलं परिग्रहेणेह दोषवान् हि परिग्रहः ।
कोशकारः कृमिर्देवि बध्यते हि परिग्रहात् ॥
परिग्रह (संग्रह) से यहाँ कोई लाभ नहीं; क्योंकि परिग्रह दोषसे भरा हुआ है। देवि! रेशमका कीड़ा परिग्रहसे ही बन्धनको प्राप्त होता है ॥