महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1361, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंविविधान्युपवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥
जो मरे हुए पुरुष या खोयी हुई वस्तुके लिये शोक करता है, वह केवल संतापका भागी होता है। उसका वह दुःख मिटता नहीं है। मनुष्य-योनिमें उत्पन्न हुए मानवके पास गर्भावस्थासे ही नाना प्रकारके दुःख और सुख आते रहते हैं॥
तयोरेकतरो मार्गो यद्येनमभिसंनमेत् ।
सुखं प्राप्य न संहृष्येन्न दुःखं प्राप्य संज्वरेत् ॥
उनमेंसे कोई एक मार्ग यदि इसे प्राप्त हो तो यह मनुष्य सुख पाकर हर्ष न करे और दुःख पाकर चिन्तित न हो ।।
दोषदर्शी भवेत् तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते ।
अनिष्टेनान्वितं पश्येद् यथा क्षिप्रं विरज्यते ॥
जहाँ आसक्ति हो रही हो, वहाँ दोष देखना चाहिये। उस वस्तुको अनिष्टकी दृष्टिसे देखे, जिससे उसकी ओरसे शीघ्र ही वैराग्य हो जाय ।।
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ ।
समेत्य च व्यपेयातां तद्वज्ज्ञातिसमागमः ॥
जैसे महासागरमें दो काठ इधर-उधरसे आकर मिल जाते हैं और मिलकर फिर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार जाति-भाइयोंका समागम होता है ।।
अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः ।
स्नेहस्तत्र न कर्तव्यो विप्रयोगो हि तैर्ध्रुवः ॥
सब लोग अदृश्य स्थानसे आये थे और पुनः अदृश्य स्थानको चले गये। उनके प्रति स्नेह नहीं करना चाहिये; क्योंकि उनके साथ वियोग होना निश्चित था ।।
कुटुम्बपुत्रदाराश्च शरीरं धनसंचयः ।
ऐश्वर्यं स्वस्थता चेति न मुह्येत् तत्र पण्डितः ॥
सुखमेकान्ततो नास्ति शक्रस्यापि त्रिविष्टपे ।
तत्रापि सुमहद् दुःखं सुखमल्पतरं भवेत् ॥
कुटुम्ब, पुत्र, स्त्री, शरीर, धनसंचय, ऐश्वर्य और स्वस्थता—इनके प्रति विद्वान् पुरुषको आसक्त नहीं होना चाहिये। स्वर्गमें रहनेवाले देवराज इन्द्रको भी केवल सुख-ही-सुख नहीं मिलता। वहाँ भी दुःख अधिक और सुख बहुत कम है ।।
न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ।
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ॥
किसीको भी न तो सदा दुःख मिलता है और न सदा सुख ही मिलता है। सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आता रहता है ।।
क्षयान्ता निचयाः सर्वे पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥