महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1438, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर गुणोंका कोई भी पार नहीं पा सकता—ऐसे अविनाशी गुण, प्रभाव और शक्तियोंसे युक्त, ६६० धनञ्जयः-अर्जुनरूपसे दिग्विजयके समय बहुत-सा धन जीतकर लानेवाले ।। ८३ ।।
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ।। ८४ ।।
६६१ ब्रह्मण्यः-तप, वेद, ब्राह्मण और ज्ञानकी रक्षा करनेवाले, ६६२ ब्रह्मकृत्-पूर्वोक्त तप आदिकी रचना करनेवाले, ६६३ ब्रह्मा-ब्रह्मारूपसे जगत्को उत्पन्न करनेवाले, ६६४ ब्रह्म-सच्चिदानन्दस्वरूप, ६६५ ब्रह्मविवर्धनः-पूर्वोक्त ब्रह्मशब्दवाची तप आदिकी वृद्धि करनेवाले, ६६६ ब्रह्मवित्-वेद और वेदार्थको पूर्णतया जाननेवाले, ६६७ ब्राह्मणः-समस्त वस्तुओंको ब्रह्मरूपसे देखनेवाले, ६६८ ब्रह्मी-ब्रह्मशब्दवाची तपादि समस्त पदार्थोंके अधिष्ठान, ६६९ ब्रह्मज्ञः-अपने आत्मस्वरूप ब्रह्मशब्दवाची वेदको पूर्णतया यथार्थ जाननेवाले, ६७० ब्राह्मणप्रियः-ब्राह्मणोंको अतिशय प्रिय माननेवाले ।। ८४ ।।
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ।। ८५ ।।
६७१ महाक्रमः-बड़े वेगसे चलनेवाले, ६७२ महाकर्मा-भिन्न-भिन्न अवतारोंमें नाना प्रकारके महान् कर्म करनेवाले, ६७३ महातेजाः-जिसके तेजसे समस्त सूर्य आदि तेजस्वी देदीप्यमान होते हैं—ऐसे महान् तेजस्वी, ६७४ महोरगः-बड़े भारी सर्प यानी वासुकिस्वरूप, ६७५ महाक्रतुः-महान् यज्ञस्वरूप, ६७६ महायज्वा-लोकसंग्रहके लिये बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले, ६७७ महायज्ञः-जपयज्ञ आदि भगवत्प्राप्तिके साधनरूप समस्त यज्ञ जिनकी विभूतियाँ हैं—ऐसे महान् यज्ञस्वरूप, ६७८ महाहविः-ब्रह्मरूप अग्निमें हवन किये जाने योग्य प्रपञ्चरूप हवि जिनका स्वरूप है—ऐसे महान् हविःस्वरूप ।। ८५ ।।
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ।। ८६ ।।
६७९ स्तव्यः-सबके द्वारा स्तुति किये जाने योग्य, ६८० स्तवप्रियः-स्तुतिसे प्रसन्न होनेवाले, ६८१ स्तोत्रम्-जिनके द्वारा भगवान्के गुण-प्रभावका कीर्तन किया जाता है, वह स्तोत्र, ६८२ स्तुतिः-स्तवनक्रियास्वरूप, ६८३ स्तोता-स्तुति करनेवाले, ६८४ रणप्रियः-युद्धमें प्रेम करनेवाले, ६८५ पूर्णः-समस्त ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य और गुणोंसे परिपूर्ण, ६८६ पूरयिता-अपने भक्तोंको सब प्रकारसे परिपूर्ण करनेवाले, ६८७ पुण्यः-स्मरणमात्रसे पापोंका नाश करनेवाले पुण्यस्वरूप, ६८८ पुण्यकीर्तिः-परमपावन कीर्तिवाले, ६८९ अनामयः-आन्तरिक और बाह्य सब प्रकारकी व्याधियोंसे रहित ।। ८६ ।।
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ।। ८७ ।।