महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्वं प्रियश्चास्य भक्तश्च नान्यः काश्यप विद्यते ॥ कश्यपकुमार! ये भगवान् नारायण भक्तोंके प्रिय हैं तथा भक्त भी उन्हें बहुत प्रिय हैं और आप भी उनके प्रिय एवं भक्त हैं। आपके समान दूसरा कोई उन्हें प्रिय नहीं है ॥
मुष्णन्निव मनश्चक्षुर्ष्यविभाव्यतनुर्विभुः । अनादिमध्यनिधनो न विद्मैनं कुतो ह्यसौ ॥ उनका विग्रह इन्द्रियोंद्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आने योग्य नहीं है। वे सबके मन और नेत्रोंको मानो चुराये लेते हैं। उनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है। हम इनके विषयमें यह नहीं समझ पाते कि ये कहाँसे प्रकट हुए हैं? ॥
वेदेष्वपि च विश्वात्मा गीयते न च विद्महे । तत्त्वतस्तत्त्वभूतात्मा विभुर्नित्यः सनातनः ॥ वेदोंमें भी विश्वात्मा कहकर इनकी महिमाका गान किया गया है, परंतु हम यह नहीं जानते कि वे तत्त्वभूतस्वरूप नित्य सनातन प्रभु वस्तुतः कैसे हैं? ॥
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । गुणाश्चैषां यथासंख्यं भावाभावौ तथैव च ॥ तमः सत्त्वं रजश्चैव भावाश्चैव तदात्मकाः । मनो बुद्धिश्च तेजश्च बुद्धिगम्यानि तत्त्वतः ॥ पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि—ये पाँच भूत; क्रमशः इन भूतोंके गुण; भाव-अभाव; सत्त्व, रज, तम, सात्त्विक, राजस और तामस भाव; मन, बुद्धि और तेज—ये वास्तवमें बुद्धिगम्य हैं ॥
जायन्ते तात तस्माद्धि तिष्ठते तेष्वसौ विभुः । संचिन्त्य बहुधा बुद्ध्या नाध्यवस्यामहे परम् ॥ तस्य देवस्य तत्त्वेन तन्नः शंस यथातथम् । तात! ये सब उन्हीं श्रीहरिसे उत्पन्न होते हैं और वे भगवान् इन सबमें व्यापकरूपसे स्थित हैं। हम उनके विषयमें अपनी बुद्धिके द्वारा नाना प्रकारसे विचार करते हैं तथापि किसी उत्तम निश्चयपर नहीं पहुँच पाते, अतः आप यथार्थ रूपसे हमें उनका तत्त्व बताइये ॥
सुपर्ण उवाच
स्थूलतो यस्तु भगवांस्तेनैव स्वेन हेतुना । त्रैलोक्यस्य तु रक्षार्थं दृश्यते रूपमास्थितः ॥ गरुडजीने कहा—महात्माओ! जो स्थूलस्वरूप भगवान् हैं, वे तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये उसी कारणभूत अपने स्वरूपसे लोगोंको दृष्टिगोचर होते हैं ॥
मया तु महदाश्चर्यं पुरा दृष्टं सनातने ।