महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1442, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाजसनः-याचकोंको अन्न प्रदान करनेवाले, ७९७ शृङ्गी-प्रलयकालमें सींगयुक्त मत्स्यविशेषका रूप धारण करनेवाले, ७९८ जयन्तः-शत्रुओंको पूर्णतया जीतनेवाले, ७९९ सर्वविज्जयी-सब कुछ जाननेवाले और सबको जीतनेवाले ।। ९८ ।। सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः । महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ।। ९९ ।। ८०० सुवर्णबिन्दुः-सुन्दर अक्षर और बिन्दुसे युक्त ओंकारस्वरूप, ८०१ अक्षोभ्यः-किसीके द्वारा भी क्षुभित न किये जा सकनेवाले, ८०२ सर्ववागीश्वरेश्वरः-समस्त वाणीपतियोंके यानी ब्रह्मादिके भी स्वामी, ८०३ महाह्रदः-ध्यान करनेवाले जिसमें गोता लगाकर आनन्दमें मग्न होते हैं, ऐसे परमानन्दके महान् सरोवर, ८०४ महागर्तः-महान् रथवाले, ८०५ महाभूतः-त्रिकालमें कभी नष्ट न होनेवाले महाभूतस्वरूप, ८०६ महानिधिः-सबके महान् निवास-स्थान ।। ९९ ।। कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः । अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।। १०० ।। ८०७ कुमुदः-कु अर्थात् पृथ्वीको उसका भार उतारकर प्रसन्न करनेवाले, ८०८ कुन्दरः-हिरण्याक्षको मारनेके लिये पृथ्वीको विदीर्ण करनेवाले, ८०९ कुन्दः-परशुराम-अवतारमें पृथ्वी प्रदान करनेवाले, ८१० पर्जन्यः-बादलकी भाँति समस्त इष्ट वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले, ८११ पावनः-स्मरणमात्रसे पवित्र करनेवाले, ८१२ अनिलः-सदा प्रबुद्ध रहनेवाले, ८१३ अमृताशः-जिनकी आशा कभी विफल न हो—ऐसे अमोघसंकल्प, ८१४ अमृतवपुः-जिनका कलेवर कभी नष्ट न हो—ऐसे नित्य विग्रह, ८१५ सर्वज्ञः-सदा-सर्वदा सब कुछ जाननेवाले, ८१६ सर्वतोमुखः-सब ओर मुखवाले यानी जहाँ कहीं भी उनके भक्त भक्तिपूर्वक पत्र-पुष्पादि जो कुछ भी अर्पण करें, उसे भक्षण करनेवाले ।। १०० ।। सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः । न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ।। १०१ ।। ८१७ सुलभः-नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेवालेको और एकनिष्ठ श्रद्धालु भक्तको बिना ही परिश्रमके सुगमतासे प्राप्त होनेवाले, ८१८ सुव्रतः-सुन्दर भोजन करनेवाले यानी अपने भक्तोंद्वारा प्रेमपूर्वक अर्पण किये हुए पत्र-पुष्पादि मामूली भोजनको भी परम श्रेष्ठ मानकर खानेवाले, ८१९ सिद्धः-स्वभावसे ही समस्त सिद्धियोंसे युक्त, ८२० शत्रुजित्-देवता और सत्पुरुषोंके शत्रुओंको जीतनेवाले, ८२१ शत्रुतापनः-देव-शत्रुओंको तपानेवाले, ८२२ न्यग्रोधः-वटवृक्षरूप, ८२३ उदुम्बरः-कारणरूपसे आकाशके भी ऊपर रहनेवाले, ८२४ अश्वत्थः-पीपल वृक्षस्वरूप, ८२५ चाणूरान्ध्रनिषूदनः-चाणूर नामक अन्ध्रजातिके वीर मल्लको मारनेवाले ।। १०१ ।। सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः । अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद् भयनाशनः ।। १०२ ।।