महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरनेवाले, ५९४ वृषाध्यक्षः-समस्त कामनाओंकी वर्षा करनेवाली कृपादृष्टिसे युक्त, ५९५ वृषप्रियः-धर्मसे प्यार करनेवाले ।। ७६ ।।
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः । श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ।। ७७ ।।
५९६ अनिवर्ती-रणभूमिमें और धर्मपालनमें पीछे न हटनेवाले, ५९७ निवृत्तात्मा-स्वभावसे ही विषय-वासनारहित नित्य शुद्ध मनवाले, ५९८ संक्षेप्ता-विस्तृत जगत्को संहारकालमें संक्षिप्त यानी सूक्ष्म करनेवाले, ५९९ क्षेमकृत्-शरणागतकी रक्षा करनेवाले, ६०० शिवः-स्मरणमात्रसे पवित्र करनेवाले कल्याणस्वरूप, ६०१ श्रीवत्सवक्षाः-श्रीवत्स नामक चिह्नको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले, ६०२ श्रीवासः-श्रीलक्ष्मीजीके वासस्थान, ६०३ श्रीपतिः-परमशक्तिरूपा श्रीलक्ष्मीजीके स्वामी, ६०४ श्रीमतां वरः-सब प्रकारकी सम्पत्ति और ऐश्वर्यसे युक्त ब्रह्मादि समस्त लोकपालोंसे श्रेष्ठ ।। ७७ ।।
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः । श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ।। ७८ ।।
६०५ श्रीदः-भक्तोंको श्री प्रदान करनेवाले, ६०६ श्रीशः-लक्ष्मीके नाथ, ६०७ श्रीनिवासः-श्रीलक्ष्मीजीके अन्तःकरणमें नित्य निवास करनेवाले, ६०८ श्रीनिधिः-समस्त श्रियोंके आधार, ६०९ श्रीविभावनः-सब मनुष्योंके लिये उनके कर्मानुसार नाना प्रकारके ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले, ६१० श्रीधरः-जगज्जननी श्रीको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले, ६११ श्रीकरः-स्मरण, स्तवन और अर्चन आदि करनेवाले भक्तोंके लिये श्रीका विस्तार करनेवाले, ६१२ श्रेयः-कल्याणस्वरूप, ६१३ श्रीमान्-सब प्रकारकी श्रियोंसे युक्त, ६१४ लोकत्रयाश्रयः-तीनों लोकोंके आधार ।। ७८ ।।
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः । विजितात्माविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्न संशयः ।। ७९ ।।
६१५ स्वक्षः-मनोहर कृपाकटाक्षसे युक्त परम सुन्दर आँखोंवाले, ६१६ स्वङ्गः-अतिशय कोमल, परम सुन्दर, मनोहर अंगोंवाले, ६१७ शतानन्दः-लीलाभेदसे सैकड़ों विभागोंमें विभक्त आनन्दस्वरूप, ६१८ नन्दिः-परमानन्दस्वरूप, ६१९ ज्योतिर्गणेश्वरः-नक्षत्रसमुदायोंके ईश्वर, ६२० विजितात्मा-जिते हुए मनवाले, ६२१ अविधेयात्मा-जिनके असली स्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सके—ऐसे अनिर्वचनीयस्वरूप, ६२२ सत्कीर्तिः-सच्ची कीर्तिवाले, ६२३ छिन्नसंशयः-सब प्रकारके संशयोंसे रहित ।। ७९ ।।
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः । भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ।। ८० ।।
६२४ उदीर्णः-सब प्राणियोंसे श्रेष्ठ, ६२५ सर्व-तश्चक्षुः-समस्त वस्तुओंको सब दिशाओंमें सदा-सर्वदा देखनेकी शक्तिवाले, ६२६ अनीशः-जिनका दूसरा कोई शासक न