महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1456, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंलभन्ते हि शुभं सर्वे रुद्रानलवसुप्रभाः । भुवि कृत्वा शुभं कर्म मोदन्ते दिवि दैवतैः ॥ ३२ ॥ इनका तेज रुद्र, अग्नि तथा वसुओंके समान है। ये पृथ्वीपर शुभकर्म करके अब स्वर्गमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं और शुभफलका उपभोग करते हैं ॥ ३२ ॥ महेन्द्रगुरवः सप्त प्राचीं वै दिशमाश्रिताः । प्रयतः कीर्तयेदेतान् शक्रलोके महीयते ॥ ३३ ॥ महेन्द्रके गुरु सातों महर्षि पूर्व दिशामें निवास करते हैं। जो पुरुष शुद्धचित्तसे इनका नाम लेता है, वह इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३३ ॥ उन्मुचुःप्रमुचुश्चैव स्वस्त्यात्रेयश्च वीर्यवान् । दृढव्यश्चोर्ध्वबाहुश्च तृणसोमाङ्गिरास्तथा ॥ ३४ ॥ मित्रावरुणयोः पुत्रस्तथागस्त्यः प्रतापवान् । धर्मराजर्त्विजः सप्त दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥ ३५ ॥ उन्मुचु, प्रमुचु, शक्तिशाली स्वस्त्यात्रेय, दृढव्य, ऊर्ध्वबाहु, तृणसोमांगिरा और मित्रावरुणके पुत्र महाप्रतापी अगस्त्य मुनि—ये सात धर्मराज (यम)-के ऋत्विज् हैं और दक्षिण दिशामें निवास करते हैं ॥ ३४-३५ ॥ दृढेयुश्च ऋतेयुश्च परिव्याधश्च कीर्तिमान् । एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चादित्यसंनिभाः ॥ ३६ ॥ अत्रेः पुत्रश्च धर्मात्मा ऋषिः सारस्वतस्तथा । वरुणस्यर्त्विजः सप्त पश्चिमां दिशमाश्रिताः ॥ ३७ ॥ दृढेयु, ऋतेयु, कीर्तिमान् परिव्याध, सूर्यके सदृश तेजस्वी एकत, द्वित, त्रित तथा धर्मात्मा अत्रिके पुत्र सारस्वत मुनि—ये सात वरुणके ऋत्विज् हैं और पश्चिम दिशामें इनका निवास है ॥ ३६-३७ ॥ अत्रिर्वसिष्ठो भगवान् कश्यपश्व महानृषिः । गौतमश्च भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ॥ ३८ ॥ ऋचीकतनयश्चोग्रो जमदग्निः प्रतापवान् । धनेश्वरस्य गुरवः सप्तैते उत्तराश्रिताः ॥ ३९ ॥ अत्रि, भगवान् वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र और ऋचीकनन्दन प्रतापवान् उग्रस्वभाववाले जमदग्नि—ये सात उत्तर दिशामें रहनेवाले और कुबेरके गुरु (ऋत्विज्) हैं ॥ ३८-३९ ॥ अपरे मुनयः सप्त दिक्षु सर्वासवधिष्ठिताः । कीर्तिस्वस्तिकरा नृणां कीर्तिता लोकभावनाः ॥ ४० ॥ इनके सिवा सात महर्षि और हैं जो सम्पूर्ण दिशाओंमें निवास करते हैं। वे जगत्को उत्पन्न करनेवाले हैं। उपर्युक्त महर्षियोंका यदि नाम लिया जाय तो वे मनुष्योंकी कीर्ति