भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1440, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1440

एको नैकः सवः कः किं यत् तत् पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ ९१ ॥
७२५ एकः-सब प्रकारके भेद-भावोंसे रहित अद्वितीय, ७२६ नैकः-अवतार-भेदसे अनेक, ७२७ सवः-जिनमें सोमनामकी ओषधिका रस निकाला जाता है—ऐसे यज्ञ-स्वरूप, ७२८ कः-सुखस्वरूप, ७२९ किम्-विचारणीय ब्रह्मस्वरूप, ७३० यत्-स्वतःसिद्ध, ७३१ तत्-विस्तार करनेवाले, ७३२ पदमनुत्तमम्-मुमुक्षु पुरुषोंद्वारा प्राप्त किये जाने योग्य अत्युत्तम परमपदस्वरूप, ७३३ लोकबन्धुः-समस्त प्राणियोंके हित करनेवाले परम मित्र, ७३४ लोकनाथः-सबके द्वारा याचना किये जानेयोग्य लोकस्वामी, ७३५ माधवः-मधुकुलमें उत्पन्न होनेवाले, ७३६ भक्तवत्सलः-भक्तोंसे प्रेम करनेवाले ॥ ९१ ॥

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ ९२ ॥
७३७ सुवर्णवर्णः-सोनेके समान पीतवर्णवाले, ७३८ हेमाङ्गः-सोनेके समान चमकीले अङ्गोंवाले, ७३९ वराङ्गः-परम श्रेष्ठ अंग-प्रत्यंगोंवाले, ७४० चन्दनाङ्गदी-चन्दनके लेप और बाजूबंदसे सुशोभित, ७४१ वीरहा-शूरवीर असुरोंका नाश करनेवाले, ७४२ विषमः-जिनके समान दूसरा कोई नहीं—ऐसे अनुपम, ७४३ शून्यः-समस्त विशेषणोंसे रहित, ७४४ घृताशीः-अपने आश्रित जनोंके लिये कृपासे सने हुए द्रवित संकल्प करनेवाले, ७४५ अचलः-किसी प्रकार भी विचलित न होनेवाले—अविचल, ७४६ चलः-वायुरूपसे सर्वत्र गमन करनेवाले ॥ ९२ ॥

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ ९३ ॥
७४७ अमानी-स्वयं मान न चाहनेवाले, ७४८ मानदः-दूसरोंको मान देनेवाले, ७४९ मान्यः-सबके पूजनेयोग्य माननीय, ७५० लोकस्वामी-चौदह भुवनोंके स्वामी, ७५१ त्रिलोकधृक्-तीनों लोकोंको धारण करनेवाले, ७५२ सुमेधाः-अति उत्तम सुन्दर बुद्धिवाले, ७५३ मेधजः-यज्ञमें प्रकट होनेवाले, ७५४ धन्यः-नित्य कृतकृत्य होनेके कारण सर्वथा धन्यवादके पात्र, ७५५ सत्यमेधाः-सच्ची और श्रेष्ठ बुद्धिवाले, ७५६ धराधरः-अनन्त भगवान्‌के रूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले ॥ ९३ ॥

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ ९४ ॥
७५७ तेजोवृषः-अपने भक्तोंपर आनन्दमय तेजकी वर्षा करनेवाले, ७५८ द्युतिधरः-परम कान्तिको धारण करनेवाले, ७५९ सर्वशस्त्रभृतां वरः-समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, ७६० प्रग्रहः-भक्तोंके द्वारा अर्पित पत्र-पुष्पादिको ग्रहण करनेवाले, ७६१ निग्रहः-सबका निग्रह करनेवाले, ७६२ व्यग्रः-अपने भक्तोंको अभीष्ट फल देनेमें लगे हुए, ७६३ नैकशृङ्गः-