महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1454, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं ।। १२-१३ ।। शतमेतत् समाम्नातं शतरुद्रे महात्मनाम् । अंशो भगश्च मित्रश्च वरुणश्च जलेश्वरः ।। १४ ।। तथा धातार्यमा चैव जयन्तो भास्करस्तथा । त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते ।। १५ ।। इत्येते द्वादशादित्याः काश्यपेया इति श्रुतिः । वेदके शतरुद्रिय प्रकरणमें महात्मा रुद्रके सैकड़ों नाम बताये गये हैं। अंश, भग, मित्र, जलेश्वर, वरुण, धाता, अर्यमा, जयन्त, भास्कर, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र तथा विष्णु—ये बारह आदित्य कहलाते हैं। ये सब-के-सब कश्यपके पुत्र हैं ।। १४-१५ १/२ ।। धरो ध्रुवश्च सोमश्च सावित्रोऽथानिलोऽनलः ।। १६ ।। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः । धर, ध्रुव, सोम, सावित्र, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं ।। १६ १/२ ।। नासत्यश्चापि दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि ।। १७ ।। मार्तण्डस्यात्मजावेतौ संज्ञानासाविनिर्गतौ । नासत्य और दस्र—ये दोनों अश्विनीकुमारके नामसे प्रसिद्ध हैं। इनकी उत्पत्ति भगवान् सूर्यके वीर्यसे हुई है। ये अश्वरूपधारिणी संज्ञा देवीके नाकसे प्रकट हुए थे (ये सब मिलाकर तैंतीस देवता हैं) ।। १७ १/२ ।। अतः परं प्रवक्ष्यामि लोकानां कर्मसाक्षिणः ।। १८ ।। अपि यज्ञस्य वेत्तारो दत्तस्य सुकृतस्य च । अदृश्याः सर्वभूतेषु पश्यन्ति त्रिदशेश्वराः ।। १९ ।। शुभाशुभानि कर्माणि मृत्युः कालश्च सर्वशः । विश्वेदेवाः पितृगणा मूर्तिमन्तस्तपोधनाः ।। २० ।। मुनयश्चैव सिद्धाश्च तपोमोक्षपरायणाः । शुचिस्मिताः कीर्त्यतां प्रयच्छन्ति शुभं नृणाम् ।। २१ ।। अब मैं जगत्के कर्मपर दृष्टि रखनेवाले तथा यज्ञ, दान और सुकृतको जाननेवाले देवताओंका परिचय देता हूँ। ये देवगण स्वयं अदृश्य रहकर समस्त प्राणियोंके शुभाशुभकर्मोंको देखते रहते हैं। इनके नाम ये हैं—मृत्यु, काल, विश्वेदेव और मूर्तिमान् पितृगण। इनके सिवा तपस्वी मुनि तथा तप एवं मोक्षमें संलग्न सिद्ध महर्षि भी सम्पूर्ण जगत्पर हितकी दृष्टि रखते हैं। ये सब अपना नाम-कीर्तन करनेवाले मनुष्योंको शुभ फल देते हैं ।। १८—२१ ।। प्रजापतिकृतानेताँल्लोकान् दिव्येन तेजसा । वसन्ति सर्वलोकेषु प्रयताः सर्वकर्मसु ।। २२ ।।