भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1459, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1459

एते विनायकाः श्रेष्ठा दक्षाः शान्ता जितेन्द्रियाः ।। ५७ ।। ये देवता आदि जगत्की रक्षा करते, पानी बरसाते, प्रकाश और हवा देते तथा प्रजाकी सृष्टि करते हैं। ये ही विघ्नोंके राजा विनायक, श्रेष्ठ, दक्ष, क्षमाशील और जितेन्द्रिय हैं ।। ५७ ।। नराणामशुभं सर्वे व्यपोहन्ति प्रकीर्तिताः । साक्षिभूता महात्मानः पापस्य सुकृतस्य च ।। ५८ ।। ये महात्मा सब मनुष्योंके पाप-पुण्यके साक्षी हैं। इनका नाम लेनेपर ये सब लोग मानवोंके अमंगलका नाश करते हैं ।। ५८ ।। एतान् वै कल्यमुत्थाय कीर्तयन् शुभमश्रुते । नाग्निचौरभयं तस्य न मार्गप्रतिरोधनम् ।। ५९ ।। जो सबेरे उठकर इनके नाम और गुणोंका उच्चारण करता है, उसे शुभ कर्मोंके भोग प्राप्त होते हैं। उसके यहाँ आग और चोरका भय नहीं रहता तथा उसका मार्ग कभी रोका नहीं जाता ।। ५९ ।। एतान् कीर्तयतां नित्यं दुःस्वप्नो नश्यते नृणाम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वस्तिमांश्च गृहान् व्रजेत् ।। ६० ।। प्रतिदिन इन देवताओंका कीर्तन करनेसे मनुष्योंका दुःस्वप्न नष्ट हो जाता है। वह सब पापोंसे मुक्त होता है और कुशलपूर्वक घर लौटता है ।। ६० ।। दीक्षाकालेषु सर्वेषु यः पठेन्नियतो द्विजः । न्यायवानात्मनिरतः क्षान्तो दान्तोऽनसूयकः ।। ६१ ।। जो द्विज दीक्षाके सभी अवसरोंपर नियमपूर्वक इन नामोंका पाठ करता है, वह न्यायशील, आत्मनिष्ठ, क्षमावान्, जितेन्द्रिय तथा दोष-दृष्टिसे रहित होता है ।। ६१ ।। रोगार्तो व्याधियुक्तो वा पठन् पापात् प्रमुच्यते । वास्तुमध्ये तु पठतः कुले स्वस्त्ययनं भवेत् ।। ६२ ।। रणे-व्याधिसे ग्रस्त मनुष्य इसका पाठ करनेपर पापमुक्त एवं नीरोग हो जाता है। जो अपने घरके भीतर इन नामोंका पाठ करता है, उसके कुलका कल्याण होता है ।। ६२ ।। क्षेत्रमध्ये तु पठतः सर्वं सस्यं प्ररोहति । गच्छतः क्षेममध्वानं ग्रामान्तरगतः पठन् ।। ६३ ।। खेतमें इस नाममालाको पढ़नेवाले मनुष्यकी सारी खेती जमती और उपजती है। जो गाँवके भीतर रहकर इस नामावलीका पाठ करता है, यात्रा करते समय उसका मार्ग सकुशल समाप्त होता है ।। ६३ ।। आत्मनश्च सुतानां च दाराणां च धनस्य च । बीजानामोषधीनां च रक्षामेतां प्रयोजयेत् ।। ६४ ।।

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 1459, कुल 2566 में से · BharatKosha