महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1478, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रासादैरप्सरोभिश्च दिव्यैः कामैश्च शोभितम् ॥ १५ ॥ ‘वरुणके उस नगरसे बढ़कर दूसरा कोई परम रमणीय एवं उत्तम नगर नहीं है। वह असंख्य महलों, अप्सराओं और दिव्य भोगोंसे सुशोभित होता है॥ १५॥ तत्र देवस्तया सार्धं रेमे राजन् जलेश्वरः। अथाख्यातमुतथ्याय ततः पत्न्यवमर्दनम् ॥ १६ ॥ ‘राजन्! जलके स्वामी वरुणदेव वहाँ भद्राके साथ रमण करने लगे। तदनन्तर नारदजीने उतथ्यको यह समाचार बताया कि ‘वरुणने आपकी पत्नीका अपहरण एवं उसके साथ बलात्कार किया है’॥ १६॥ तच्छ्रुत्वा नारदात् सर्वमुतथ्यो नारदं तदा। प्रोवाच गच्छ ब्रूहि त्वं वरुणं परुषं वचः ॥ १७ ॥ ‘नारदजीके मुखसे यह सारा समाचार सुनकर उतथ्यने उस समय नारदजीसे कहा—‘देवर्षे! आप वरुणके पास जाइये और उनसे मेरा यह कठोर संदेश कह सुनाइये॥ १७॥ मद्वाक्यान्मुञ्च मे भार्या कस्मात् तां हृतवानसि। लोकपालोऽसि लोकानां न लोकस्य विलोपकः ॥ १८ ॥ सोमेन दत्ता भार्या मे त्वया चापहृताद्य वै। इत्युक्तो वचनात् तस्य नारदेन जलेश्वरः ॥ १९ ॥ मुञ्च भार्यामुतथ्यस्य कस्मात् त्वं हृतवानसि। ‘वरुण! तुम मेरे कहनेसे मेरी पत्नीको छोड़ दो। तुमने क्यों उसका अपहरण किया है? तुम लोगोंके लिये लोकपाल बनाये गये हो, लोक-विनाशक नहीं। सोमने अपनी कन्या मुझे दी है, वह मेरी भार्या है। फिर आज तुमने उसका अपहरण कैसे किया?’ नारदजीने उतथ्यके कथनानुसार जलेश्वर वरुणसे यह कहा कि ‘आप उतथ्यकी स्त्रीको छोड़ दीजिये; आपने क्यों उसका अपहरण किया है?’॥ १८-१९ १/२ ॥ इति श्रुत्वा वचस्तस्य सोऽथ तं वरुणोऽब्रवीत् ॥ २० ॥ ममैषा सुप्रिया भार्या नैनामुत्स्रष्टुमुत्सहे। ‘नारदजीके मुखसे उतथ्यकी यह बात सुनकर वरुणने उनसे कहा—‘यह मेरी अत्यन्त प्यारी भार्या है। मैं इसे छोड़ नहीं सकता’॥ २० १/२ ॥ इत्युक्तो वरुणेनाथ नारदः प्राप्य तं मुनिम्। उतथ्यमब्रवीद् वाक्यं नातिहृष्टमना इव ॥ २१ ॥ ‘वरुणके इस प्रकार उत्तर देनेपर नारदजी उतथ्य मुनिके पास लौट गये और खिन्न-से होकर बोले—॥ २१॥ गले गृहीत्वा क्षिप्तोऽस्मि वरुणेन महामुने। न प्रयच्छति ते भार्यां यत् ते कार्यं कुरुष्व तत् ॥ २२ ॥