भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1482, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1482

‘देवताओंके ऐसा कहनेपर तेजस्वी अगस्त्य मुनि कुपित हो गये और प्रलयकालके अग्निकी भाँति रोषसे जल उठे ॥ ७ ॥

तेन दीप्तांशुजालेन निर्दग्धा दानवास्तदा ।
अन्तरिक्षान्महाराज निपेतुस्ते सहस्रशः ॥ ८ ॥
‘महाराज! उनकी प्रज्वलित किरणोंके स्पर्शसे उस समय सहस्रों दानव दग्ध होकर आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ ८ ॥

दह्यमानास्तु ते दैत्यास्तस्यागस्त्यस्य तेजसा ।
उभौ लोकौ परित्यज्य गताः काष्ठां तु दक्षिणाम् ॥ ९ ॥
‘अगस्त्यके तेजसे दग्ध होते हुए दैत्य दोनों लोकोंका परित्याग करके दक्षिण दिशाकी ओर चले गये ॥ ९ ॥

बलिस्तु यजते यज्ञमश्वमेधं महीं गतः ।
येऽन्येऽधस्था महीस्थाश्च ते न दग्धा महासुराः ॥ १० ॥
‘उस समय राजा बलि पृथ्वीपर आकर अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। अतः जो दैत्य उनके साथ पृथ्वीपर थे और दूसरे जो पातालमें थे, वे ही दग्ध होनेसे बचे ॥ १० ॥

ततो लोकाः पुनः प्राप्ताः सुरैः शान्तभयैर्नृप ।
अथैनमब्रुवन् देवा भूमिष्ठानसुरान् जहि ॥ ११ ॥
‘नरेश्वर! तत्पश्चात् देवताओंका भय शान्त हो जानेपर वे पुनः अपने-अपने लोकमें चले आये। तदनन्तर देवताओंने अगस्त्यजीसे फिर कहा—‘अब आप पृथ्वीपर रहनेवाले असुरोंका भी नाश कर डालिये’ ॥ ११ ॥

इत्युक्तः प्राह देवान् स न शक्तोऽस्मि महीगतान् ।
दग्धुं तपो हि क्षीयेन्मे न शक्ष्यामीति पार्थिव ॥ १२ ॥
‘पृथ्वीनाथ! देवताओंके ऐसा कहनेपर अगस्त्यजी उनसे बोले—‘अब मैं भूतलनिवासी असुरोंको नहीं दग्ध कर सकता; क्योंकि ऐसा करनेसे मेरी तपस्या क्षीण हो जायगी। इसलिये यह कार्य मेरे लिये असम्भव है’ ॥ १२ ॥

एवं दग्धा भगवता दानवाः स्वेन तेजसा ।
अगस्त्येन तदा राजंस्तपसा भावितात्मना ॥ १३ ॥
‘राजन्! इस प्रकार शुद्ध अन्तःकरणवाले भगवान् अगस्त्यने अपने तप और तेजसे दानवोंको दग्ध कर दिया था ॥ १३ ॥

ईदृशश्चाप्यगस्त्यो हि कथितस्ते मयानघ ।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमगस्त्यात् क्षत्रियं वरम् ॥ १४ ॥
‘निष्पाप नरेश! अगस्त्य ऐसे प्रभावशाली बताये गये हैं, जो ब्राह्मण ही हैं। यह बात मैं कहता हूँ, तुम अगस्त्य मुनिसे श्रेष्ठ किसी क्षत्रियको जानते हो तो बताओ’ ॥ १४ ॥

भीष्म उवाच