भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1443, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1443

८२६ सहस्रार्चिः-अनन्त किरणोंवाले सूर्यरूप, ८२७ सप्तजिह्वः-काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरुचि—इन सात जिह्वाओंवाले अग्निस्वरूप, ८२८ सप्तैधाः-सात दीप्तिवाले अग्निस्वरूप, ८२९ सप्तवाहनः-सात घोड़ोंवाले सूर्यरूप, ८३० अमूर्तिः-मूर्तिरहित निराकार, ८३१ अनघः-सब प्रकारसे निष्पाप, ८३२ अचिन्त्यः-किसी प्रकार भी चिन्तन करनेमें न आनेवाले अव्यक्तस्वरूप, ८३३ भयकृत्-दुष्टोंको भयभीत करनेवाले, ८३४ भयनाशनः-स्मरण करनेवालोंके और सत्पुरुषोंके भयका नाश करनेवाले ।। १०२ ।।

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ।। १०३ ।।

८३५ अणुः-अत्यन्त सूक्ष्म, ८३६ बृहत्-सबसे बड़े, ८३७ कृशः-अत्यन्त पतले और हलके, ८३८ स्थूलः-अत्यन्त मोटे और भारी, ८३९ गुणभृत्-समस्त गुणोंको धारण करनेवाले, ८४० निर्गुणः-सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे अतीत, ८४१ महान्-गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और ज्ञान आदिकी अतिशयताके कारण परम महत्त्वसम्पन्न, ८४२ अधृतः-जिनको कोई भी धारण नहीं कर सकता—ऐसे निराधार, ८४३ स्वधृतः-अपने-आपसे धारित यानी अपनी ही महिमामें स्थित, ८४४ स्वास्यः-सुन्दर मुखवाले, ८४५ प्राग्वंशः-जिनसे समस्त वंश-परम्परा आरम्भ हुई है—ऐसे समस्त पूर्वजोंके भी पूर्वज आदिपुरुष, ८४६ वंशवर्धनः-जगत्-प्रपंचरूप वंशको और यादव वंशको बढ़ानेवाले ।। १०३ ।।

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ।। १०४ ।।

८४७ भारभृत्-शेषनाग आदिके रूपमें पृथ्वीका भार उठानेवाले और अपने भक्तोंके योगक्षेमरूप भारको वहन करनेवाले, ८४८ कथितः-वेद-शास्त्र और महापुरुषोंद्वारा जिनके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपका बारंबार कथन किया गया है, ऐसे सबके द्वारा वर्णित, ८४९ योगी-नित्य समाधियुक्त, ८५० योगीशः-समस्त योगियोंके स्वामी, ८५१ सर्वकामदः-समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, ८५२ आश्रमः-सबको विश्राम देनेवाले, ८५३ श्रमणः-दुष्टोंको संतप्त करनेवाले, ८५४ क्षामः-प्रलयकालमें सब प्रजाका क्षय करनेवाले, ८५५ सुपर्णः-वेदरूप सुन्दर पत्तोंवाले (संसारवृक्षस्वरूप), ८५६ वायुवाहनः-वायुको गमन करनेके लिये शक्ति देनेवाले ।। १०४ ।।

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ता नियमोऽयमः ।। १०५ ।।

८५७ धनुर्धरः-धनुषधारी श्रीराम, ८५८ धनुर्वेदः-धनुर्विद्याको जाननेवाले श्रीराम, ८५९ दण्डः-दमन करनेवालोंकी दमनशक्ति, ८६० दमयिता-यम और राजा आदिके रूपमें दमन करनेवाले, ८६१ दमः-दण्डका कार्य यानी जिनको दण्ड दिया जाता है, उनका सुधार, ८६२ अपराजितः-शत्रुओंद्वारा पराजित न होनेवाले, ८६३ सर्वसहः-सब कुछ सहन करनेकी