महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1465, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंचन्दने मलपङ्के च भोजनेऽभोजने समाः । समं येषां दुकूलं च तथा क्षौमाजिनानि च ॥ १४ ॥ वे चन्दन और मलकी कीचड़में, भोजन और उपवासमें समान दृष्टि रखते हैं। उनके लिये साधारण वस्त्र, रेशमी वस्त्र और मृगछाला समान हैं ॥ १४ ॥
तिष्ठेयुरप्यभुञ्जाना बहूनि दिवसान्यपि । शोषयेयुश्च गात्राणि स्वाध्यायैः संयतेन्द्रियाः ॥ १५ ॥ वे बहुत दिनोंतक बिना खाये रह सकते हैं और अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर स्वाध्याय करते हुए शरीरको सुखा सकते हैं ॥ १५ ॥
अदैवं दैवतं कुर्युर्दैवतं चाप्यदैवतम् । लोकानन्यान् सृजेयुस्ते लोकपालांश्च कोपिताः ॥ १६ ॥ ब्राह्मण अपने तपोबलसे जो देवता नहीं है, उसे भी देवता बना सकते हैं। यदि वे क्रोधमें भर जायँ तो देवताओंको भी देवत्वसे भ्रष्ट कर सकते हैं। दूसरे-दूसरे लोक और लोकपालोंकी रचना कर सकते हैं ॥ १६ ॥
अपेयः सागरो येषामपि शापान्महात्मनाम् । येषां कोपाग्निरद्यापि दण्डके नोपशाम्यति ॥ १७ ॥ उन्हीं महात्माओंके शापसे समुद्रका पानी पीनेयोग्य नहीं रहा। उनकी क्रोधाग्नि दण्डकारण्यमें आजतक शान्त नहीं हुई ॥ १७ ॥
देवानापि ये देवाः कारणं कारणस्य च । प्रमाणस्य प्रमाणं च कस्तानभिभवेद् बुधः ॥ १८ ॥ वे देवताओंके भी देवता, कारणके भी कारण और प्रमाणके भी प्रमाण हैं। भला कौन मनुष्य बुद्धिमान् होकर भी ब्राह्मणोंका अपमान करेगा ॥ १८ ॥
येषां वृद्धश्च बालश्च सर्वः सम्मानमर्हति । तपोविद्याविशेषात्तु मानयन्ति परस्परम् ॥ १९ ॥ ब्राह्मणोंमें कोई बूढ़े हों या बालक सभी सम्मानके योग्य हैं। ब्राह्मणलोग आपसमें तप और विद्याकी अधिकता देखकर एक-दूसरेका सम्मान करते हैं ॥ १९ ॥
अविद्वान् ब्राह्मणो देवः पात्रं वै पावनं महत् । विद्वान् भूयस्तरो देवः पूर्णसागरसंनिभः ॥ २० ॥ विद्याहीन ब्राह्मण भी देवताके समान और परम पवित्र पात्र माना गया है। फिर जो विद्वान् है उसके लिये तो कहना ही क्या है। वह महान् देवताके समान है और भरे हुए महासागरके समान सद्गुण-सम्पन्न है ॥ २० ॥
अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् । प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥ २१ ॥