महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ५८ ॥ ४१६ ऋतुः-ऋतुस्वरूप, ४१७ सुदर्शनः-भक्तोंको सुगमतासे ही दर्शन दे देनेवाले, ४१८ कालः-सबकी गणना करनेवाले, ४१९ परमेष्ठी-अपनी प्रकृष्ट महिमामें स्थित रहनेके स्वभाववाले, ४२० परिग्रहः-शरणाथियोंके द्वारा सब ओरसे ग्रहण किये जानेवाले, ४२१ उग्रः-सूर्यादिके भी भयके कारण, ४२२ संवत्सरः-सम्पूर्ण भूतोंके वासस्थान, ४२३ दक्षः-सब कार्योंको बड़ी कुशलतासे करनेवाले, ४२४ विश्रामः-विश्रामकी इच्छावाले मुमुक्षुओंको मोक्ष देनेवाले, ४२५ विश्वदक्षिणः-बलिके यज्ञमें समस्त विश्वको दक्षिणारूपमें प्राप्त करनेवाले ॥ ५८ ॥
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् । अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ५९ ॥ ४२६ विस्तारः-समस्त लोकोंके विस्तारके स्थान, ४२७ स्थावरस्थाणुः-स्वयं स्थितिशील रहकर पृथ्वी आदि, स्थितिशील पदार्थोंको अपनेमें स्थित रखनेवाले, ४२८ प्रमाणम्-ज्ञानस्वरूप होनेके कारण स्वयं प्रमाणरूप, ४२९ बीजमव्ययम्-संसारके अविनाशी कारण, ४३० अर्थः-सुखस्वरूप होनेके कारण सबके द्वारा प्रार्थनीय, ४३१ अनर्थः-पूर्णकाम होनेके कारण प्रयोजनरहित, ४३२ महाकोशः-बड़े खजानेवाले, ४३३ महाभोगः-यथार्थ सुखरूप महान् भोगवाले, ४३४ महाधनः-अतिशय यथार्थ धनस्वरूप ॥ ५९ ॥
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः । नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ ६० ॥ ४३५ अनिर्विण्णः-उकताहटरूप विकारसे रहित, ४३६ स्थविष्ठः-विराट्रूपसे स्थित, ४३७ अभूः-अजन्मा, ४३८ धर्मयूपः-धर्मके स्तम्भरूप, ४३९ महामखः-महान् यज्ञस्वरूप, ४४० नक्षत्रनेमिः-समस्त नक्षत्रोंके केन्द्रस्वरूप, ४४१ नक्षत्री-चन्द्ररूप, ४४२ क्षमः-समस्त कार्योंमें समर्थ, ४४३ क्षामः-समस्त जगत्के निवासस्थान, ४४४ समीहनः-सृष्टि आदिके लिये भलीभाँति चेष्टा करनेवाले ॥ ६० ॥
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः । सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ६१ ॥ ४४५ यज्ञः-भगवान् विष्णु, ४४६ इज्यः-पूजनीय, ४४७ महेज्यः-सबसे अधिक उपासनीय, ४४८ क्रतुः-स्तम्भयुक्त यज्ञस्वरूप, ४४९ सत्रम्-सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेवाले, ४५० सतां गतिः-सत्पुरुषोंकी परम गति, ४५१ सर्वदर्शी-समस्त प्राणियोंको और उनके कार्योंको देखनेवाले, ४५२ विमुक्तात्मा-सांसारिक बन्धनसे नित्यमुक्त आत्मस्वरूप, ४५३ सर्वज्ञः-सबको जाननेवाले, ४५४ ज्ञानमुत्तमम्-सर्वोत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप ॥ ६१ ॥
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ६२ ॥
४५५ सुव्रतः-प्रणतपालनादि श्रेष्ठ व्रतोंवाले, ४५६ सुमुखः-सुन्दर और प्रसन्न मुखवाले, ४५७ सूक्ष्मः-अणुसे भी अणु, ४५८ सुघोषः-सुन्दर और गम्भीर वाणी बोलनेवाले, ४५९ सुखदः-अपने भक्तोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले, ४६० सुहृत्-प्राणिमात्रपर अहैतुकी दया करनेवाले परम मित्र, ४६१ मनोहरः-अपने रूप-लावण्य और मधुर भाषणादिसे सबके मनको हरनेवाले, ४६२ जितक्रोधः-क्रोधपर विजय करनेवाले अर्थात् अपने साथ अत्यन्त अनुचित व्यवहार करनेवालेपर भी क्रोध न करनेवाले, ४६३ वीरबाहुः-अत्यन्त पराक्रमशील भुजाओंसे युक्त, ४६४ विदारणः-अधर्मियोंको नष्ट करनेवाले ॥ ६२ ॥
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ६३ ॥
४६५ स्वापनः-प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंको अज्ञाननिद्रामें शयन करानेवाले, ४६६ स्ववशः-स्वतन्त्र, ४६७ व्यापी-आकाशकी भाँति सर्वव्यापी, ४६८ नैकात्मा-प्रत्येक युगमें लोकोद्धारके लिये अनेक रूप धारण करनेवाले, ४६९ नैककर्मकृत्-जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप तथा भिन्न-भिन्न अवतारोंमें मनोहर लीलारूप अनेक कर्म करनेवाले, ४७० वत्सरः-सबके निवास-स्थान, ४७१ वत्सलः-भक्तोंके परम स्नेही, ४७२ वत्सी-वृन्दावनमें बछड़ोंका पालन करनेवाले, ४७३ रत्नगर्भः-रत्नोंको अपने गर्भमें धारण करनेवाले समुद्ररूप, ४७४ धनेश्वरः-सब प्रकारके धनोंके स्वामी ॥ ६३ ॥
धर्मगुब् धर्मकृद् धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ६४ ॥
४७५ धर्मगुप्-धर्मकी रक्षा करनेवाले, ४७६ धर्म-कृत्-धर्मकी स्थापना करनेके लिये स्वयं धर्मका आचरण करनेवाले, ४७७ धर्मी-सम्पूर्ण धर्मोंके आधार, ४७८ सत्-सत्यस्वरूप, ४७९ असत्-स्थूल जगत्स्वरूप, ४८० क्षरम्-सर्वभूतमय, ४८१ अक्षरम्-अविनाशी, ४८२ अविज्ञाता-क्षेत्रज्ञ जीवात्माको विज्ञाता कहते हैं, उनसे विलक्षण भगवान् विष्णु, ४८३ सहस्रांशुः-हजारों किरणोंवाले सूर्यस्वरूप, ४८४ विधाता-सबको अच्छी प्रकार धारण करनेवाले, ४८५ कृतलक्षणः-श्रीवत्स आदि चिह्नोंको धारण करनेवाले ॥ ६४ ॥
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ ६५ ॥
४८६ गभस्तिनेमिः-किरणोंके बीचमें सूर्यरूपसे स्थित, ४८७ सत्त्वस्थः-अन्तर्यामीरूपसे समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित रहनेवाले, ४८८ सिंहः-भक्त प्रह्लादके लिये नृसिंह रूप धारण करनेवाले, ४८९ भूतमहेश्वरः-सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वर, ४९० आदिदेवः-सबके आदि कारण और दिव्यस्वरूप, ४९१ महादेवः-ज्ञानयोग
और ऐश्वर्य आदि महिमाओंसे युक्त, ४९२ देवेशः-समस्त देवोंके स्वामी, ४९३ देवभृद्गुरुः-देवोंका विशेषरूपसे भरण-पोषण करनेवाले उनके परम गुरु ।। ६५ ।।
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद् भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ।। ६६ ।।
४९४ उत्तरः-संसार-समुद्रसे उद्धार करनेवाले और सर्वश्रेष्ठ, ४९५ गोपतिः-गोपालरूपसे गायोंकी रक्षा करनेवाले, ४९६ गोप्ता-समस्त प्राणियोंका पालन और रक्षा करनेवाले, ४९७ ज्ञानगम्यः-ज्ञानके द्वारा जाननेमें आनेवाले, ४९८ पुरातनः-सदा एकरस रहनेवाले, सबके आदि पुराणपुरुष, ४९९ शरीरभूतभृत्-शरीरके उत्पादक पञ्चभूतोंका प्राणरूपसे पालन करनेवाले, ५०० भोक्ता-निरतिशय आनन्दपुंजको भोगनेवाले, ५०१ कपीन्द्रः-बंदरोंके स्वामी श्रीराम, ५०२ भूरिदक्षिणः-श्रीरामादि अवतारोंमें यज्ञ करते समय बहुत-सी दक्षिणा प्रदान करनेवाले ।। ६६ ।।
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित् पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ।। ६७ ।।
५०३ सोमपः-यज्ञोंमें देवरूपसे और यजमानरूपसे सोमरसका पान करनेवाले, ५०४ अमृतपः-समुद्रमन्थनसे निकाला हुआ अमृत देवोंको पिलाकर स्वयं पीनेवाले, ५०५ सोमः-ओषधियोंका पोषण करनेवाले चन्द्रमारूप, ५०६ पुरुजित्-बहुतोंको विजय लाभ करनेवाले, ५०७ पुरुसत्तमः-विश्वरूप और अत्यन्त श्रेष्ठ, ५०८ विनयः-दुष्टोंको दण्ड देनेवाले, ५०९ जयः-सबपर विजय प्राप्त करनेवाले, ५१० सत्यसंधः-सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले, ५११ दाशार्हः-दाशार्हकुलमें प्रकट होनेवाले, ५१२ सात्वतां पतिः-यादवोंके और अपने भक्तोंके स्वामी ।। ६७ ।।
जीवो विनयितासाक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ।। ६८ ।।
५१३ जीवः-क्षेत्रज्ञरूपसे प्राणोंको धारण करनेवाले, ५१४ विनयितासाक्षी-अपने शरणापन्न भक्तोंके विनय-भावको तत्काल प्रत्यक्ष अनुभव करनेवाले, ५१५ मुकुन्दः-मुक्तिदाता, ५१६ अमितविक्रमः-वामनावतारमें पृथ्वी नापते समय अत्यन्त विस्तृत पैर रखनेवाले, ५१७ अम्भोनिधिः-जलके निधान समुद्रस्वरूप, ५१८ अनन्तात्मा-अनन्तमूर्ति, ५१९ महोदधिशयः-प्रलयकालके महान् समुद्रमें शयन करनेवाले, ५२० अन्तकः-प्राणियोंका संहार करनेवाले मृत्युस्वरूप ।। ६८ ।।
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ।। ६९ ।।
५२१ अजः-अकार भगवान् विष्णुका वाचक है, उससे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मास्वरूप, ५२२ महार्हः-पूजनीय, ५२३ स्वाभाव्यः-नित्य सिद्ध होनेके कारण स्वभावसे ही उत्पन्न न होनेवाले, ५२४ जितामित्रः-रावण-शिशुपालादि शत्रुओंको जीतनेवाले, ५२५ प्रमोदनः-
स्मरणमात्रसे नित्य प्रमुदित करनेवाले, ५२६ आनन्दः-आनन्दस्वरूप, ५२७ नन्दनः-सबको प्रसन्न करनेवाले, ५२८ नन्दः-सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न, ५२९ सत्यधर्मा-धर्मज्ञानादि सब गुणोंसे युक्त, ५३० त्रिविक्रमः-तीन डगमें तीनों लोकोंको नापनेवाले ॥ ६९ ॥
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ७० ॥
५३१ महर्षिः कपिलाचार्यः-सांख्यशास्त्रके प्रणेता भगवान् कपिलाचार्य, ५३२ कृतज्ञः-अपने भक्तोंकी सेवाको बहुत मानकर अपनेको उनका ऋणी समझनेवाले, ५३३ मेदिनीपतिः-पृथ्वीके स्वामी, ५३४ त्रिपदः-त्रिलोकीरूप तीन पैरोंवाले विश्वरूप, ५३५ त्रिदशाध्यक्षः-देवताओंके स्वामी, ५३६ महाशृङ्गः-मत्स्यावतारमें महान् सींग धारण करनेवाले, ५३७ कृतान्तकृत्-स्मरण करनेवालोंके समस्त कर्मोंका अन्त करनेवाले ॥ ७० ॥
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ७१ ॥
५३८ महावराहः-हिरण्याक्षका वध करनेके लिये महावराहरूप धारण करनेवाले, ५३९ गोविन्दः-नष्ट हुई पृथ्वीको पुनः प्राप्त कर लेनेवाले, ५४० सुषेणः-पार्षदोंके समुदायरूप सुन्दर सेनासे सुसज्जित, ५४१ कनकाङ्गदी-सुवर्णका बाजूबंद धारण करनेवाले, ५४२ गुह्यः-हृदयाकाशमें छिपे रहनेवाले, ५४३ गभीरः-अतिशय गम्भीर स्वभाववाले, ५४४ गहनः-जिनके स्वरूपमें प्रविष्ट होना अत्यन्त कठिन हो—ऐसे, ५४५ गुप्तः-वाणी और मनसे जाननेमें न आनेवाले, ५४६ चक्रगदाधरः-भक्तोंकी रक्षा करनेके लिये चक्र और गदा आदि दिव्य आयुधोंको धारण करनेवाले ॥ ७१ ॥
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ ७२ ॥
५४७ वेधाः-सब कुछ विधान करनेवाले, ५४८ स्वाङ्गः-कार्य करनेमें स्वयं ही सहकारी, ५४९ अजितः-किसीके द्वारा न जीते जानेवाले, ५५० कृष्णः-श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण, ५५१ दृढः-अपने स्वरूप और सामर्थ्यसे कभी भी च्युत न होनेवाले, ५५२ सङ्कर्षणोऽच्युतः-प्रलयकालमें एक साथ सबका संहार करनेवाले और जिनका कभी किसी भी कारणसे पतन न हो सके—ऐसे अविनाशी, ५५३ वरुणः-जलके स्वामी वरुणदेवता, ५५४ वारुणः-वरुणके पुत्र वशिष्ठस्वरूप, ५५५ वृक्षः-अश्वत्थवृक्षरूप, ५५६ पुष्कराक्षः-कमलके समान नेत्रवाले, ५५७ महामनाः-संकल्पमात्रसे उत्पत्ति, पालन और संहार आदि समस्त लीला करनेकी शक्तिवाले ॥ ७२ ॥
भगवान् भगहानन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ ७३ ॥
५५८ भगवान्-उत्पत्ति और प्रलय, आना और जाना तथा विद्या और अविद्याको जाननेवाले एवं सर्वैश्वर्यादि छहों भगोंसे युक्त, ५५९ भगहा-अपने भक्तोंका प्रेम बढ़ानेके लिये उनके ऐश्वर्यका हरण करनेवाले, ५६० आनन्दी-परम सुखस्वरूप, ५६१ वनमाली-वैजयन्ती वनमाला धारण करनेवाले, ५६२ हलायुधः-हलरूप शस्त्रको धारण करनेवाले बलभद्रस्वरूप, ५६३ आदित्यः-अदितिपुत्र वामन-भगवान्, ५६४ ज्योतिरादित्यः-सूर्यमण्डलमें विराजमान ज्योतिःस्वरूप, ५६५ सहिष्णुः-समस्त द्वन्द्वोंको सहन करनेमें समर्थ, ५६६ गतिसत्तमः-सर्वश्रेष्ठ गतिस्वरूप ।। ७३ ।।
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः । दिविस्पृक् सर्वदृग् व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ।। ७४ ।।
५६७ सुधन्वा-अतिशय सुन्दर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, ५६८ खण्डपरशुः-शत्रुओंका खण्डन करनेवाले फरसेको धारण करनेवाले परशुरामस्वरूप, ५६९ दारुणः-सन्मार्गविरोधियोंके लिये महान् भयंकर, ५७० द्रविणप्रदः-अर्थार्थी भक्तोंको धन-सम्पत्ति प्रदान करनेवाले, ५७१ दिविस्पृक्-स्वर्गलोकतक व्याप्त, ५७२ सर्वदृग् व्यासः-सबके द्रष्टा एवं वेदका विभाग करनेवाले श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासस्वरूप, ५७३ वाचस्पतिरयोनिजः-विद्याके स्वामी तथा बिना योनिके स्वयं ही प्रकट होनेवाले ।। ७४ ।।
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् । संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ।। ७५ ।।
५७४ त्रिसामा-देवव्रत आदि तीन साम श्रुतियोंद्वारा जिनकी स्तुति की जाती है—ऐसे परमेश्वर, ५७५ सामगः-सामवेदका गान करनेवाले, ५७६ साम-सामवेदस्वरूप, ५७७ निर्वाणम्-परमशान्तिके निधान परमानन्दस्वरूप, ५७८ भेषजम्-संसार-रोगकी ओषधि, ५७९ भिषक्-संसाररोगका नाश करनेके लिये गीतारूप उपदेशामृतका पान करानेवाले परम वैद्य, ५८० संन्यासकृत्-मोक्षके लिये संन्यासाश्रम और संन्यासयोगका निर्माण करनेवाले, ५८१ शमः-उपशमताका उपदेश देनेवाले, ५८२ शान्तः-परम शान्तस्वरूप, ५८३ निष्ठा-सबकी स्थितिके आधार अधिष्ठानस्वरूप, ५८४ शान्तिः-परम शान्तिस्वरूप, ५८५ परायणम्-मुमुक्षु पुरुषोंके परम प्राप्य-स्थान ।। ७५ ।।
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः । गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ।। ७६ ।।
५८६ शुभाङ्गः-अति मनोहर परम सुन्दर अंगोंवाले, ५८७ शान्तिदः-परम शान्ति देनेवाले, ५८८ स्रष्टा-सर्गके आदिमें सबकी रचना करनेवाले, ५८९ कुमुदः-पृथ्वीपर प्रसन्नतापूर्वक लीला करनेवाले, ५९० कुवलेशयः-जलमें शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले, ५९१ गोहितः-गोपालरूपसे गायोंका और अवतार धारण करके भार उतारकर पृथ्वीका हित करनेवाले, ५९२ गोपतिः-पृथ्वीके और गायोंके स्वामी, ५९३ गोप्ता-अवतार धारण करके सबके सम्मुख प्रकट होते समय अपनी मायासे अपने स्वरूपको आच्छादित
करनेवाले, ५९४ वृषाध्यक्षः-समस्त कामनाओंकी वर्षा करनेवाली कृपादृष्टिसे युक्त, ५९५ वृषप्रियः-धर्मसे प्यार करनेवाले ।। ७६ ।।
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः । श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ।। ७७ ।।
५९६ अनिवर्ती-रणभूमिमें और धर्मपालनमें पीछे न हटनेवाले, ५९७ निवृत्तात्मा-स्वभावसे ही विषय-वासनारहित नित्य शुद्ध मनवाले, ५९८ संक्षेप्ता-विस्तृत जगत्को संहारकालमें संक्षिप्त यानी सूक्ष्म करनेवाले, ५९९ क्षेमकृत्-शरणागतकी रक्षा करनेवाले, ६०० शिवः-स्मरणमात्रसे पवित्र करनेवाले कल्याणस्वरूप, ६०१ श्रीवत्सवक्षाः-श्रीवत्स नामक चिह्नको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले, ६०२ श्रीवासः-श्रीलक्ष्मीजीके वासस्थान, ६०३ श्रीपतिः-परमशक्तिरूपा श्रीलक्ष्मीजीके स्वामी, ६०४ श्रीमतां वरः-सब प्रकारकी सम्पत्ति और ऐश्वर्यसे युक्त ब्रह्मादि समस्त लोकपालोंसे श्रेष्ठ ।। ७७ ।।
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः । श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ।। ७८ ।।
६०५ श्रीदः-भक्तोंको श्री प्रदान करनेवाले, ६०६ श्रीशः-लक्ष्मीके नाथ, ६०७ श्रीनिवासः-श्रीलक्ष्मीजीके अन्तःकरणमें नित्य निवास करनेवाले, ६०८ श्रीनिधिः-समस्त श्रियोंके आधार, ६०९ श्रीविभावनः-सब मनुष्योंके लिये उनके कर्मानुसार नाना प्रकारके ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले, ६१० श्रीधरः-जगज्जननी श्रीको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले, ६११ श्रीकरः-स्मरण, स्तवन और अर्चन आदि करनेवाले भक्तोंके लिये श्रीका विस्तार करनेवाले, ६१२ श्रेयः-कल्याणस्वरूप, ६१३ श्रीमान्-सब प्रकारकी श्रियोंसे युक्त, ६१४ लोकत्रयाश्रयः-तीनों लोकोंके आधार ।। ७८ ।।
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः । विजितात्माविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्न संशयः ।। ७९ ।।
६१५ स्वक्षः-मनोहर कृपाकटाक्षसे युक्त परम सुन्दर आँखोंवाले, ६१६ स्वङ्गः-अतिशय कोमल, परम सुन्दर, मनोहर अंगोंवाले, ६१७ शतानन्दः-लीलाभेदसे सैकड़ों विभागोंमें विभक्त आनन्दस्वरूप, ६१८ नन्दिः-परमानन्दस्वरूप, ६१९ ज्योतिर्गणेश्वरः-नक्षत्रसमुदायोंके ईश्वर, ६२० विजितात्मा-जिते हुए मनवाले, ६२१ अविधेयात्मा-जिनके असली स्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सके—ऐसे अनिर्वचनीयस्वरूप, ६२२ सत्कीर्तिः-सच्ची कीर्तिवाले, ६२३ छिन्नसंशयः-सब प्रकारके संशयोंसे रहित ।। ७९ ।।
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः । भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ।। ८० ।।
६२४ उदीर्णः-सब प्राणियोंसे श्रेष्ठ, ६२५ सर्व-तश्चक्षुः-समस्त वस्तुओंको सब दिशाओंमें सदा-सर्वदा देखनेकी शक्तिवाले, ६२६ अनीशः-जिनका दूसरा कोई शासक न
हो—ऐसे स्वतन्त्र, ६२७ शाश्वतस्थिरः-सदा एकरस स्थिर रहनेवाले, निर्विकार, ६२८ भूशयः-लंकागमनके लिये मार्गकी याचना करते समय समुद्रतटकी भूमिपर शयन करनेवाले, ६२९ भूषणः-स्वेच्छासे नाना अवतार लेकर अपने चरण-चिह्नोंसे भूमिकी शोभा बढ़ानेवाले, ६३० भूतिः-समस्त विभूतियोंके आधारस्वरूप, ६३१ विशोकः-सब प्रकारसे शोकरहित, ६३२ शोकनाशनः-स्मृतिमात्रसे भक्तोंके शोकका समूल नाश करनेवाले ।। ८० ।।
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ।। ८१ ।।
६३३ अर्चिष्मान्-चन्द्र-सूर्य आदि समस्त ज्योतियोंको देदीप्यमान करनेवाली अतिशय प्रकाशमय अनन्त किरणोंसे युक्त, ६३४ अर्चितः-ब्रह्मादि समस्त लोकोंसे पूजे जानेवाले, ६३५ कुम्भः-घटकी भाँति सबके निवासस्थान, ६३६ विशुद्धात्मा-परम शुद्ध निर्मल आत्मस्वरूप, ६३७ विशोधनः-स्मरणमात्रसे समस्त पापोंका नाश करके भक्तोंके अन्तःकरणको परम शुद्ध कर देनेवाले, ६३८ अनिरुद्धः-जिनको कोई बाँधकर नहीं रख सके—ऐसे चतुर्व्यूहमें अनिरुद्धस्वरूप, ६३९ अप्रतिरथः-प्रतिपक्षसे रहित, ६४० प्रद्युम्नः-परम श्रेष्ठ अपार धनसे युक्त चतुर्व्यूहमें प्रद्युम्नस्वरूप, ६४१ अमितविक्रमः-अपार पराक्रमी ।। ८१ ।।
कालनेमीनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ।। ८२ ।।
६४२ कालनेमीनिहा-कालनेमि नामक असुरको मारनेवाले, ६४३ वीरः-परम शूरवीर, ६४४ शौरिः-शूरकुलमें उत्पन्न होनेवाले श्रीकृष्णस्वरूप, ६४५ शूरजनेश्वरः-अतिशय शूरवीरताके कारण इन्द्रादि शूरवीरोंके भी इष्ट, ६४६ त्रिलोकात्मा-अन्तर्यामीरूपसे तीनों लोकोंके आत्मा, ६४७ त्रिलोकेशः-तीनों लोकोंके स्वामी, ६४८ केशवः-ब्रह्मा, विष्णु और शिव-स्वरूप, ६४९ केशिहा-केशी नामके असुरको मारनेवाले, ६५० हरिः-स्मरणमात्रसे समस्त पापोंका हरण करनेवाले ।। ८२ ।।
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनंजयः ।। ८३ ।।
६५१ कामदेवः-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंको चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा अभिलषित समस्त कामनाओंके अधिष्ठाता परमदेव, ६५२ कामपालः-सकामी भक्तोंकी कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले, ६५३ कामी-अपने प्रियतमोंको चाहनेवाले, ६५४ कान्तः-परम मनोहर स्वरूप, ६५५ कृतागमः-समस्त वेद और शास्त्रोंको रचनेवाले, ६५६ अनिर्देश्यवपुः-जिनके दिव्य स्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सके—ऐसे अनिर्वचनीय शरीरवाले, ६५७ विष्णुः-शेषशायी भगवान् विष्णु, ६५८ वीरः-बिना ही पैरोंके गमन करनेकी दिव्य शक्तिसे युक्त, ६५९ अनन्तः-जिनके स्वरूप, शक्ति, ऐश्वर्य, सामर्थ्य
और गुणोंका कोई भी पार नहीं पा सकता—ऐसे अविनाशी गुण, प्रभाव और शक्तियोंसे युक्त, ६६० धनञ्जयः-अर्जुनरूपसे दिग्विजयके समय बहुत-सा धन जीतकर लानेवाले ।। ८३ ।।
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ।। ८४ ।।
६६१ ब्रह्मण्यः-तप, वेद, ब्राह्मण और ज्ञानकी रक्षा करनेवाले, ६६२ ब्रह्मकृत्-पूर्वोक्त तप आदिकी रचना करनेवाले, ६६३ ब्रह्मा-ब्रह्मारूपसे जगत्को उत्पन्न करनेवाले, ६६४ ब्रह्म-सच्चिदानन्दस्वरूप, ६६५ ब्रह्मविवर्धनः-पूर्वोक्त ब्रह्मशब्दवाची तप आदिकी वृद्धि करनेवाले, ६६६ ब्रह्मवित्-वेद और वेदार्थको पूर्णतया जाननेवाले, ६६७ ब्राह्मणः-समस्त वस्तुओंको ब्रह्मरूपसे देखनेवाले, ६६८ ब्रह्मी-ब्रह्मशब्दवाची तपादि समस्त पदार्थोंके अधिष्ठान, ६६९ ब्रह्मज्ञः-अपने आत्मस्वरूप ब्रह्मशब्दवाची वेदको पूर्णतया यथार्थ जाननेवाले, ६७० ब्राह्मणप्रियः-ब्राह्मणोंको अतिशय प्रिय माननेवाले ।। ८४ ।।
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ।। ८५ ।।
६७१ महाक्रमः-बड़े वेगसे चलनेवाले, ६७२ महाकर्मा-भिन्न-भिन्न अवतारोंमें नाना प्रकारके महान् कर्म करनेवाले, ६७३ महातेजाः-जिसके तेजसे समस्त सूर्य आदि तेजस्वी देदीप्यमान होते हैं—ऐसे महान् तेजस्वी, ६७४ महोरगः-बड़े भारी सर्प यानी वासुकिस्वरूप, ६७५ महाक्रतुः-महान् यज्ञस्वरूप, ६७६ महायज्वा-लोकसंग्रहके लिये बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले, ६७७ महायज्ञः-जपयज्ञ आदि भगवत्प्राप्तिके साधनरूप समस्त यज्ञ जिनकी विभूतियाँ हैं—ऐसे महान् यज्ञस्वरूप, ६७८ महाहविः-ब्रह्मरूप अग्निमें हवन किये जाने योग्य प्रपञ्चरूप हवि जिनका स्वरूप है—ऐसे महान् हविःस्वरूप ।। ८५ ।।
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ।। ८६ ।।
६७९ स्तव्यः-सबके द्वारा स्तुति किये जाने योग्य, ६८० स्तवप्रियः-स्तुतिसे प्रसन्न होनेवाले, ६८१ स्तोत्रम्-जिनके द्वारा भगवान्के गुण-प्रभावका कीर्तन किया जाता है, वह स्तोत्र, ६८२ स्तुतिः-स्तवनक्रियास्वरूप, ६८३ स्तोता-स्तुति करनेवाले, ६८४ रणप्रियः-युद्धमें प्रेम करनेवाले, ६८५ पूर्णः-समस्त ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य और गुणोंसे परिपूर्ण, ६८६ पूरयिता-अपने भक्तोंको सब प्रकारसे परिपूर्ण करनेवाले, ६८७ पुण्यः-स्मरणमात्रसे पापोंका नाश करनेवाले पुण्यस्वरूप, ६८८ पुण्यकीर्तिः-परमपावन कीर्तिवाले, ६८९ अनामयः-आन्तरिक और बाह्य सब प्रकारकी व्याधियोंसे रहित ।। ८६ ।।
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ।। ८७ ।।
६९० मनोजवः:-मनकी भाँति वेगवाले, ६९१ तीर्थकरः:-समस्त विद्याओंके रचयिता और उपदेशकर्ता, ६९२ वसुरेताः:-हिरण्मय पुरुष (प्रथम पुरुषसृष्टिका बीज) जिनका वीर्य है—ऐसे सुवर्णवीर्य, ६९३ वसुप्रदः:-प्रचुर धन प्रदान करनेवाले, ६९४ वसुप्रदः:-अपने भक्तोंको मोक्षरूप महान् धन देनेवाले, ६९५ वासुदेवः:-वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण, ६९६ वसुः:-सबके अन्तःकरणमें निवास करनेवाले, ६९७ वसुमनाः:-समानभावसे सबमें निवास करनेकी शक्तिसे युक्त मनवाले, ६९८ हविः:-यज्ञमें हवन किये जाने योग्य हविःस्वरूप ।। ८७ ।।
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ।। ८८ ।।
६९९ सद्गतिः:-सत्पुरुषोंद्वारा प्राप्त किये जाने योग्य गतिस्वरूप, ७०० सत्कृतिः:-जगत्की रक्षा आदि सत्कार्य करनेवाले, ७०१ सत्ता-सदा-सर्वदा विद्यमान सत्तास्वरूप, ७०२ सद्भूतिः:-बहुत प्रकारसे बहुत रूपोंमें भासित होनेवाले, ७०३ सत्परायणः:-सत्पुरुषोंके परम प्रापणीय स्थान, ७०४ शूरसेनः:-हनुमानादि श्रेष्ठ शूरवीर योद्धाओंसे युक्त सेनावाले, ७०५ यदुश्रेष्ठः:-यदुवंशियोंमें सर्वश्रेष्ठ, ७०६ सन्निवासः:-सत्पुरुषोंके आश्रय, ७०७ सुयामुनः:-जिनके परिकर यमुना-तट निवासी गोपालबाल आदि अति सुन्दर हैं, ऐसे श्रीकृष्ण ।। ८८ ।।
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ।। ८९ ।।
७०८ भूतावासः:-समस्त प्राणियोंके मुख्य निवास-स्थान, ७०९ वासुदेवः:-अपनी मायासे जगत्को आच्छादित करनेवाले परमदेव, ७१० सर्वासुनिलयः:-समस्त प्राणियोंके आधार, ७११ अनलः:-अपार शक्ति और सम्पत्तिसे युक्त, ७१२ दर्पहा-धर्मविरुद्ध मार्गमें चलनेवालोंके घमण्डको नष्ट करनेवाले, ७१३ दर्पदः:-अपने भक्तोंको विशुद्ध उत्साह प्रदान करनेवाले, ७१४ दृप्तः:-नित्यानन्दमग्न, ७१५ दुर्धरः:-बड़ी कठिनतासे हृदयमें धारित होनेवाले, ७१६ अपराजितः:-दूसरोंसे अजित ।। ८९ ।।
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ।। ९० ।।
७१७ विश्वमूर्तिः:-समस्त विश्व ही जिनकी मूर्ति है—ऐसे विराट्स्वरूप, ७१८ महामूर्तिः:-बड़े रूपवाले, ७१९ दीप्तमूर्तिः:-स्वेच्छासे धारण किये हुए देदीप्यमान स्वरूपसे युक्त, ७२० अमूर्तिमान्-जिनकी कोई मूर्ति नहीं—ऐसे निराकार, ७२१ अनेकमूर्तिः:-नाना अवतारोंमें स्वेच्छासे लोगोंका उपकार करनेके लिये बहुत मूर्तियोंको धारण करनेवाले, ७२२ अव्यक्तः:-अनेक मूर्ति होते हुए भी जिनका स्वरूप किसी प्रकार व्यक्त न किया जा सके—ऐसे अप्रकटस्वरूप, ७२३ शतमूर्तिः:-सैकड़ों मूर्तियोंवाले, ७२४ शताननः:-सैकड़ों मुखोंवाले ।। ९० ।।
एको नैकः सवः कः किं यत् तत् पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ ९१ ॥
७२५ एकः-सब प्रकारके भेद-भावोंसे रहित अद्वितीय, ७२६ नैकः-अवतार-भेदसे अनेक, ७२७ सवः-जिनमें सोमनामकी ओषधिका रस निकाला जाता है—ऐसे यज्ञ-स्वरूप, ७२८ कः-सुखस्वरूप, ७२९ किम्-विचारणीय ब्रह्मस्वरूप, ७३० यत्-स्वतःसिद्ध, ७३१ तत्-विस्तार करनेवाले, ७३२ पदमनुत्तमम्-मुमुक्षु पुरुषोंद्वारा प्राप्त किये जाने योग्य अत्युत्तम परमपदस्वरूप, ७३३ लोकबन्धुः-समस्त प्राणियोंके हित करनेवाले परम मित्र, ७३४ लोकनाथः-सबके द्वारा याचना किये जानेयोग्य लोकस्वामी, ७३५ माधवः-मधुकुलमें उत्पन्न होनेवाले, ७३६ भक्तवत्सलः-भक्तोंसे प्रेम करनेवाले ॥ ९१ ॥
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ ९२ ॥
७३७ सुवर्णवर्णः-सोनेके समान पीतवर्णवाले, ७३८ हेमाङ्गः-सोनेके समान चमकीले अङ्गोंवाले, ७३९ वराङ्गः-परम श्रेष्ठ अंग-प्रत्यंगोंवाले, ७४० चन्दनाङ्गदी-चन्दनके लेप और बाजूबंदसे सुशोभित, ७४१ वीरहा-शूरवीर असुरोंका नाश करनेवाले, ७४२ विषमः-जिनके समान दूसरा कोई नहीं—ऐसे अनुपम, ७४३ शून्यः-समस्त विशेषणोंसे रहित, ७४४ घृताशीः-अपने आश्रित जनोंके लिये कृपासे सने हुए द्रवित संकल्प करनेवाले, ७४५ अचलः-किसी प्रकार भी विचलित न होनेवाले—अविचल, ७४६ चलः-वायुरूपसे सर्वत्र गमन करनेवाले ॥ ९२ ॥
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ ९३ ॥
७४७ अमानी-स्वयं मान न चाहनेवाले, ७४८ मानदः-दूसरोंको मान देनेवाले, ७४९ मान्यः-सबके पूजनेयोग्य माननीय, ७५० लोकस्वामी-चौदह भुवनोंके स्वामी, ७५१ त्रिलोकधृक्-तीनों लोकोंको धारण करनेवाले, ७५२ सुमेधाः-अति उत्तम सुन्दर बुद्धिवाले, ७५३ मेधजः-यज्ञमें प्रकट होनेवाले, ७५४ धन्यः-नित्य कृतकृत्य होनेके कारण सर्वथा धन्यवादके पात्र, ७५५ सत्यमेधाः-सच्ची और श्रेष्ठ बुद्धिवाले, ७५६ धराधरः-अनन्त भगवान्के रूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले ॥ ९३ ॥
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ ९४ ॥
७५७ तेजोवृषः-अपने भक्तोंपर आनन्दमय तेजकी वर्षा करनेवाले, ७५८ द्युतिधरः-परम कान्तिको धारण करनेवाले, ७५९ सर्वशस्त्रभृतां वरः-समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, ७६० प्रग्रहः-भक्तोंके द्वारा अर्पित पत्र-पुष्पादिको ग्रहण करनेवाले, ७६१ निग्रहः-सबका निग्रह करनेवाले, ७६२ व्यग्रः-अपने भक्तोंको अभीष्ट फल देनेमें लगे हुए, ७६३ नैकशृङ्गः-
नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातरूप चार सींगोंको धारण करनेवाले शब्दब्रह्मस्वरूप, ७६४ गदाग्रजः-गदसे पहले जन्म लेनेवाले श्रीकृष्ण ॥ ९४ ॥ चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः । चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ९५ ॥ ७६५ चतुर्मूर्तिः-राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्नरूप चार मूर्तियोंवाले, ७६६ चतुर्बाहुः-चार भुजाओंवाले, ७६७ चतुर्व्यूहः-वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार व्यूहोंसे युक्त, ७६८ चतुर्गतिः-सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्यरूप चार परम गतिस्वरूप, ७६९ चतुरात्मा-मन, बुद्धि, अहंकार और चित्तरूप चार अन्तःकरणवाले, ७७० चतुर्भावः-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंके उत्पत्तिस्थान, ७७१ चतुर्वेदवित्-चारों वेदोंके अर्थको भलीभाँति जाननेवाले, ७७२ एकपात्-एक पादवाले यानी एक पाद (अंश)-से समस्त विश्वको व्याप्त करनेवाले ॥ ९५ ॥ समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः । दुर्लभो दुर्गमो दुर्गे दुरावासो दुरारिहा ॥ ९६ ॥ ७७३ समावर्तः-संसारचक्रको भलीभाँति घुमानेवाले, ७७४ अनिवृत्तात्मा-सर्वत्र विद्यमान होनेके कारण जिनका आत्मा कहींसे भी हटा हुआ नहीं है, ऐसे, ७७५ दुर्जयः-किसीसे भी जीतनेमें न आनेवाले, ७७६ दुरतिक्रमः-जिनकी आज्ञाका कोई उल्लंघन नहीं कर सके, ऐसे, ७७७ दुर्लभः-बिना भक्तिके प्राप्त न होनेवाले, ७७८ दुर्गमः-कठिनतासे जाननेमें आनेवाले, ७७९ दुर्गः-कठिनतासे प्राप्त होनेवाले, ७८० दुरावासः-बड़ी कठिनतासे योगीजनोंद्वारा हृदयमें बसाये जानेवाले, ७८१ दुरारिहा-दुष्ट मार्गमें चलनेवाले दैत्योंका वध करनेवाले ॥ ९६ ॥ शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः । इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ ९७ ॥ ७८२ शुभाङ्गः-कल्याणकारक सुन्दर अंगोंवाले, ७८३ लोकसारङ्गः-लोकोंके सारको ग्रहण करनेवाले, ७८४ सु तन्तुः-सुन्दर विस्तृत जगत्रूप तन्तुवाले, ७८५ तन्तु वर्धनः-पूर्वोक्त जगत्-तन्तुको बढ़ानेवाले, ७८६ इन्द्रकर्मा-इन्द्रके समान कर्मवाले, ७८७ महाकर्मा-बड़े-बड़े कर्म करनेवाले, ७८८ कृतकर्मा-जो समस्त कर्तव्य कर्म कर चुके हों, जिनका कोई कर्तव्य शेष न रहा हो—ऐसे कृतकृत्य, ७८९ कृतागमः-स्वोचित अनेक कार्योंको पूर्ण करनेके लिये अवतार धारण करके आनेवाले ॥ ९७ ॥ उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः । अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ ९८ ॥ ७९० उद्भवः-स्वेच्छासे श्रेष्ठ जन्म धारण करनेवाले, ७९१ सुन्दरः-परम सुन्दर, ७९२ सुन्दः-परम करुणाशील, ७९३ रत्ननाभः-रत्नके समान सुन्दर नाभिवाले, ७९४ सुलोचनः-सुन्दर नेत्रोंवाले, ७९५ अर्कः-ब्रह्मादि पूज्य पुरुषोंके भी पूजनीय, ७९६
वाजसनः-याचकोंको अन्न प्रदान करनेवाले, ७९७ शृङ्गी-प्रलयकालमें सींगयुक्त मत्स्यविशेषका रूप धारण करनेवाले, ७९८ जयन्तः-शत्रुओंको पूर्णतया जीतनेवाले, ७९९ सर्वविज्जयी-सब कुछ जाननेवाले और सबको जीतनेवाले ।। ९८ ।। सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः । महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ।। ९९ ।। ८०० सुवर्णबिन्दुः-सुन्दर अक्षर और बिन्दुसे युक्त ओंकारस्वरूप, ८०१ अक्षोभ्यः-किसीके द्वारा भी क्षुभित न किये जा सकनेवाले, ८०२ सर्ववागीश्वरेश्वरः-समस्त वाणीपतियोंके यानी ब्रह्मादिके भी स्वामी, ८०३ महाह्रदः-ध्यान करनेवाले जिसमें गोता लगाकर आनन्दमें मग्न होते हैं, ऐसे परमानन्दके महान् सरोवर, ८०४ महागर्तः-महान् रथवाले, ८०५ महाभूतः-त्रिकालमें कभी नष्ट न होनेवाले महाभूतस्वरूप, ८०६ महानिधिः-सबके महान् निवास-स्थान ।। ९९ ।। कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः । अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।। १०० ।। ८०७ कुमुदः-कु अर्थात् पृथ्वीको उसका भार उतारकर प्रसन्न करनेवाले, ८०८ कुन्दरः-हिरण्याक्षको मारनेके लिये पृथ्वीको विदीर्ण करनेवाले, ८०९ कुन्दः-परशुराम-अवतारमें पृथ्वी प्रदान करनेवाले, ८१० पर्जन्यः-बादलकी भाँति समस्त इष्ट वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले, ८११ पावनः-स्मरणमात्रसे पवित्र करनेवाले, ८१२ अनिलः-सदा प्रबुद्ध रहनेवाले, ८१३ अमृताशः-जिनकी आशा कभी विफल न हो—ऐसे अमोघसंकल्प, ८१४ अमृतवपुः-जिनका कलेवर कभी नष्ट न हो—ऐसे नित्य विग्रह, ८१५ सर्वज्ञः-सदा-सर्वदा सब कुछ जाननेवाले, ८१६ सर्वतोमुखः-सब ओर मुखवाले यानी जहाँ कहीं भी उनके भक्त भक्तिपूर्वक पत्र-पुष्पादि जो कुछ भी अर्पण करें, उसे भक्षण करनेवाले ।। १०० ।। सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः । न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ।। १०१ ।। ८१७ सुलभः-नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेवालेको और एकनिष्ठ श्रद्धालु भक्तको बिना ही परिश्रमके सुगमतासे प्राप्त होनेवाले, ८१८ सुव्रतः-सुन्दर भोजन करनेवाले यानी अपने भक्तोंद्वारा प्रेमपूर्वक अर्पण किये हुए पत्र-पुष्पादि मामूली भोजनको भी परम श्रेष्ठ मानकर खानेवाले, ८१९ सिद्धः-स्वभावसे ही समस्त सिद्धियोंसे युक्त, ८२० शत्रुजित्-देवता और सत्पुरुषोंके शत्रुओंको जीतनेवाले, ८२१ शत्रुतापनः-देव-शत्रुओंको तपानेवाले, ८२२ न्यग्रोधः-वटवृक्षरूप, ८२३ उदुम्बरः-कारणरूपसे आकाशके भी ऊपर रहनेवाले, ८२४ अश्वत्थः-पीपल वृक्षस्वरूप, ८२५ चाणूरान्ध्रनिषूदनः-चाणूर नामक अन्ध्रजातिके वीर मल्लको मारनेवाले ।। १०१ ।। सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः । अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद् भयनाशनः ।। १०२ ।।
८२६ सहस्रार्चिः-अनन्त किरणोंवाले सूर्यरूप, ८२७ सप्तजिह्वः-काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरुचि—इन सात जिह्वाओंवाले अग्निस्वरूप, ८२८ सप्तैधाः-सात दीप्तिवाले अग्निस्वरूप, ८२९ सप्तवाहनः-सात घोड़ोंवाले सूर्यरूप, ८३० अमूर्तिः-मूर्तिरहित निराकार, ८३१ अनघः-सब प्रकारसे निष्पाप, ८३२ अचिन्त्यः-किसी प्रकार भी चिन्तन करनेमें न आनेवाले अव्यक्तस्वरूप, ८३३ भयकृत्-दुष्टोंको भयभीत करनेवाले, ८३४ भयनाशनः-स्मरण करनेवालोंके और सत्पुरुषोंके भयका नाश करनेवाले ।। १०२ ।।
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ।। १०३ ।।
८३५ अणुः-अत्यन्त सूक्ष्म, ८३६ बृहत्-सबसे बड़े, ८३७ कृशः-अत्यन्त पतले और हलके, ८३८ स्थूलः-अत्यन्त मोटे और भारी, ८३९ गुणभृत्-समस्त गुणोंको धारण करनेवाले, ८४० निर्गुणः-सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे अतीत, ८४१ महान्-गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और ज्ञान आदिकी अतिशयताके कारण परम महत्त्वसम्पन्न, ८४२ अधृतः-जिनको कोई भी धारण नहीं कर सकता—ऐसे निराधार, ८४३ स्वधृतः-अपने-आपसे धारित यानी अपनी ही महिमामें स्थित, ८४४ स्वास्यः-सुन्दर मुखवाले, ८४५ प्राग्वंशः-जिनसे समस्त वंश-परम्परा आरम्भ हुई है—ऐसे समस्त पूर्वजोंके भी पूर्वज आदिपुरुष, ८४६ वंशवर्धनः-जगत्-प्रपंचरूप वंशको और यादव वंशको बढ़ानेवाले ।। १०३ ।।
भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ।। १०४ ।।
८४७ भारभृत्-शेषनाग आदिके रूपमें पृथ्वीका भार उठानेवाले और अपने भक्तोंके योगक्षेमरूप भारको वहन करनेवाले, ८४८ कथितः-वेद-शास्त्र और महापुरुषोंद्वारा जिनके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपका बारंबार कथन किया गया है, ऐसे सबके द्वारा वर्णित, ८४९ योगी-नित्य समाधियुक्त, ८५० योगीशः-समस्त योगियोंके स्वामी, ८५१ सर्वकामदः-समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, ८५२ आश्रमः-सबको विश्राम देनेवाले, ८५३ श्रमणः-दुष्टोंको संतप्त करनेवाले, ८५४ क्षामः-प्रलयकालमें सब प्रजाका क्षय करनेवाले, ८५५ सुपर्णः-वेदरूप सुन्दर पत्तोंवाले (संसारवृक्षस्वरूप), ८५६ वायुवाहनः-वायुको गमन करनेके लिये शक्ति देनेवाले ।। १०४ ।।
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ता नियमोऽयमः ।। १०५ ।।
८५७ धनुर्धरः-धनुषधारी श्रीराम, ८५८ धनुर्वेदः-धनुर्विद्याको जाननेवाले श्रीराम, ८५९ दण्डः-दमन करनेवालोंकी दमनशक्ति, ८६० दमयिता-यम और राजा आदिके रूपमें दमन करनेवाले, ८६१ दमः-दण्डका कार्य यानी जिनको दण्ड दिया जाता है, उनका सुधार, ८६२ अपराजितः-शत्रुओंद्वारा पराजित न होनेवाले, ८६३ सर्वसहः-सब कुछ सहन करनेकी
सामर्थ्यसे युक्त, अतिशय तितिक्षु, ८६४ नियन्ता-सबको अपने-अपने कर्तव्यमें नियुक्त करनेवाले, ८६५ अनियमः-नियमोंसे न बँधे हुए, जिनका कोई भी नियन्त्रण करनेवाला नहीं, ऐसे परमस्वतन्त्र, ८६६ अयमः-जिनका कोई शासक नहीं ॥ १०५ ॥
सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ १०६ ॥
८६७ सत्त्ववान्-बल, वीर्य, सामर्थ्य आदि समस्त तत्त्वोंसे सम्पन्न, ८६८ सात्त्विकः-सत्त्वगुणप्रधानविग्रह, ८६९ सत्यः-सत्यभाषणस्वरूप, ८७० सत्यधर्मपरायणः-यथार्थ भाषण और धर्मके परम आधार, ८७१ अभिप्रायः-प्रेमीजन जिनको चाहते हैं—ऐसे परम इष्ट, ८७२ प्रियार्हः-अत्यन्त प्रिय वस्तु समर्पण करनेके लिये योग्य पात्र, ८७३ अर्हः-सबके परम पूज्य, ८७४ प्रियकृत्-भजनेवालोंका प्रिय करनेवाले, ८७५ प्रीतिवर्धनः-अपने प्रेमियोंके प्रेमको बढ़ानेवाले ॥ १०६ ॥
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग् विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ १०७ ॥
८७६ विहायसगतिः-आकाशमें गमन करनेवाले, ८७७ ज्योतिः-स्वयंप्रकाशस्वरूप, ८७८ सुरुचिः-सुन्दर रुचि और कान्तिवाले, ८७९ हुतभुक्-यज्ञमें हवन की हुई समस्त हविको अग्निरूपसे भक्षण करनेवाले, ८८० विभुः-सर्वव्यापी, ८८१ रविः-समस्त रसोंका शोषण करनेवाले सूर्य, ८८२ विरोचनः-विविध प्रकारसे प्रकाश फैलानेवाले, ८८३ सूर्यः-शोभाको प्रकट करनेवाले, ८८४ सविता-समस्त जगत्को उत्पन्न करनेवाले, ८८५ रविलोचनः-सूर्यरूप नेत्रोंवाले ॥ १०७ ॥
अनन्तो हुतभुग् भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ १०८ ॥
८८६ अनन्तः-सब प्रकारसे अन्तरहित, ८८७ हुतभुक्-यज्ञमें हवन की हुई सामग्रीको उन-उन देवताओंके रूपमें भक्षण करनेवाले, ८८८ भोक्ता-जगत्का पालन करनेवाले, ८८९ सुखदः-भक्तोंको दर्शनरूप परम सुख देनेवाले, ८९० नैकजः-धर्मरक्षा, साधुरक्षा आदि परम विशुद्ध हेतुओंसे स्वेच्छापूर्वक अनेक जन्म धारण करनेवाले, ८९१ अग्रजः-सबसे पहले जन्मनेवाले आदिपुरुष, ८९२ अनिर्विण्णः-पूर्णकाम होनेके कारण उकताहटसे रहित, ८९३ सदामर्षी-सत्पुरुषोंपर क्षमा करनेवाले, ८९४ लोकाधिष्ठानम्-समस्त लोकोंके आधार, ८९५ अद्भुतः-अत्यन्त आश्चर्यमय ॥ १०८ ॥
सनात् सनातनतमः कपिलः कपिरप्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत् स्वस्ति स्वस्तिभुक् स्वस्तिदक्षिणः ॥ १०९ ॥
८९६ सनात्-अनन्तकालस्वरूप, ८९७ सनातनतमः-सबके कारण होनेसे ब्रह्मादि पुरुषोंकी अपेक्षा भी परम पुराणपुरुष, ८९८ कपिलः-महर्षि कपिलावतार, ८९९ कपिः-सूर्यदेव, ९०० अप्ययः-सम्पूर्ण जगत्के लयस्थान, ९०१ स्वस्तिदः-परमानन्दरूप मंगल
देनेवाले, ९०२ स्वस्तिकृत्-आश्रितजनोंका कल्याण करनेवाले, ९०३ स्वस्ति-कल्याणस्वरूप, ९०४ स्वस्तिभुक्-भक्तोंके परम कल्याणकी रक्षा करनेवाले, ९०५ स्वस्तिदक्षिणः-कल्याण करनेमें समर्थ और शीघ्र कल्याण करनेवाले ॥ १०९ ॥ अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः । शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ ११० ॥ ९०६ अरौद्रः-सब प्रकारके रुद्र (क्रूर) भावोंसे रहित शान्तिमूर्ति, ९०७ कुण्डली-सूर्यके समान प्रकाशमान मकराकृति कुण्डलोंको धारण करनेवाले, ९०८ चक्री-सुदर्शनचक्रको धारण करनेवाले, ९०९ विक्रमी-सबसे विलक्षण पराक्रमशील, ९१० ऊर्जितशासनः-जिनका श्रुति-स्मृतिरूप शासन अत्यन्त श्रेष्ठ है—ऐसे अतिश्रेष्ठ शासन करनेवाले, ९११ शब्दातिगः-शब्दकी जहाँ पहुँच नहीं, ऐसे वाणीके अविषय, ९१२ शब्दसहः-कठोर शब्दोंको सहन करनेवाले, ९१३ शिशिरः-त्रितापपीड़ितोंको शान्ति देनेवाले शीतलमूर्ति, ९१४ शर्वरीकरः-ज्ञानियोंकी रात्रि संसार और अज्ञानियोंकी रात्रि ज्ञान—इन दोनोंको उत्पन्न करनेवाले ॥ ११० ॥ अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः । विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ १११ ॥ ९१५ अक्रूरः-सब प्रकारके क्रूरभावोंसे रहित, ९१६ पेशलः-मन, वाणी और कर्म—सभी दृष्टियोंसे सुन्दर होनेके कारण परम सुन्दर, ९१७ दक्षः-सब प्रकारसे समृद्ध, परमशक्तिशाली और क्षणमात्रमें बड़े-से-बड़ा कार्य कर देनेवाले महान् कार्यकुशल, ९१८ दक्षिणः-संहारकारी, ९१९ क्षमिणां वरः-क्षमा करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ, ९२० विद्वत्तमः-विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ परम विद्वान्, ९२१ वीतभयः-सब प्रकारके भयसे रहित, ९२२ पुण्यश्रवणकीर्तनः-जिनके नाम, गुण, महिमा और स्वरूपका श्रवण और कीर्तन परम पावन हैं; ऐसे ॥ १११ ॥ उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः । वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ ११२ ॥ ९२३ उत्तारणः-संसार-सागरसे पार करनेवाले, ९२४ दुष्कृतिहा-पापोंका और पापियोंका नाश करनेवाले, ९२५ पुण्यः-स्मरण आदि करनेवाले समस्त पुरुषोंको पवित्र कर देनेवाले, ९२६ दुःस्वप्ननाशनः-ध्यान, स्मरण, कीर्तन और पूजन करनेसे बुरे स्वप्नोंका नाश करनेवाले, ९२७ वीरहा-शरणागतोंकी विविध गतियोंका यानी संसार-चक्रका नाश करनेवाले, ९२८ रक्षणः-सब प्रकारसे रक्षा करनेवाले, ९२९ सन्तः-विद्या, विनय और धर्म आदिका प्रचार करनेके लिये संतोंके रूपमें प्रकट होनेवाले, ९३० जीवनः-समस्त प्रजाको प्राणरूपसे जीवित रखनेवाले, ९३१ पर्यवस्थितः-समस्त विश्वको व्याप्त करके स्थित रहनेवाले ॥ ११२ ॥ अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरस्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ ११३ ॥ ९३२ अनन्तरूपः-अमितरूपवाले, ९३३ अनन्तश्रीः-अपरिमित शोभासम्पन्न, ९३४ जितमन्युः-सब प्रकारसे क्रोधको जीत लेनेवाले, ९३५ भयापहः-भक्तभयहारी, ९३६ चतुरस्रः-मंगलमूर्ति, ९३७ गभीरात्मा-गम्भीर मनवाले, ९३८ विदिशः-अधिकारियोंको उनके कर्मानुसार विभागपूर्वक नाना प्रकारके फल देनेवाले, ९३९ व्यादिशः-सबको यथायोग्य विविध आज्ञा देनेवाले, ९४० दिशः-वेदरूपसे समस्त कर्मोंका फल बतलानेवाले ॥ ११३ ॥
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः । जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ ११४ ॥ ९४१ अनादिः-जिसका आदि कोई न हो ऐसे सबके कारणस्वरूप, ९४२ भूर्भुवः-पृथ्वीके भी आधार, ९४३ लक्ष्मीः-समस्त शोभायमान वस्तुओंकी शोभास्वरूप, ९४४ सुवीरः-उत्तम योद्धा, ९४५ रुचिराङ्गदः-परम रुचिकर कल्याणमय बाजूबंदोंको धारण करनेवाले, ९४६ जननः-प्राणिमात्रको उत्पन्न करनेवाले, ९४७ जनजन्मादिः-जन्म लेनेवालोंके जन्मके मूल कारण, ९४८ भीमः-दुष्टोंको भय देनेवाले, ९४९ भीमपराक्रमः-अतिशय भय उत्पन्न करनेवाले, पराक्रमसे युक्त ॥ ११४ ॥
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः । ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ ११५ ॥ ९५० आधारनिलयः-आधारस्वरूप पृथ्वी आदि समस्त भूतोंके स्थान, ९५१ अधाता-जिसका कोई भी बनानेवाला न हो ऐसे स्वयं स्थित, ९५२ पुष्पहासः-पुष्पकी भाँति विकसित हास्यवाले, ९५३ प्रजागरः-भली प्रकार जाग्रत् रहनेवाले नित्यप्रबुद्ध, ९५४ ऊर्ध्वगः-सबसे ऊपर रहनेवाले, ९५५ सत्पथाचारः-सत्पुरुषोंके मार्गका आचरण करनेवाले मर्यादापुरुषोत्तम, ९५६ प्राणदः-परीक्षित् आदि मरे हुओंको भी जीवन देनेवाले, ९५७ प्रणवः-ॐकारस्वरूप, ९५८ पणः-यथायोग्य व्यवहार करनेवाले ॥ ११५ ॥
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत् प्राणजीवनः । तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ ११६ ॥ ९५९ प्रमाणम्-स्वतःसिद्ध होनेसे स्वयं प्रमाणस्वरूप, ९६० प्राणनिलयः-प्राणोंके आधारभूत, ९६१ प्राणभृत्-समस्त प्राणोंका पोषण करनेवाले, ९६२ प्राणजीवनः-प्राणवायुके संचारसे प्राणियोंको जीवित रखनेवाले, ९६३ तत्त्वम्-यथार्थ तत्त्वरूप, ९६४ तत्त्ववित्-यथार्थ तत्त्वको पूर्णतया जाननेवाले, ९६५ एकात्मा-अद्वितीयस्वरूप, ९६६ जन्ममृत्युजरातिगः-जन्म, मृत्यु और बुढ़ापा आदि शरीरके धर्मोंसे सर्वथा अतीत ॥ ११६ ॥
भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः । यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ ११७ ॥
९६७ भूर्भुवःस्वस्तरुः-‘भूः भुवः स्वः’ तीनों लोकोंवाले, संसारवृक्षस्वरूप, ९६८ तारः-संसार-सागरसे पार उतारनेवाले, ९६९ सविता-सबको उत्पन्न करनेवाले, ९७० प्रपितामहः-पितामह ब्रह्माके भी पिता, ९७१ यज्ञः-यज्ञस्वरूप, ९७२ यज्ञपतिः-समस्त यज्ञोंके अधिष्ठाता, ९७३ यज्वा-यजमानरूपसे यज्ञ करनेवाले, ९७४ यज्ञाङ्गः-समस्त यज्ञरूप अंगोंवाले, वाराहस्वरूप, ९७५ यज्ञवाहनः-यज्ञोंको चलानेवाले ।। ११७ ।।
यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ।। ११८ ।।
९७६ यज्ञभृत्-यज्ञोंको धारण करनेवाले, ९७७ यज्ञकृत्-यज्ञोंके रचयिता, ९७८ यज्ञी-समस्त यज्ञ जिसमें समाप्त होते हैं—ऐसे यज्ञशेषी, ९७९ यज्ञभुक्-समस्त यज्ञोंके भोक्ता, ९८० यज्ञसाधनः-ब्रह्मयज्ञ, जपयज्ञ आदि बहुत-से यज्ञ जिनकी प्राप्तिके साधन हैं ऐसे, ९८१ यज्ञान्तकृत्-यज्ञोंका फल देनेवाले, ९८२ यज्ञगुह्यम्-यज्ञोंमें गुप्त निष्काम यज्ञस्वरूप, ९८३ अन्नम्-समस्त प्राणियोंके अन्न यानी अन्नकी भाँति उनकी सब प्रकारसे तुष्टि-पुष्टि करनेवाले, ९८४ अन्नादः-समस्त अन्नोंके भोक्ता ।। ११८ ।।
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ।। ११९ ।।
९८५ आत्मयोनिः-जिनका कारण दूसरा कोई नहीं ऐसे स्वयं योनिस्वरूप, ९८६ स्वयंजातः-स्वयं अपने-आप स्वेच्छापूर्वक प्रकट होनेवाले, ९८७ वैखानः-पातालवासी हिरण्याक्षका वध करनेके लिये पृथ्वीको खोदनेवाले, वाराह-अवतारधारी, ९८८ सामगायनः-सामवेदका गान करनेवाले, ९८९ देवकीनन्दनः-देवकीपुत्र, ९९० स्रष्टा-समस्त लोकोंके रचयिता, ९९१ क्षितीशः-पृथ्वीपति, ९९२ पापनाशनः-स्मरण, कीर्तन, पूजन और ध्यान आदि करनेसे समस्त पापसमुदायका नाश करनेवाले ।। ११९ ।।
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ।। १२० ।।
९९३ शङ्खभृत्-पाञ्चजन्यशंखको धारण करनेवाले, ९९४ नन्दकी-नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले, ९९५ चक्री-सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले, ९९६ शार्ङ्गधन्वा-शार्ङ्गधनुषधारी, ९९७ गदाधरः-कौमोदकी नामकी गदा धारण करनेवाले, ९९८ रथाङ्गपाणिः-भीष्मकी प्रतिज्ञा रखनेके लिये सुदर्शन चक्रको हाथमें धारण करनेवाले श्रीकृष्ण, ९९९ अक्षोभ्यः-जो किसी प्रकार भी विचलित नहीं किये जा सके, ऐसे, १००० सर्वप्रहरणायुधः-ज्ञात और अज्ञात जितने भी युद्धादिमें काम आनेवाले अस्त्र-शस्त्र हैं, उन सबको धारण करनेवाले ।। १२० ।।
सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति
यहाँ हजार नामोंकी समाप्ति दिखलानेके लिये अन्तिम नामको दुबारा लिखा गया है। मंगलवाची होनेसे ॐकारका स्मरण किया गया है। अन्तमें नमस्कार करके भगवान्की पूजा की गयी है।
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ १२१ ॥
इस प्रकार यह कीर्तन करने योग्य महात्मा केशवके दिव्य एक हजार नामोंका पूर्णरूपसे वर्णन कर दिया ॥ १२१ ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात् किंचित् सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ १२२ ॥
जो मनुष्य इस विष्णुसहस्रनामका सदा श्रवण करता है और जो प्रतिदिन इसका कीर्तन या पाठ करता है, उसका इस लोकमें तथा परलोकमें कहीं भी कुछ अशुभ नहीं होता ॥ १२२ ॥
वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥ १२३ ॥
इस विष्णुसहस्रनामका श्रवण, पठन और कीर्तन करनेसे ब्राह्मण वेदान्त-पारगामी हो जाता है, क्षत्रिय युद्धमें विजय पाता है, वैश्य धनसे सम्पन्न होता है और शूद्र सुख पाता है ॥ १२३ ॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद् धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात् कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात् प्रजाम् ॥ १२४ ॥
धर्मकी इच्छावाला धर्मको पाता है, अर्थकी इच्छावाला अर्थ पाता है, भोगोंकी इच्छावाला भोग पाता है और संतानकी इच्छावाला संतान पाता है ॥ १२४ ॥
भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत् प्रकीर्तयेत् ॥ १२५ ॥
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ १२६ ॥
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान् बलरूपगुणान्वितः ॥ १२७ ॥
जो भक्तिमान् पुरुष सदा प्रातःकालमें उठकर स्नान करके पवित्र हो मनमें विष्णुका ध्यान करता हुआ इस वासुदेव-सहस्रनामका भली प्रकार पाठ करता है, वह महान् यश पाता है, जातिमें महत्त्व पाता है, अचल सम्पत्ति पाता है और अति उत्तम कल्याण पाता है तथा उसको कहीं भय नहीं होता। वह वीर्य और तेजको पाता है तथा आरोग्यवान्, कान्तिमान्, बलवान्, रूपवान् और सर्वगुणसम्पन्न हो जाता है ॥ १२५—१२७ ॥
रोगार्तो मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ १२८ ॥ रोगार्तुर पुरुष रोगसे छूट जाता है, बन्धनमें पड़ा हुआ पुरुष बन्धनसे छूट जाता है, भयभीत भयसे छूट जाता है और आपत्तिमें पड़ा हुआ आपत्तिसे छूट जाता है ॥ १२८ ॥
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् । स्तुवन् नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ १२९ ॥ जो पुरुष भक्तिसम्पन्न होकर इस विष्णुसहस्रनामसे पुरुषोत्तम भगवान्की प्रतिदिन स्तुति करता है, वह शीघ्र ही समस्त संकटोंसे पार हो जाता है ॥ १२९ ॥
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः । सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १३० ॥ जो मनुष्य वासुदेवके आश्रित और उनके परायण है, वह समस्त पापोंसे छूटकर विशुद्ध अन्तःकरणवाला हो सनातन परब्रह्मको पाता है ॥ १३० ॥
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् । जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ १३१ ॥ वासुदेवके भक्तोंका कहीं कभी भी अशुभ नहीं होता है तथा उनको जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिका भी भय नहीं रहता है ॥ १३१ ॥
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ १३२ ॥ जो पुरुष श्रद्धापूर्वक भक्तिभावसे इस विष्णुसहस्रनामका पाठ करता है, वह आत्मसुख, क्षमा, लक्ष्मी, धैर्य, स्मृति और कीर्तिको पाता है ॥ १३२ ॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः । भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३३ ॥ पुरुषोत्तमके पुण्यात्मा भक्तोंको किसी दिन क्रोध नहीं आता, ईर्ष्या उत्पन्न नहीं होती, लोभ नहीं होता और उनकी बुद्धि कभी अशुद्ध नहीं होती ॥ १३३ ॥
द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः । वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ १३४ ॥ स्वर्ग, सूर्य, चन्द्रमा तथा नक्षत्रसहित आकाश, दस दिशाएँ, पृथ्वी और महासागर—ये सब महात्मा वासुदेवके प्रभावसे धारण किये गये हैं ॥ १३४ ॥
ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् । जगद् वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १३५ ॥ देवता, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, सर्प और राक्षससहित यह स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् श्रीकृष्णके अधीन रहकर यथायोग्य बरत रहे हैं ॥ १३५ ॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः । वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ १३६ ॥
इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सत्त्व, तेज, बल, धीरज, क्षेत्र, (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा)—ये सब-के-सब श्रीवासुदेवके रूप हैं, ऐसा वेद कहते हैं ।। १३६ ।।
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ।। १३७ ।।
सब शास्त्रोंमें आचार प्रथम माना जाता है, आचारसे ही धर्मकी उत्पत्ति होती है और धर्मके स्वामी भगवान् अच्युत हैं ।। १३७ ।।
ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ।। १३८ ।।
ऋषि, पितर, देवता, पञ्च महाभूत, धातुएँ और स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण जगत्—ये सब नारायणसे ही उत्पन्न हुए हैं ।। १३८ ।।
योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्या शिल्पादि कर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत् सर्वं जनार्दनात् ।। १३९ ।।
योग, ज्ञान, सांख्य, विद्याएँ, शिल्प आदि कर्म, वेद, शास्त्र और विज्ञान—ये सब विष्णुसे उत्पन्न हुए हैं ।। १३९ ।।
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रींल्लोकान् व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ।। १४० ।।
वे समस्त विश्वके भोक्ता और अविनाशी विष्णु ही एक ऐसे हैं, जो अनेक रूपोंमें विभक्त होकर भिन्न-भिन्न भूतविशेषोंके अनेक रूपोंको धारण कर रहे हैं तथा त्रिलोकीमें व्याप्त होकर सबको भोग रहे हैं ।। १४० ।।
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद् य इच्छेत् पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ।। १४१ ।।
जो पुरुष परम श्रेय और सुख पाना चाहता हो, वह भगवान् व्यासजीके कहे हुए इस विष्णुसहस्रनामस्तोत्रका पाठ करे ।। १४१ ।।
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभवाप्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ।। १४२ ।।
जो विश्वके ईश्वर जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करनेवाले जन्मरहित कमललोचन भगवान् विष्णुका भजन करते हैं, वे कभी पराभव नहीं पाते हैं ।। १४२ ।।
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यामनुशासनपर्वणि
दानधर्मपर्वणि विष्णुसहस्रनामकथने
एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत व्यासनिर्र्मित शतसाहस्रीय संहितासम्बन्धी अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विष्णुसहस्रनामकथनविषयक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा