भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1447, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1447

९६७ भूर्भुवःस्वस्तरुः-‘भूः भुवः स्वः’ तीनों लोकोंवाले, संसारवृक्षस्वरूप, ९६८ तारः-संसार-सागरसे पार उतारनेवाले, ९६९ सविता-सबको उत्पन्न करनेवाले, ९७० प्रपितामहः-पितामह ब्रह्माके भी पिता, ९७१ यज्ञः-यज्ञस्वरूप, ९७२ यज्ञपतिः-समस्त यज्ञोंके अधिष्ठाता, ९७३ यज्वा-यजमानरूपसे यज्ञ करनेवाले, ९७४ यज्ञाङ्गः-समस्त यज्ञरूप अंगोंवाले, वाराहस्वरूप, ९७५ यज्ञवाहनः-यज्ञोंको चलानेवाले ।। ११७ ।।

यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ।। ११८ ।।

९७६ यज्ञभृत्-यज्ञोंको धारण करनेवाले, ९७७ यज्ञकृत्-यज्ञोंके रचयिता, ९७८ यज्ञी-समस्त यज्ञ जिसमें समाप्त होते हैं—ऐसे यज्ञशेषी, ९७९ यज्ञभुक्-समस्त यज्ञोंके भोक्ता, ९८० यज्ञसाधनः-ब्रह्मयज्ञ, जपयज्ञ आदि बहुत-से यज्ञ जिनकी प्राप्तिके साधन हैं ऐसे, ९८१ यज्ञान्तकृत्-यज्ञोंका फल देनेवाले, ९८२ यज्ञगुह्यम्-यज्ञोंमें गुप्त निष्काम यज्ञस्वरूप, ९८३ अन्नम्-समस्त प्राणियोंके अन्न यानी अन्नकी भाँति उनकी सब प्रकारसे तुष्टि-पुष्टि करनेवाले, ९८४ अन्नादः-समस्त अन्नोंके भोक्ता ।। ११८ ।।

आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ।। ११९ ।।

९८५ आत्मयोनिः-जिनका कारण दूसरा कोई नहीं ऐसे स्वयं योनिस्वरूप, ९८६ स्वयंजातः-स्वयं अपने-आप स्वेच्छापूर्वक प्रकट होनेवाले, ९८७ वैखानः-पातालवासी हिरण्याक्षका वध करनेके लिये पृथ्वीको खोदनेवाले, वाराह-अवतारधारी, ९८८ सामगायनः-सामवेदका गान करनेवाले, ९८९ देवकीनन्दनः-देवकीपुत्र, ९९० स्रष्टा-समस्त लोकोंके रचयिता, ९९१ क्षितीशः-पृथ्वीपति, ९९२ पापनाशनः-स्मरण, कीर्तन, पूजन और ध्यान आदि करनेसे समस्त पापसमुदायका नाश करनेवाले ।। ११९ ।।

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ।। १२० ।।

९९३ शङ्खभृत्-पाञ्चजन्यशंखको धारण करनेवाले, ९९४ नन्दकी-नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले, ९९५ चक्री-सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले, ९९६ शार्ङ्गधन्वा-शार्ङ्गधनुषधारी, ९९७ गदाधरः-कौमोदकी नामकी गदा धारण करनेवाले, ९९८ रथाङ्गपाणिः-भीष्मकी प्रतिज्ञा रखनेके लिये सुदर्शन चक्रको हाथमें धारण करनेवाले श्रीकृष्ण, ९९९ अक्षोभ्यः-जो किसी प्रकार भी विचलित नहीं किये जा सके, ऐसे, १००० सर्वप्रहरणायुधः-ज्ञात और अज्ञात जितने भी युद्धादिमें काम आनेवाले अस्त्र-शस्त्र हैं, उन सबको धारण करनेवाले ।। १२० ।।

सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति