भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1431, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1431

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ५८ ॥ ४१६ ऋतुः-ऋतुस्वरूप, ४१७ सुदर्शनः-भक्तोंको सुगमतासे ही दर्शन दे देनेवाले, ४१८ कालः-सबकी गणना करनेवाले, ४१९ परमेष्ठी-अपनी प्रकृष्ट महिमामें स्थित रहनेके स्वभाववाले, ४२० परिग्रहः-शरणाथियोंके द्वारा सब ओरसे ग्रहण किये जानेवाले, ४२१ उग्रः-सूर्यादिके भी भयके कारण, ४२२ संवत्सरः-सम्पूर्ण भूतोंके वासस्थान, ४२३ दक्षः-सब कार्योंको बड़ी कुशलतासे करनेवाले, ४२४ विश्रामः-विश्रामकी इच्छावाले मुमुक्षुओंको मोक्ष देनेवाले, ४२५ विश्वदक्षिणः-बलिके यज्ञमें समस्त विश्वको दक्षिणारूपमें प्राप्त करनेवाले ॥ ५८ ॥

विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् । अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ५९ ॥ ४२६ विस्तारः-समस्त लोकोंके विस्तारके स्थान, ४२७ स्थावरस्थाणुः-स्वयं स्थितिशील रहकर पृथ्वी आदि, स्थितिशील पदार्थोंको अपनेमें स्थित रखनेवाले, ४२८ प्रमाणम्-ज्ञानस्वरूप होनेके कारण स्वयं प्रमाणरूप, ४२९ बीजमव्ययम्-संसारके अविनाशी कारण, ४३० अर्थः-सुखस्वरूप होनेके कारण सबके द्वारा प्रार्थनीय, ४३१ अनर्थः-पूर्णकाम होनेके कारण प्रयोजनरहित, ४३२ महाकोशः-बड़े खजानेवाले, ४३३ महाभोगः-यथार्थ सुखरूप महान् भोगवाले, ४३४ महाधनः-अतिशय यथार्थ धनस्वरूप ॥ ५९ ॥

अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः । नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ ६० ॥ ४३५ अनिर्विण्णः-उकताहटरूप विकारसे रहित, ४३६ स्थविष्ठः-विराट्रूपसे स्थित, ४३७ अभूः-अजन्मा, ४३८ धर्मयूपः-धर्मके स्तम्भरूप, ४३९ महामखः-महान् यज्ञस्वरूप, ४४० नक्षत्रनेमिः-समस्त नक्षत्रोंके केन्द्रस्वरूप, ४४१ नक्षत्री-चन्द्ररूप, ४४२ क्षमः-समस्त कार्योंमें समर्थ, ४४३ क्षामः-समस्त जगत्के निवासस्थान, ४४४ समीहनः-सृष्टि आदिके लिये भलीभाँति चेष्टा करनेवाले ॥ ६० ॥

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः । सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ६१ ॥ ४४५ यज्ञः-भगवान् विष्णु, ४४६ इज्यः-पूजनीय, ४४७ महेज्यः-सबसे अधिक उपासनीय, ४४८ क्रतुः-स्तम्भयुक्त यज्ञस्वरूप, ४४९ सत्रम्-सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेवाले, ४५० सतां गतिः-सत्पुरुषोंकी परम गति, ४५१ सर्वदर्शी-समस्त प्राणियोंको और उनके कार्योंको देखनेवाले, ४५२ विमुक्तात्मा-सांसारिक बन्धनसे नित्यमुक्त आत्मस्वरूप, ४५३ सर्वज्ञः-सबको जाननेवाले, ४५४ ज्ञानमुत्तमम्-सर्वोत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप ॥ ६१ ॥

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 1431, कुल 2566 में से · BharatKosha