महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1452, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
जपनेयोग्य मन्त्र और सबेरे-शाम कीर्तन करनेयोग्य देवता, ऋषियों और राजाओंके मंगलमय नामोंका कीर्तन-माहात्म्य तथा गायत्रीजपका फल
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
किं जप्यं जपतो नित्यं भवेद् धर्मफलं महत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! आप महाज्ञानी और सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ हैं। अतः मैं पूछता हूँ कि प्रतिदिन किस स्तोत्र या मन्त्रका जप करनेसे धर्मके महान् फलकी प्राप्ति हो सकती है? ॥ १ ॥
प्रस्थाने वा प्रवेशे वा प्रवृत्ते वापि कर्मणि ।
दैवे वा श्राद्धकाले वा किं जप्यं कर्मसाधनम् ॥ २ ॥
यात्रा, गृहप्रवेश अथवा किसी कर्मका आरम्भ करते समय, देवयज्ञमें या श्राद्धके समय किस मन्त्रका जप करनेसे कर्मकी पूर्ति हो जाती है? ॥ २ ॥
शान्तिकं पौष्टिकं रक्षा शत्रुघ्नं भयनाशनम् ।
जप्यं यद् ब्रह्मसमितं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ३ ॥
शान्ति, पुष्टि, रक्षा, शत्रुनाश तथा भय-निवारण करनेवाला कौन-सा ऐसा जपनीय मन्त्र है, जो वेदके समान माननीय है? आप उसे बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
व्यासप्रोक्तमिमं मन्त्रं शृणुष्वैकमना नृप ।
सावित्र्या विहितं दिव्यं सद्यः पापविमोचनम् ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! महर्षि वेदव्यासका बताया हुआ यह एक मन्त्र है, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। सावित्री देवीने इस दिव्यमन्त्रकी सृष्टि की है तथा यह तत्काल ही पापसे छुटकारा दिलानेवाला है ॥ ४ ॥
शृणु मन्त्रविधिं कृत्स्नं प्रोच्यमानं मयानघ ।
यं श्रुत्वा पाण्डवश्रेष्ठ सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५ ॥
अनघ! पाण्डवश्रेष्ठ! मैं इस मन्त्रकी सम्पूर्ण विधि बताता हूँ, सुनो। उसे सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ५ ॥
रात्रावहनि धर्मज्ञ जपन् पापैर्न लिप्यते ।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ॥ ६ ॥