महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1432, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ६२ ॥
४५५ सुव्रतः-प्रणतपालनादि श्रेष्ठ व्रतोंवाले, ४५६ सुमुखः-सुन्दर और प्रसन्न मुखवाले, ४५७ सूक्ष्मः-अणुसे भी अणु, ४५८ सुघोषः-सुन्दर और गम्भीर वाणी बोलनेवाले, ४५९ सुखदः-अपने भक्तोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले, ४६० सुहृत्-प्राणिमात्रपर अहैतुकी दया करनेवाले परम मित्र, ४६१ मनोहरः-अपने रूप-लावण्य और मधुर भाषणादिसे सबके मनको हरनेवाले, ४६२ जितक्रोधः-क्रोधपर विजय करनेवाले अर्थात् अपने साथ अत्यन्त अनुचित व्यवहार करनेवालेपर भी क्रोध न करनेवाले, ४६३ वीरबाहुः-अत्यन्त पराक्रमशील भुजाओंसे युक्त, ४६४ विदारणः-अधर्मियोंको नष्ट करनेवाले ॥ ६२ ॥
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ६३ ॥
४६५ स्वापनः-प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंको अज्ञाननिद्रामें शयन करानेवाले, ४६६ स्ववशः-स्वतन्त्र, ४६७ व्यापी-आकाशकी भाँति सर्वव्यापी, ४६८ नैकात्मा-प्रत्येक युगमें लोकोद्धारके लिये अनेक रूप धारण करनेवाले, ४६९ नैककर्मकृत्-जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप तथा भिन्न-भिन्न अवतारोंमें मनोहर लीलारूप अनेक कर्म करनेवाले, ४७० वत्सरः-सबके निवास-स्थान, ४७१ वत्सलः-भक्तोंके परम स्नेही, ४७२ वत्सी-वृन्दावनमें बछड़ोंका पालन करनेवाले, ४७३ रत्नगर्भः-रत्नोंको अपने गर्भमें धारण करनेवाले समुद्ररूप, ४७४ धनेश्वरः-सब प्रकारके धनोंके स्वामी ॥ ६३ ॥
धर्मगुब् धर्मकृद् धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ६४ ॥
४७५ धर्मगुप्-धर्मकी रक्षा करनेवाले, ४७६ धर्म-कृत्-धर्मकी स्थापना करनेके लिये स्वयं धर्मका आचरण करनेवाले, ४७७ धर्मी-सम्पूर्ण धर्मोंके आधार, ४७८ सत्-सत्यस्वरूप, ४७९ असत्-स्थूल जगत्स्वरूप, ४८० क्षरम्-सर्वभूतमय, ४८१ अक्षरम्-अविनाशी, ४८२ अविज्ञाता-क्षेत्रज्ञ जीवात्माको विज्ञाता कहते हैं, उनसे विलक्षण भगवान् विष्णु, ४८३ सहस्रांशुः-हजारों किरणोंवाले सूर्यस्वरूप, ४८४ विधाता-सबको अच्छी प्रकार धारण करनेवाले, ४८५ कृतलक्षणः-श्रीवत्स आदि चिह्नोंको धारण करनेवाले ॥ ६४ ॥
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ ६५ ॥
४८६ गभस्तिनेमिः-किरणोंके बीचमें सूर्यरूपसे स्थित, ४८७ सत्त्वस्थः-अन्तर्यामीरूपसे समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित रहनेवाले, ४८८ सिंहः-भक्त प्रह्लादके लिये नृसिंह रूप धारण करनेवाले, ४८९ भूतमहेश्वरः-सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वर, ४९० आदिदेवः-सबके आदि कारण और दिव्यस्वरूप, ४९१ महादेवः-ज्ञानयोग