भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1463, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1463

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एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

के पूज्याः के नमस्कार्याः कथं वर्तेत केषु च ।
किमाचारः कीदृशेषु पितामह न रिष्यते ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! संसारमें कौन मनुष्य पूज्य हैं? किनको नमस्कार करना चाहिये? किनके साथ कैसा बर्ताव करना उचित है तथा कैसे लोगोंके साथ किस प्रकारका आचरण किया जाय तो वह हानिकर नहीं होता? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

ब्राह्मणानां परिभव सादयेदपि देवताः ।
ब्राह्मणांस्तु नमस्कृत्य युधिष्ठिर न रिष्यते ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! ब्राह्मणोंका अपमान देवताओंको भी दुःखमें डाल सकता है। परंतु यदि ब्राह्मणोंको नमस्कार करके उनके साथ विनयपूर्ण बर्ताव किया जाय तो कभी कोई हानि नहीं होती ॥ २ ॥

ते पूज्यास्ते नमस्कार्या वर्तेथास्तेषु पुत्रवत् ।
ते हि लोकानिमान् सर्वान् धारयन्ति मनीषिणः ॥ ३ ॥
अतः ब्राह्मणोंकी पूजा करे। ब्राह्मणोंको नमस्कार करे। उनके प्रति वैसा ही बर्ताव करे, जैसा सुयोग्य पुत्र अपने पिताके प्रति करता है; क्योंकि मनीषी ब्राह्मण इन सब लोकोंको धारण करते हैं ॥ ३ ॥

ब्राह्मणाः सर्वलोकानां महान्तो धर्मसेतवः ।
धनत्यागाभिरामाश्च वाक्संयमरताश्च ये ॥ ४ ॥
ब्राह्मण समस्त जगत्की धर्ममर्यादाका संरक्षण करनेवाले सेतुके समान हैं। वे धनका त्याग करके प्रसन्न होते हैं और वाणीका संयम रखते हैं ॥ ४ ॥

रमणीयाश्च भूतानां निधानं च धृतव्रताः ।
प्रणेतारश्च लोकानां शास्त्राणां च यशस्विनः ॥ ५ ॥
वे समस्त भूतोंके लिये रमणीय, उत्तम निधि, दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, लोकनायक, शास्त्रोंके निर्माता और परम यशस्वी हैं ॥ ५ ॥

तपो येषां धनं नित्यं वाक् चैव विपुलं बलम् ।
प्रभवश्चैव धर्माणां धर्मज्ञाः सूक्ष्मदर्शिनः ॥ ६ ॥