महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1433, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर ऐश्वर्य आदि महिमाओंसे युक्त, ४९२ देवेशः-समस्त देवोंके स्वामी, ४९३ देवभृद्गुरुः-देवोंका विशेषरूपसे भरण-पोषण करनेवाले उनके परम गुरु ।। ६५ ।।
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद् भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ।। ६६ ।।
४९४ उत्तरः-संसार-समुद्रसे उद्धार करनेवाले और सर्वश्रेष्ठ, ४९५ गोपतिः-गोपालरूपसे गायोंकी रक्षा करनेवाले, ४९६ गोप्ता-समस्त प्राणियोंका पालन और रक्षा करनेवाले, ४९७ ज्ञानगम्यः-ज्ञानके द्वारा जाननेमें आनेवाले, ४९८ पुरातनः-सदा एकरस रहनेवाले, सबके आदि पुराणपुरुष, ४९९ शरीरभूतभृत्-शरीरके उत्पादक पञ्चभूतोंका प्राणरूपसे पालन करनेवाले, ५०० भोक्ता-निरतिशय आनन्दपुंजको भोगनेवाले, ५०१ कपीन्द्रः-बंदरोंके स्वामी श्रीराम, ५०२ भूरिदक्षिणः-श्रीरामादि अवतारोंमें यज्ञ करते समय बहुत-सी दक्षिणा प्रदान करनेवाले ।। ६६ ।।
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित् पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ।। ६७ ।।
५०३ सोमपः-यज्ञोंमें देवरूपसे और यजमानरूपसे सोमरसका पान करनेवाले, ५०४ अमृतपः-समुद्रमन्थनसे निकाला हुआ अमृत देवोंको पिलाकर स्वयं पीनेवाले, ५०५ सोमः-ओषधियोंका पोषण करनेवाले चन्द्रमारूप, ५०६ पुरुजित्-बहुतोंको विजय लाभ करनेवाले, ५०७ पुरुसत्तमः-विश्वरूप और अत्यन्त श्रेष्ठ, ५०८ विनयः-दुष्टोंको दण्ड देनेवाले, ५०९ जयः-सबपर विजय प्राप्त करनेवाले, ५१० सत्यसंधः-सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले, ५११ दाशार्हः-दाशार्हकुलमें प्रकट होनेवाले, ५१२ सात्वतां पतिः-यादवोंके और अपने भक्तोंके स्वामी ।। ६७ ।।
जीवो विनयितासाक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ।। ६८ ।।
५१३ जीवः-क्षेत्रज्ञरूपसे प्राणोंको धारण करनेवाले, ५१४ विनयितासाक्षी-अपने शरणापन्न भक्तोंके विनय-भावको तत्काल प्रत्यक्ष अनुभव करनेवाले, ५१५ मुकुन्दः-मुक्तिदाता, ५१६ अमितविक्रमः-वामनावतारमें पृथ्वी नापते समय अत्यन्त विस्तृत पैर रखनेवाले, ५१७ अम्भोनिधिः-जलके निधान समुद्रस्वरूप, ५१८ अनन्तात्मा-अनन्तमूर्ति, ५१९ महोदधिशयः-प्रलयकालके महान् समुद्रमें शयन करनेवाले, ५२० अन्तकः-प्राणियोंका संहार करनेवाले मृत्युस्वरूप ।। ६८ ।।
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ।। ६९ ।।
५२१ अजः-अकार भगवान् विष्णुका वाचक है, उससे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मास्वरूप, ५२२ महार्हः-पूजनीय, ५२३ स्वाभाव्यः-नित्य सिद्ध होनेके कारण स्वभावसे ही उत्पन्न न होनेवाले, ५२४ जितामित्रः-रावण-शिशुपालादि शत्रुओंको जीतनेवाले, ५२५ प्रमोदनः-