भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1446, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1446

चतुरस्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ ११३ ॥ ९३२ अनन्तरूपः-अमितरूपवाले, ९३३ अनन्तश्रीः-अपरिमित शोभासम्पन्न, ९३४ जितमन्युः-सब प्रकारसे क्रोधको जीत लेनेवाले, ९३५ भयापहः-भक्तभयहारी, ९३६ चतुरस्रः-मंगलमूर्ति, ९३७ गभीरात्मा-गम्भीर मनवाले, ९३८ विदिशः-अधिकारियोंको उनके कर्मानुसार विभागपूर्वक नाना प्रकारके फल देनेवाले, ९३९ व्यादिशः-सबको यथायोग्य विविध आज्ञा देनेवाले, ९४० दिशः-वेदरूपसे समस्त कर्मोंका फल बतलानेवाले ॥ ११३ ॥

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः । जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ ११४ ॥ ९४१ अनादिः-जिसका आदि कोई न हो ऐसे सबके कारणस्वरूप, ९४२ भूर्भुवः-पृथ्‍वीके भी आधार, ९४३ लक्ष्मीः-समस्त शोभायमान वस्तुओंकी शोभास्वरूप, ९४४ सुवीरः-उत्तम योद्धा, ९४५ रुचिराङ्गदः-परम रुचिकर कल्याणमय बाजूबंदोंको धारण करनेवाले, ९४६ जननः-प्राणिमात्रको उत्पन्न करनेवाले, ९४७ जनजन्मादिः-जन्म लेनेवालोंके जन्मके मूल कारण, ९४८ भीमः-दुष्टोंको भय देनेवाले, ९४९ भीमपराक्रमः-अतिशय भय उत्पन्न करनेवाले, पराक्रमसे युक्त ॥ ११४ ॥

आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः । ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ ११५ ॥ ९५० आधारनिलयः-आधारस्वरूप पृथ्‍वी आदि समस्त भूतोंके स्थान, ९५१ अधाता-जिसका कोई भी बनानेवाला न हो ऐसे स्वयं स्थित, ९५२ पुष्पहासः-पुष्पकी भाँति विकसित हास्यवाले, ९५३ प्रजागरः-भली प्रकार जाग्रत् रहनेवाले नित्यप्रबुद्ध, ९५४ ऊर्ध्वगः-सबसे ऊपर रहनेवाले, ९५५ सत्पथाचारः-सत्पुरुषोंके मार्गका आचरण करनेवाले मर्यादापुरुषोत्तम, ९५६ प्राणदः-परीक्षित् आदि मरे हुओंको भी जीवन देनेवाले, ९५७ प्रणवः-ॐकारस्वरूप, ९५८ पणः-यथायोग्य व्यवहार करनेवाले ॥ ११५ ॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत् प्राणजीवनः । तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ ११६ ॥ ९५९ प्रमाणम्-स्वतःसिद्ध होनेसे स्वयं प्रमाणस्वरूप, ९६० प्राणनिलयः-प्राणोंके आधारभूत, ९६१ प्राणभृत्-समस्त प्राणोंका पोषण करनेवाले, ९६२ प्राणजीवनः-प्राणवायुके संचारसे प्राणियोंको जीवित रखनेवाले, ९६३ तत्त्वम्-यथार्थ तत्त्वरूप, ९६४ तत्त्ववित्-यथार्थ तत्त्वको पूर्णतया जाननेवाले, ९६५ एकात्मा-अद्वितीयस्वरूप, ९६६ जन्ममृत्युजरातिगः-जन्म, मृत्यु और बुढ़ापा आदि शरीरके धर्मोंसे सर्वथा अतीत ॥ ११६ ॥

भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः । यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ ११७ ॥