महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1455, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रजापति ब्रह्माजीने जिन लोकोंकी रचना की है, उन सबमें ये अपने दिव्य तेजसे निवास करते हैं तथा शुद्धभावसे सबके कर्मोंका निरीक्षण करते हैं ॥ २२ ॥
प्राणानामीश्वरानेतान् कीर्तयन् प्रयतो नरः । धर्मार्थकामैर्विपुलैर्युज्यते सह नित्यशः ॥ २३ ॥ ये सबके प्राणोंके स्वामी हैं। जो मनुष्य शुद्धभावसे नित्य इनका कीर्तन करता है, उसे प्रचुरमात्रामें धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है ॥ २३ ॥
लोकांश्च लभते पुण्यान् विश्वेश्वरकृतान् शुभान् । एते देवास्त्रयस्त्रिंशत् सर्वभूतगणेश्वराः ॥ २४ ॥ वह लोकनाथ ब्रह्माजीके रचे हुए मंगलमय पवित्र लोकोंमें जाता है। ऊपर बताये हुए तैंतीस देवता सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं ॥ २४ ॥
नन्दीश्वरो महाकायो ग्रामणीर्वृषभध्वजः । ईश्वराः सर्वलोकानां गणेश्वरविनायकाः ॥ २५ ॥ सौम्या रौद्रा गणाश्चैव योगभूतगणास्तथा । ज्योतींषि सरितो व्योम सुपर्णः पतगेश्वरः ॥ २६ ॥ पृथिव्यां तपसा सिद्धाः स्थावराश्च चराश्च ह । हिमवान् गिरयः सर्वे चत्वारश्च महार्णवाः ॥ २७ ॥ भवस्यानुचराश्चैव हरतुल्यपराक्रमाः । विष्णुर्देवोऽथ जिष्णुश्च स्कन्दश्चाम्बिकया सह ॥ २८ ॥ कीर्तयन् प्रयतः सर्वान् सर्वपापैः प्रमुच्यते । इसी प्रकार नन्दीश्वर, महाकाय, ग्रामणी, वृषभध्वज, सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी गणेश, विनायक, सौम्यगण, रुद्रगण, योगगण, भूतगण, नक्षत्र, नदियाँ, आकाश, पक्षिराज गरुड़, पृथ्वीपर तपसे सिद्ध हुए महात्मा, स्थावर, जंगम, हिमालय, समस्त पर्वत, चारों समुद्र, भगवान् शंकरके तुल्य पराक्रमवाले उनके अनुचरगण, विष्णुदेव, जिष्णु, स्कन्द और अम्बिका—इन सबके नामोंका शुद्धभावसे कीर्तन करनेवाले मनुष्यके सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ २५—२८ १/२ ॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मानवानृषिसत्तमान् ॥ २९ ॥ यवक्रीतश्च रैभ्यश्च अर्वावसुपरावसू । औशिजश्चैव कक्षीवान् बलश्चाङ्गिरसः सुतः ॥ ३० ॥ ऋषिर्मेधातिथेः पुत्रः कण्वो बर्हिषदस्तथा । ब्रह्मतेजोमयाः सर्वे कीर्तिता लोकभावनाः ॥ ३१ ॥ अब श्रेष्ठ महर्षियोंके नाम बता रहा हूँ—यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, उशिजके पुत्र कक्षीवान्, अंगिरानन्दन बल, मेधातिथिके पुत्र कण्व ऋषि और बर्हिषद—ये सब ऋषि ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और लोकस्रष्टा बतलाये गये हैं ॥ २९—३१ ॥