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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1435, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1435

५५८ भगवान्-उत्पत्ति और प्रलय, आना और जाना तथा विद्या और अविद्याको जाननेवाले एवं सर्वैश्वर्यादि छहों भगोंसे युक्त, ५५९ भगहा-अपने भक्तोंका प्रेम बढ़ानेके लिये उनके ऐश्वर्यका हरण करनेवाले, ५६० आनन्दी-परम सुखस्वरूप, ५६१ वनमाली-वैजयन्ती वनमाला धारण करनेवाले, ५६२ हलायुधः-हलरूप शस्त्रको धारण करनेवाले बलभद्रस्वरूप, ५६३ आदित्यः-अदितिपुत्र वामन-भगवान्, ५६४ ज्योतिरादित्यः-सूर्यमण्डलमें विराजमान ज्योतिःस्वरूप, ५६५ सहिष्णुः-समस्त द्वन्द्वोंको सहन करनेमें समर्थ, ५६६ गतिसत्तमः-सर्वश्रेष्ठ गतिस्वरूप ।। ७३ ।।

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः । दिविस्पृक् सर्वदृग् व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ।। ७४ ।।

५६७ सुधन्वा-अतिशय सुन्दर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, ५६८ खण्डपरशुः-शत्रुओंका खण्डन करनेवाले फरसेको धारण करनेवाले परशुरामस्वरूप, ५६९ दारुणः-सन्मार्गविरोधियोंके लिये महान् भयंकर, ५७० द्रविणप्रदः-अर्थार्थी भक्तोंको धन-सम्पत्ति प्रदान करनेवाले, ५७१ दिविस्पृक्-स्वर्गलोकतक व्याप्त, ५७२ सर्वदृग् व्यासः-सबके द्रष्टा एवं वेदका विभाग करनेवाले श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासस्वरूप, ५७३ वाचस्पतिरयोनिजः-विद्याके स्वामी तथा बिना योनिके स्वयं ही प्रकट होनेवाले ।। ७४ ।।

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् । संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ।। ७५ ।।

५७४ त्रिसामा-देवव्रत आदि तीन साम श्रुतियोंद्वारा जिनकी स्तुति की जाती है—ऐसे परमेश्वर, ५७५ सामगः-सामवेदका गान करनेवाले, ५७६ साम-सामवेदस्वरूप, ५७७ निर्वाणम्-परमशान्तिके निधान परमानन्दस्वरूप, ५७८ भेषजम्-संसार-रोगकी ओषधि, ५७९ भिषक्-संसाररोगका नाश करनेके लिये गीतारूप उपदेशामृतका पान करानेवाले परम वैद्य, ५८० संन्यासकृत्-मोक्षके लिये संन्यासाश्रम और संन्यासयोगका निर्माण करनेवाले, ५८१ शमः-उपशमताका उपदेश देनेवाले, ५८२ शान्तः-परम शान्तस्वरूप, ५८३ निष्ठा-सबकी स्थितिके आधार अधिष्ठानस्वरूप, ५८४ शान्तिः-परम शान्तिस्वरूप, ५८५ परायणम्-मुमुक्षु पुरुषोंके परम प्राप्य-स्थान ।। ७५ ।।

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः । गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ।। ७६ ।।

५८६ शुभाङ्गः-अति मनोहर परम सुन्दर अंगोंवाले, ५८७ शान्तिदः-परम शान्ति देनेवाले, ५८८ स्रष्टा-सर्गके आदिमें सबकी रचना करनेवाले, ५८९ कुमुदः-पृथ्वीपर प्रसन्नतापूर्वक लीला करनेवाले, ५९० कुवलेशयः-जलमें शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले, ५९१ गोहितः-गोपालरूपसे गायोंका और अवतार धारण करके भार उतारकर पृथ्वीका हित करनेवाले, ५९२ गोपतिः-पृथ्वीके और गायोंके स्वामी, ५९३ गोप्ता-अवतार धारण करके सबके सम्मुख प्रकट होते समय अपनी मायासे अपने स्वरूपको आच्छादित

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 1435, कुल 2566 में से · BharatKosha