महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९० मनोजवः:-मनकी भाँति वेगवाले, ६९१ तीर्थकरः:-समस्त विद्याओंके रचयिता और उपदेशकर्ता, ६९२ वसुरेताः:-हिरण्मय पुरुष (प्रथम पुरुषसृष्टिका बीज) जिनका वीर्य है—ऐसे सुवर्णवीर्य, ६९३ वसुप्रदः:-प्रचुर धन प्रदान करनेवाले, ६९४ वसुप्रदः:-अपने भक्तोंको मोक्षरूप महान् धन देनेवाले, ६९५ वासुदेवः:-वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण, ६९६ वसुः:-सबके अन्तःकरणमें निवास करनेवाले, ६९७ वसुमनाः:-समानभावसे सबमें निवास करनेकी शक्तिसे युक्त मनवाले, ६९८ हविः:-यज्ञमें हवन किये जाने योग्य हविःस्वरूप ।। ८७ ।।
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ।। ८८ ।।
६९९ सद्गतिः:-सत्पुरुषोंद्वारा प्राप्त किये जाने योग्य गतिस्वरूप, ७०० सत्कृतिः:-जगत्की रक्षा आदि सत्कार्य करनेवाले, ७०१ सत्ता-सदा-सर्वदा विद्यमान सत्तास्वरूप, ७०२ सद्भूतिः:-बहुत प्रकारसे बहुत रूपोंमें भासित होनेवाले, ७०३ सत्परायणः:-सत्पुरुषोंके परम प्रापणीय स्थान, ७०४ शूरसेनः:-हनुमानादि श्रेष्ठ शूरवीर योद्धाओंसे युक्त सेनावाले, ७०५ यदुश्रेष्ठः:-यदुवंशियोंमें सर्वश्रेष्ठ, ७०६ सन्निवासः:-सत्पुरुषोंके आश्रय, ७०७ सुयामुनः:-जिनके परिकर यमुना-तट निवासी गोपालबाल आदि अति सुन्दर हैं, ऐसे श्रीकृष्ण ।। ८८ ।।
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ।। ८९ ।।
७०८ भूतावासः:-समस्त प्राणियोंके मुख्य निवास-स्थान, ७०९ वासुदेवः:-अपनी मायासे जगत्को आच्छादित करनेवाले परमदेव, ७१० सर्वासुनिलयः:-समस्त प्राणियोंके आधार, ७११ अनलः:-अपार शक्ति और सम्पत्तिसे युक्त, ७१२ दर्पहा-धर्मविरुद्ध मार्गमें चलनेवालोंके घमण्डको नष्ट करनेवाले, ७१३ दर्पदः:-अपने भक्तोंको विशुद्ध उत्साह प्रदान करनेवाले, ७१४ दृप्तः:-नित्यानन्दमग्न, ७१५ दुर्धरः:-बड़ी कठिनतासे हृदयमें धारित होनेवाले, ७१६ अपराजितः:-दूसरोंसे अजित ।। ८९ ।।
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ।। ९० ।।
७१७ विश्वमूर्तिः:-समस्त विश्व ही जिनकी मूर्ति है—ऐसे विराट्स्वरूप, ७१८ महामूर्तिः:-बड़े रूपवाले, ७१९ दीप्तमूर्तिः:-स्वेच्छासे धारण किये हुए देदीप्यमान स्वरूपसे युक्त, ७२० अमूर्तिमान्-जिनकी कोई मूर्ति नहीं—ऐसे निराकार, ७२१ अनेकमूर्तिः:-नाना अवतारोंमें स्वेच्छासे लोगोंका उपकार करनेके लिये बहुत मूर्तियोंको धारण करनेवाले, ७२२ अव्यक्तः:-अनेक मूर्ति होते हुए भी जिनका स्वरूप किसी प्रकार व्यक्त न किया जा सके—ऐसे अप्रकटस्वरूप, ७२३ शतमूर्तिः:-सैकड़ों मूर्तियोंवाले, ७२४ शताननः:-सैकड़ों मुखोंवाले ।। ९० ।।