भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1476, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1476

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चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्यके प्रभावका वर्णन

वायुरुवाच

इमां भूमिं द्विजातिभ्यो दित्सुर्वै दक्षिणां पुरा ।
अङ्गो नाम नृपो राजंस्ततश्चिन्तां मही ययौ ॥ १ ॥
**वायुदेवता कहते हैं—**राजन्! पहलेकी बात है, अंग नामवाले एक नरेशने इस पृथ्वीको ब्राह्मणोंके हाथमें दान कर देनेका विचार किया। यह जानकर पृथ्वीको बड़ी चिन्ता हुई ॥ १ ॥

धारिणीं सर्वभूतानामयं प्राप्य वरो नृपः ।
कथमिच्छति मां दातुं द्विजेभ्यो ब्रह्मणः सुताम् ॥ २ ॥
वह सोचने लगी—'मैं सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली और ब्रह्माजीकी पुत्री हूँ। मुझे पाकर यह श्रेष्ठ राजा ब्राह्मणोंको क्यों देना चाहता है ॥ २ ॥

साहं त्यक्त्वा गमिष्यामि भूमित्वं ब्रह्मणः पदम् ।
अयं सराष्ट्रो नृपतिर्मा भूदिति ततोऽगमत् ॥ ३ ॥
'यदि इसका ऐसा विचार है तो मैं भी भूमित्वका (लोकधारणरूप अपने धर्मका) त्याग करके ब्रह्मलोक चली जाऊँगी, जिससे यह राजा अपने राज्यसे नष्ट हो जाय'। ऐसा निश्चय करके पृथ्वी चली गयी ॥ ३ ॥

ततस्तां कश्यपो दृष्ट्वा व्रजन्तीं पृथिवीं तदा ।
प्रविवेश महीं सद्यो मुक्त्वाऽऽत्मानं समाहितः ॥ ४ ॥
पृथ्वीको जाते देख महर्षि कश्यप योगका आश्रय ले अपने शरीरको त्यागकर तत्काल भूमिके इस स्थूल विग्रहमें प्रविष्ट हो गये ॥ ४ ॥

ऋद्धा सा सर्वतो जज्ञे तृणौषधिसमन्विता ।
धर्मोत्तरा नष्टभया भूमिरासीत् ततो नृप ॥ ५ ॥
नरेश्वर! उनके प्रवेश करनेसे पृथ्वी पहलेकी अपेक्षा भी समृद्धिशालिनी हो गयी। चारों ओर घास-पात और अन्नकी अधिक उपज होने लगी। उत्तरोत्तर धर्म बढ़ने लगा और भयका नाश हो गया ॥ ५ ॥

एवं वर्षसहस्राणि दिव्यानि विपुलव्रतः ।
त्रिंशतः कश्यपो राजन् भूमिरासीदतन्द्रितः ॥ ६ ॥
राजन्! इस प्रकार आलस्यशून्य हो विशाल व्रतका पालन करनेवाले महर्षि कश्यप तीस हजार दिव्य वर्षोंतक पृथ्वीके रूपमें स्थित रहे ॥ ६ ॥

अथागम्य महाराज नमस्कृत्य च कश्यपम् ।