महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1445, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेनेवाले, ९०२ स्वस्तिकृत्-आश्रितजनोंका कल्याण करनेवाले, ९०३ स्वस्ति-कल्याणस्वरूप, ९०४ स्वस्तिभुक्-भक्तोंके परम कल्याणकी रक्षा करनेवाले, ९०५ स्वस्तिदक्षिणः-कल्याण करनेमें समर्थ और शीघ्र कल्याण करनेवाले ॥ १०९ ॥ अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः । शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ ११० ॥ ९०६ अरौद्रः-सब प्रकारके रुद्र (क्रूर) भावोंसे रहित शान्तिमूर्ति, ९०७ कुण्डली-सूर्यके समान प्रकाशमान मकराकृति कुण्डलोंको धारण करनेवाले, ९०८ चक्री-सुदर्शनचक्रको धारण करनेवाले, ९०९ विक्रमी-सबसे विलक्षण पराक्रमशील, ९१० ऊर्जितशासनः-जिनका श्रुति-स्मृतिरूप शासन अत्यन्त श्रेष्ठ है—ऐसे अतिश्रेष्ठ शासन करनेवाले, ९११ शब्दातिगः-शब्दकी जहाँ पहुँच नहीं, ऐसे वाणीके अविषय, ९१२ शब्दसहः-कठोर शब्दोंको सहन करनेवाले, ९१३ शिशिरः-त्रितापपीड़ितोंको शान्ति देनेवाले शीतलमूर्ति, ९१४ शर्वरीकरः-ज्ञानियोंकी रात्रि संसार और अज्ञानियोंकी रात्रि ज्ञान—इन दोनोंको उत्पन्न करनेवाले ॥ ११० ॥ अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः । विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ १११ ॥ ९१५ अक्रूरः-सब प्रकारके क्रूरभावोंसे रहित, ९१६ पेशलः-मन, वाणी और कर्म—सभी दृष्टियोंसे सुन्दर होनेके कारण परम सुन्दर, ९१७ दक्षः-सब प्रकारसे समृद्ध, परमशक्तिशाली और क्षणमात्रमें बड़े-से-बड़ा कार्य कर देनेवाले महान् कार्यकुशल, ९१८ दक्षिणः-संहारकारी, ९१९ क्षमिणां वरः-क्षमा करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ, ९२० विद्वत्तमः-विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ परम विद्वान्, ९२१ वीतभयः-सब प्रकारके भयसे रहित, ९२२ पुण्यश्रवणकीर्तनः-जिनके नाम, गुण, महिमा और स्वरूपका श्रवण और कीर्तन परम पावन हैं; ऐसे ॥ १११ ॥ उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः । वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ ११२ ॥ ९२३ उत्तारणः-संसार-सागरसे पार करनेवाले, ९२४ दुष्कृतिहा-पापोंका और पापियोंका नाश करनेवाले, ९२५ पुण्यः-स्मरण आदि करनेवाले समस्त पुरुषोंको पवित्र कर देनेवाले, ९२६ दुःस्वप्ननाशनः-ध्यान, स्मरण, कीर्तन और पूजन करनेसे बुरे स्वप्नोंका नाश करनेवाले, ९२७ वीरहा-शरणागतोंकी विविध गतियोंका यानी संसार-चक्रका नाश करनेवाले, ९२८ रक्षणः-सब प्रकारसे रक्षा करनेवाले, ९२९ सन्तः-विद्या, विनय और धर्म आदिका प्रचार करनेके लिये संतोंके रूपमें प्रकट होनेवाले, ९३० जीवनः-समस्त प्रजाको प्राणरूपसे जीवित रखनेवाले, ९३१ पर्यवस्थितः-समस्त विश्वको व्याप्त करके स्थित रहनेवाले ॥ ११२ ॥ अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।