भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1466, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1466

ब्राह्मण विद्वान् हो या अविद्वान् इस भूतलका महान् देवता है। जैसे अग्नि पञ्चभू-संस्कारपूर्वक स्थापित हो या न हो, वह महान् देवता ही है ॥ २१ ॥
श्मशाने ह्यपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति ।
हविर्यज्ञे च विधिवद् गृह एवातिशोभते ॥ २२ ॥
तेजस्वी अग्निदेव श्मशानमें हों तो भी दूषित नहीं होते। विधिवत् हविष्यसे सम्पादित होनेवाले यज्ञमें तथा घरमें भी उनकी अधिकाधिक शोभा होती है ॥ २२ ॥
एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तते सर्वकर्मसु ।
सर्वथा ब्राह्मणो मान्यो दैवतं विद्धि तत्परम् ॥ २३ ॥
इस प्रकार यद्यपि ब्राह्मण सब प्रकारके अनिष्ट कर्मोंमें लगा हो तो भी वह सर्वथा माननीय है। उसे परम देवता समझो ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि
ब्राह्मणप्रशंसायामेकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्राह्मणकी प्रशंसाविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५१ ॥