भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1464, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1464

सदा तपस्या उनका धन और वाणी उनका महान् बल है। वे धर्मोंकी उत्पत्तिके कारण, धर्मके ज्ञाता और सूक्ष्मदर्शी हैं॥ ६॥ धर्मकामाः स्थिता धर्मे सुकृतैर्धर्मसेतवः । यान् समाश्रित्य जीवन्ति प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ॥ ७ ॥ वे धर्मकी ही इच्छा रखनेवाले, पुण्यकर्मोंद्वारा धर्ममें ही स्थित रहनेवाले और धर्मके सेतु हैं। उन्हींका आश्रय लेकर चारों प्रकारकी सारी प्रजा जीवन धारण करती है॥ ७॥ पन्थानः सर्वनेतारो यज्ञवाहाः सनातनाः । पितृपैतामहीं गुर्वीमुद्वहन्ति धुरं सदा ॥ ८ ॥ ब्राह्मण ही सबके पथप्रदर्शक, नेता और सनातन यज्ञ-निर्वाहक हैं। वे बाप-दादोंकी चलायी हुई भारी धर्म-मर्यादाका भार सदा वहन करते हैं॥ ८॥ धुरि ये नावसीदन्ति विषये सद्गवा इव । पितृदेवातिथिमुखा हव्यकव्याग्रभोजिनः ॥ ९ ॥ जैसे अच्छे बैल बोझ ढोनेमें शिथिलता नहीं दिखाते, उसी प्रकार वे धर्मका भार वहन करनेमें कष्टका अनुभव नहीं करते हैं। वे ही देवता, पितर और अतिथियोंके मुख तथा हव्य-कव्यमें प्रथम भोजनके अधिकारी हैं॥ ९॥ भोजनादेव लोकांस्त्रींस्त्रायन्ते महतो भयात् । दीपः सर्वस्य लोकस्य चक्षुश्चक्षुष्मतामपि ॥ १० ॥ ब्राह्मण भोजनमात्र करके तीनों लोकोंकी महान् भयसे रक्षा करते हैं। वे सम्पूर्ण जगत्के लिये दीपकी भाँति प्रकाशक तथा नेत्रवालोंके भी नेत्र हैं॥ १०॥ सर्वशिक्षा श्रुतिधना निपुणा मोक्षदर्शिनः । गतिज्ञाः सर्वभूतानामध्यात्मगतिचिन्तकाः ॥ ११ ॥ ब्राह्मण सबको सीख देनेवाले हैं। वेद ही उनका धन है। वे शास्त्रज्ञानमें कुशल, मोक्षदर्शी, समस्त भूतोंकी गतिके ज्ञाता और अध्यात्म-तत्त्वका चिन्तन करनेवाले हैं॥ ११॥ आदिमध्यावसानानां ज्ञातारश्छिन्नसंशयाः । परावरविशेषज्ञा गन्तारः परमां गतिम् ॥ १२ ॥ ब्राह्मण आदि, मध्य और अन्तके ज्ञाता, संशयरहित, भूत-भविष्यका विशेष ज्ञान रखनेवाले तथा परम गतिको जानने और पानेवाले हैं॥ १२॥ विमुक्ता धूतपाप्मानो निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः । मानार्हा मानिता नित्यं ज्ञानविद्भिर्महात्मभिः ॥ १३ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मण सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त और निष्पाप हैं। उनके चित्तपर द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता। वे सब प्रकारके परिग्रहका त्याग करनेवाले और सम्मान पानेके योग्य हैं। ज्ञानी महात्मा उन्हें सदा ही आदर देते हैं॥ १३॥