महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1437, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहो—ऐसे स्वतन्त्र, ६२७ शाश्वतस्थिरः-सदा एकरस स्थिर रहनेवाले, निर्विकार, ६२८ भूशयः-लंकागमनके लिये मार्गकी याचना करते समय समुद्रतटकी भूमिपर शयन करनेवाले, ६२९ भूषणः-स्वेच्छासे नाना अवतार लेकर अपने चरण-चिह्नोंसे भूमिकी शोभा बढ़ानेवाले, ६३० भूतिः-समस्त विभूतियोंके आधारस्वरूप, ६३१ विशोकः-सब प्रकारसे शोकरहित, ६३२ शोकनाशनः-स्मृतिमात्रसे भक्तोंके शोकका समूल नाश करनेवाले ।। ८० ।।
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ।। ८१ ।।
६३३ अर्चिष्मान्-चन्द्र-सूर्य आदि समस्त ज्योतियोंको देदीप्यमान करनेवाली अतिशय प्रकाशमय अनन्त किरणोंसे युक्त, ६३४ अर्चितः-ब्रह्मादि समस्त लोकोंसे पूजे जानेवाले, ६३५ कुम्भः-घटकी भाँति सबके निवासस्थान, ६३६ विशुद्धात्मा-परम शुद्ध निर्मल आत्मस्वरूप, ६३७ विशोधनः-स्मरणमात्रसे समस्त पापोंका नाश करके भक्तोंके अन्तःकरणको परम शुद्ध कर देनेवाले, ६३८ अनिरुद्धः-जिनको कोई बाँधकर नहीं रख सके—ऐसे चतुर्व्यूहमें अनिरुद्धस्वरूप, ६३९ अप्रतिरथः-प्रतिपक्षसे रहित, ६४० प्रद्युम्नः-परम श्रेष्ठ अपार धनसे युक्त चतुर्व्यूहमें प्रद्युम्नस्वरूप, ६४१ अमितविक्रमः-अपार पराक्रमी ।। ८१ ।।
कालनेमीनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ।। ८२ ।।
६४२ कालनेमीनिहा-कालनेमि नामक असुरको मारनेवाले, ६४३ वीरः-परम शूरवीर, ६४४ शौरिः-शूरकुलमें उत्पन्न होनेवाले श्रीकृष्णस्वरूप, ६४५ शूरजनेश्वरः-अतिशय शूरवीरताके कारण इन्द्रादि शूरवीरोंके भी इष्ट, ६४६ त्रिलोकात्मा-अन्तर्यामीरूपसे तीनों लोकोंके आत्मा, ६४७ त्रिलोकेशः-तीनों लोकोंके स्वामी, ६४८ केशवः-ब्रह्मा, विष्णु और शिव-स्वरूप, ६४९ केशिहा-केशी नामके असुरको मारनेवाले, ६५० हरिः-स्मरणमात्रसे समस्त पापोंका हरण करनेवाले ।। ८२ ।।
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनंजयः ।। ८३ ।।
६५१ कामदेवः-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंको चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा अभिलषित समस्त कामनाओंके अधिष्ठाता परमदेव, ६५२ कामपालः-सकामी भक्तोंकी कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले, ६५३ कामी-अपने प्रियतमोंको चाहनेवाले, ६५४ कान्तः-परम मनोहर स्वरूप, ६५५ कृतागमः-समस्त वेद और शास्त्रोंको रचनेवाले, ६५६ अनिर्देश्यवपुः-जिनके दिव्य स्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सके—ऐसे अनिर्वचनीय शरीरवाले, ६५७ विष्णुः-शेषशायी भगवान् विष्णु, ६५८ वीरः-बिना ही पैरोंके गमन करनेकी दिव्य शक्तिसे युक्त, ६५९ अनन्तः-जिनके स्वरूप, शक्ति, ऐश्वर्य, सामर्थ्य