भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1444, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1444

सामर्थ्यसे युक्त, अतिशय तितिक्षु, ८६४ नियन्ता-सबको अपने-अपने कर्तव्यमें नियुक्त करनेवाले, ८६५ अनियमः-नियमोंसे न बँधे हुए, जिनका कोई भी नियन्त्रण करनेवाला नहीं, ऐसे परमस्वतन्त्र, ८६६ अयमः-जिनका कोई शासक नहीं ॥ १०५ ॥

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ १०६ ॥

८६७ सत्त्ववान्-बल, वीर्य, सामर्थ्य आदि समस्त तत्त्वोंसे सम्पन्न, ८६८ सात्त्विकः-सत्त्वगुणप्रधानविग्रह, ८६९ सत्यः-सत्यभाषणस्वरूप, ८७० सत्यधर्मपरायणः-यथार्थ भाषण और धर्मके परम आधार, ८७१ अभिप्रायः-प्रेमीजन जिनको चाहते हैं—ऐसे परम इष्ट, ८७२ प्रियार्हः-अत्यन्त प्रिय वस्तु समर्पण करनेके लिये योग्य पात्र, ८७३ अर्हः-सबके परम पूज्य, ८७४ प्रियकृत्-भजनेवालोंका प्रिय करनेवाले, ८७५ प्रीतिवर्धनः-अपने प्रेमियोंके प्रेमको बढ़ानेवाले ॥ १०६ ॥

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग् विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ १०७ ॥

८७६ विहायसगतिः-आकाशमें गमन करनेवाले, ८७७ ज्योतिः-स्वयंप्रकाशस्वरूप, ८७८ सुरुचिः-सुन्दर रुचि और कान्तिवाले, ८७९ हुतभुक्-यज्ञमें हवन की हुई समस्त हविको अग्निरूपसे भक्षण करनेवाले, ८८० विभुः-सर्वव्यापी, ८८१ रविः-समस्त रसोंका शोषण करनेवाले सूर्य, ८८२ विरोचनः-विविध प्रकारसे प्रकाश फैलानेवाले, ८८३ सूर्यः-शोभाको प्रकट करनेवाले, ८८४ सविता-समस्त जगत्‌को उत्पन्न करनेवाले, ८८५ रविलोचनः-सूर्यरूप नेत्रोंवाले ॥ १०७ ॥

अनन्तो हुतभुग् भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ १०८ ॥

८८६ अनन्तः-सब प्रकारसे अन्तरहित, ८८७ हुतभुक्-यज्ञमें हवन की हुई सामग्रीको उन-उन देवताओंके रूपमें भक्षण करनेवाले, ८८८ भोक्ता-जगत्‌का पालन करनेवाले, ८८९ सुखदः-भक्तोंको दर्शनरूप परम सुख देनेवाले, ८९० नैकजः-धर्मरक्षा, साधुरक्षा आदि परम विशुद्ध हेतुओंसे स्वेच्छापूर्वक अनेक जन्म धारण करनेवाले, ८९१ अग्रजः-सबसे पहले जन्मनेवाले आदिपुरुष, ८९२ अनिर्विण्णः-पूर्णकाम होनेके कारण उकताहटसे रहित, ८९३ सदामर्षी-सत्पुरुषोंपर क्षमा करनेवाले, ८९४ लोकाधिष्ठानम्-समस्त लोकोंके आधार, ८९५ अद्भुतः-अत्यन्त आश्चर्यमय ॥ १०८ ॥

सनात् सनातनतमः कपिलः कपिरप्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत् स्वस्ति स्वस्तिभुक् स्वस्तिदक्षिणः ॥ १०९ ॥

८९६ सनात्-अनन्तकालस्वरूप, ८९७ सनातनतमः-सबके कारण होनेसे ब्रह्मादि पुरुषोंकी अपेक्षा भी परम पुराणपुरुष, ८९८ कपिलः-महर्षि कपिलावतार, ८९९ कपिः-सूर्यदेव, ९०० अप्ययः-सम्पूर्ण जगत्‌के लयस्थान, ९०१ स्वस्तिदः-परमानन्दरूप मंगल