महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1477, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृथिवी काश्यपी जज्ञे सुता तस्य महात्मनः ॥ ७ ॥ महाराज! तत्पश्चात् पृथ्वी ब्रह्मलोकसे लौटकर आयी और उन महात्मा कश्यपको प्रणाम करके उनकी पुत्री बनकर रहने लगी। तभीसे उसका नाम काश्यपी हुआ ॥ ७ ॥ एष राजन्नीदृशो वै ब्राह्मणः कश्यपोऽभवत् । अन्यं प्रब्रूहि वा त्वं च कश्यपात् क्षत्रियं वरम् ॥ ८ ॥ राजन्! ये कश्यपजी ब्राह्मण ही थे; जिनका ऐसा प्रभाव देखा गया है। तुम कश्यपसे भी श्रेष्ठ किसी अन्य क्षत्रियको जानते हो तो बताओ ॥ ८ ॥ तूष्णीं बभूव नृपतिः पवनस्त्वब्रवीत् पुनः । शृणु राजन्नुतथ्यस्य जातस्याङ्गिरसे कुले ॥ ९ ॥ भद्रा सोमस्य दुहिता रूपेण परमा मता । तस्यास्तुल्यं पतिं सोम उतथ्यं समपश्यत ॥ १० ॥ राजा कार्तवीर्य अर्जुन कोई उत्तर न दे सका। वह चुपचाप ही बैठा रहा। तब पवन देवता फिर कहने लगे—‘राजन्! अब तुम अंगिराके कुलमें उत्पन्न हुए उतथ्यका वृत्तान्त सुनो। सोमकी पुत्री भद्रा नामसे विख्यात थी। वह अपने समयकी सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी मानी जाती थी। चन्द्रमाने देखा, महर्षि उतथ्य ही मेरी पुत्रीके योग्य वर हैं ॥ ९-१० ॥ सा च तीव्रं तपस्तेपे महाभागा यशस्विनी । उतथ्यार्थे तु चार्वङ्गी परं नियममास्थिता ॥ ११ ॥ ‘सुन्दर अंगोंवाली महाभागा यशस्विनी भद्रा भी उतथ्यको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये उत्तम नियमका आश्रय ले तीव्र तपस्या करने लगी ॥ ११ ॥ तत आहूय सोतथ्यं ददावत्रैर्यशस्विनीम् । भार्यार्थे स च जग्राह विधिवद् भूरिदक्षिणः ॥ १२ ॥ ‘तब कुछ दिनोंके बाद सोमके पिता महर्षि अत्रिने उतथ्यको बुलाकर अपनी यशस्विनी पौत्रीका हाथ उनके हाथमें दे दिया। प्रचुर दक्षिणा देनेवाले उतथ्यने अपनी पत्नी बनानेके लिये भद्राका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया ॥ १२ ॥ तां त्वकामयत श्रीमान् वरुणः पूर्वमेव ह । स चागम्य वनप्रस्थं यमुनायां जहार ताम् ॥ १३ ॥ ‘परंतु श्रीमान् वरुणदेव उस कन्याको पहलेसे ही चाहते थे। उन्होंने वनमें स्थित मुनिके आश्रमके निकट आकर यमुनामें स्नान करते समय भद्राका अपहरण कर लिया ॥ १३ ॥ जलेश्वरस्तु हृत्वा तामनयत् स्वं पुरं प्रति । परमाद्भुतसंकाशं षट्सहस्रशतह्रदम् ॥ १४ ॥ ‘जलेश्वर वरुण उस स्त्रीको हरकर अपने परम अद्भुत नगरमें ले आये; जहाँ छः हजार बिजलियोंका प्रकाश* छा रहा था ॥ १४ ॥ न हि रम्यतरं किंचित् तस्मादन्यत् पुरोत्तमम् ।