भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 1458

पुरूरवसमैलं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।

बुधस्य दयितं पुत्रं कीर्तयेद् वसुधाधिपम् ।। ४९ ।।

सूर्यवंशमें उत्पन्न और देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी इला और बुधके प्रिय पुत्र

त्रिभुवनविख्यात राजा पुरूरवाका नाम कीर्तन करें ।। ४८-४९ ।।

त्रिलोकविश्रुतं वीरं भरतं च प्रकीर्तयेत् ।

गवामयेन यज्ञेन येनेष्टं वै कृते युगे ।। ५० ।।

रन्तिदेवं महादेवं कीर्तयेत् परमद्युतिम् ।

विश्वजित्तपसोपेतं लक्षण्यं लोकपूजितम् ।। ५१ ।।

त्रिलोकीके विख्यात वीर भरतका नामोच्चारण करे, जिन्होंने सत्ययुगमें गवामय यज्ञका

अनुष्ठान किया था। उन विश्वविजयिनी तपस्यासे युक्त, शुभ लक्षणसम्पन्न एवं लोकपूजित

परम तेजस्वी महाराज रन्तिदेवका भी कीर्तन करें ।। ५०-५१ ।।

तथा श्वेतं च राजर्षिं कीर्तयेत् परमद्युतिम् ।

सगरस्यात्मजा येन प्लावितास्तारितास्तथा ।। ५२ ।।

महातेजस्वी राजर्षि श्वेतका तथा जिन्होंने सगरपुत्रोंको गंगाजलसे आप्लावित करके

उनका उद्धार किया था, उन महाराज भगीरथका भी कीर्तन एवं स्मरण करे ।। ५२ ।।

हुताशनसमानेतान् महारूपान् महौजसः ।

उग्रकायान् महासत्त्वान् कीर्तयेत् कीर्तिवर्धनान् ।। ५३ ।।

वे सभी राजा अग्निके समान तेजस्वी, अत्यन्त रूपवान्, महान् बलसम्पन्न,

उग्रशरीरवाले परम धीर और अपने कीर्तिको बढ़ानेवाले थे। इन सबका कीर्तन करना

चाहिये ।। ५३ ।।

देवानृषिगणांश्चैव नृपांश्च जगतीश्वरान् ।

सांख्यं योगं च परमं हव्यं कव्यं तथैव च ।। ५४ ।।

कीर्तितं परमं ब्रह्म सर्वश्रुतिपरायणम् ।

मङ्गल्यं सर्वभूतानां पवित्रं बहुकीर्तितम् ।। ५५ ।।

व्याधिप्रशमनं श्रेष्ठं पौष्टिकं सर्वकर्मणाम् ।

प्रयतः कीर्तयेच्चैतान् कल्यं सायं च भारत ।। ५६ ।।

देवताओं, ऋषियों तथा पृथ्वीपर शासन करनेवाले राजाओंका कीर्तन करना चाहिये।

सांख्ययोग, उत्तम हव्य-कव्य तथा समस्त श्रुतियोंके आधारभूत परब्रह्म परमात्माका कीर्तन

सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये मंगलमय परम पावन है। इनके बारंबार कीर्तनसे रोगोंका नाश होता

है। इससे सब कर्मोंमें उत्तम पुष्टि प्राप्त होती है। भारत! मनुष्यको प्रतिदिन सबेरे और

शामके समय शुद्धचित्त होकर भगवत्-कीर्तनके साथ ही उपर्युक्त देवताओं, ऋषियों और

राजाओंके भी नाम लेने चाहिये ।। ५४–५६ ।।

एते वै पान्ति वर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।