भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 140

ऋषयः परिपप्रच्छुर्महात्मानं तपस्विनः ॥ बैठ जानेपर उन महाकाय, महामना और महातेजस्वी विनतानन्दन गरुडसे वहाँ बैठे हुए तपस्वी ऋषियोंने पूछा ।।

ऋषय ऊचुः

कौतूहलं वैनतेय परं नो हृदि वर्तते । तस्य नान्योऽस्ति वक्तेह त्वामृते पन्नगाशन ॥ तदाख्यातमिहेच्छामो भवता प्रश्नमुत्तमम् । ऋषि बोले—विनतानन्दन गरुड! हमारे हृदयमें एक प्रश्नको लेकर बड़ा कौतूहल उत्पन्न हो गया है। उसका समाधान करनेवाला यहाँ आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, अतः हम आपके द्वारा अपने उस उत्तम प्रश्नका विवेचन कराना चाहते हैं ।।

गरुड उवाच

किं मया ब्रूत वक्तव्यं कार्यं च वदतां वराः ॥ यूयं हि मां यथायुक्तं सर्वे वै देष्टुमर्हथ । गरुड बोले—वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वरो! मेरे द्वारा किस विषयमें आप प्रवचन कराना चाहते हैं? यह बताइये। आप मुझे सभी यथोचित कार्योंके लिये आज्ञा दे सकते हैं ।।

ब्रह्मोवाच

नमस्कृत्या ह्यनन्ताय ततस्ते हृदि सत्तमाः । प्रष्टुं प्रचक्रमुस्तत्र वैनतेयं महाबलम् ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—देवताओ! तदनन्तर उन श्रेष्ठतम ऋषियोंने अन्तरहित भगवान् नारायणको नमस्कार करके महाबली गरुडसे वहाँ इस प्रकार पूछना आरम्भ किया ।।

ऋषय ऊचुः

देवदेवं महात्मानं नारायणमनामयम् । भवानुपास्ते वरदं कुतोऽसौ कश्च तत्त्वतः ॥ ऋषि बोले—विनतानन्दन! जिस रोग-शोकसे रहित वरदायक देवाधिदेव महात्मा नारायणकी आप उपासना करते हैं, उनका प्राकट्य कहाँसे हुआ है? तथा वे वास्तवमें कौन हैं? ।।

प्रकृतिर्विकृतिर्वास्य कीदृशी क्व नु संस्थितिः । एतद् भवन्तं पृच्छामो देवोऽयं क्व कृतालयः ॥ उनकी प्रकृति अथवा विकृति कैसी है? उनकी स्थिति कहाँ है? तथा वे नारायणदेव कहाँ अपना घर बनाये हुए हैं? ये सब बातें हमलोग आपसे पूछते हैं ।।

एष भक्तप्रियो देवः प्रियभक्तस्तथैव च ।