भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1430, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1430

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः । करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ ५४ ॥ ३७३ उद्भवः:-जगत्की उत्पत्तिके उपादानकारण, ३७४ क्षोभणः:-जगत्की उत्पत्तिके समय प्रकृति और पुरुषमें प्रविष्ट होकर उन्हें क्षुब्ध करनेवाले, ३७५ देवः:-प्रकाशस्वरूप, ३७६ श्रीगर्भः:-सम्पूर्ण ऐश्वर्यको अपने उदरमें रखनेवाले, ३७७ परमेश्वरः:-सर्वश्रेष्ठ शासन करनेवाले, ३७८ करणम्-संसारकी उत्पत्तिके सबसे बड़े साधन, ३७९ कारणम्-जगत्के उपादान और निमित्तकारण, ३८० कर्ता-सबके रचयिता, ३८१ विकर्ता-विचित्र भुवनोंकी रचना करनेवाले, ३८२ गहनः-अपने विलक्षण स्वरूप, सामर्थ्य और लीलादिके कारण पहचाने न जा सकनेवाले, ३८३ गुहः:-मायासे अपने स्वरूपको ढक लेनेवाले ॥ ५४ ॥

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः । परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ ५५ ॥ ३८४ व्यवसायः-ज्ञानस्वरूप, ३८५ व्यवस्थानः-लोकपालादिकोंको, समस्त जीवोंको, चारों वर्णाश्रमोंको एवं उनके धर्मोंको व्यवस्थापूर्वक रचनेवाले, ३८६ संस्थानः-प्रलयके सम्यक् स्थान, ३८७ स्थानदः-ध्रुवादि भक्तोंको स्थान देनेवाले, ३८८ ध्रुवः-अचल स्वरूप, ३८९ परर्द्धिः-श्रेष्ठ विभूतिवाले, ३९० परमस्पष्टः-ज्ञानस्वरूप होनेसे परम स्पष्टरूप, ३९१ तुष्टः-एकमात्र परमानन्दस्वरूप, ३९२ पुष्टः-एकमात्र सर्वत्र परिपूर्ण, ३९३ शुभेक्षणः-दर्शनमात्रसे कल्याण करनेवाले ॥ ५५ ॥

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः । वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ ५६ ॥ ३९४ रामः-योगीजनोंके रमण करनेके लिये नित्यानन्दस्वरूप, ३९५ विरामः-प्रलयके समय प्राणियोंको अपनेमें विराम देनेवाले, ३९६ विरजः-रजोगुण तथा तमोगुणसे सर्वथा शून्य, ३९७ मार्गः-मुमुक्षुजनोंके अमर होनेके साधनस्वरूप, ३९८ नेयः-उत्तम ज्ञानसे ग्रहण करनेयोग्य, ३९९ नयः-सबको नियममें रखनेवाले, ४०० अनयः-स्वतन्त्र, ४०१ वीरः-पराक्रमशाली, ४०२ शक्तिमतां श्रेष्ठः-शक्तिमानोंमें भी अतिशय शक्तिमान्, ४०३ धर्मः-धर्मस्वरूप, ४०४ धर्मविदुत्तमः-समस्त धर्मवेत्ताओंमें उत्तम ॥ ५६ ॥

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः । हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ ५७ ॥ ४०५ वैकुण्ठः-परमधामस्वरूप, ४०६ पुरुषः-विश्वरूप शरीरमें शयन करनेवाले, ४०७ प्राणः-प्राणवायुरूपसे चेष्टा करनेवाले, ४०८ प्राणदः-सर्गके आदिमें प्राण प्रदान करनेवाले, ४०९ प्रणवः-ओंकार-स्वरूप, ४१० पृथुः-विराट्रूपसे विस्तृत होनेवाले, ४११ हिरण्यगर्भः-ब्रह्मारूपसे प्रकट होनेवाले, ४१२ शत्रुघ्नः-देवताओंके शत्रुओंको मारनेवाले, ४१३ व्याप्तः-कारणरूपसे सब कार्योंमें व्याप्त, ४१४ वायुः-पवनरूप, ४१५ अधोक्षजः-अपने स्वरूपसे क्षीण न होनेवाले ॥ ५७ ॥